मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के जन्मदिवस 25 मार्च पर विशेष
प्रो. मनोज कुमार
मध्यप्रदेश की राजनीति में धूमकेतु की तरह उभरने वाले डॉ. मोहन यादव की छाप ही अलग है. मोहन भिया को जब भी जो जिम्मेदारी उन्हें मिली, उसमें ‘मोहक’ और ‘डॉक्टर’ दोनों की छवि देखने को मिलती है. 25 मार्च को 60 वर्ष की आयु पूर्ण कर सनातन परम्परा के अनुरूप वे एक नई यात्रा पर होंगे अनुभव के साथ. दो वर्ष पहले उन्हें इस बात का इल्म नहीं था कि वे मुख्यमंत्री बन जाएंगे लेकिन नियति को यही मंजूर था और वे मुख्यमंत्री बन गए. जैसा कि होता आया है इसके बाद कयास लगाया जाने लगा कि वे अपने पूरवर्ती मुख्यमंत्रियों की तरह कामयाब नहीं होंगे या टाइमगैप अरजमेंट हैं. समय अपनी रफ्तार से गुजरता रहा और डॉ. मोहन यादव ने जता दिया और बता दिया कि वे ‘मोहक’ तो हंै ही, जरूरत पडऩे पर ‘डॉक्टर’ भी बनने का हुनर रखते हैं. दो साल, कुछ महीने पीछे पलट कर देखें तो मध्यप्रदेश और ज्यादा परिपक्व हुआ दिखता है. समय के साथ चलते हुए मध्यप्रदेश का नया पता दिया है मोहन भिया ने @mp प्रदेश में युवा मुख्यमंत्रियों का जब भी उल्लेख होगा, डॉ. मोहन यादव उनमें प्रथम पंक्ति में होंगे. डॉ. मोहन यादव को जो लोग जानते हैं, वे जानते हैं कि बचपन से लेकर आज तक वे अपने खास अंदाज में जिंदगी जीते हैं. जो मिल गया, उसे महाकाल का प्रसाद और आशीर्वाद मानते हैं और ना मिले, उसे भी ईश्वर की कृपा मानकर चलते हैं. ऐसी सोच के लोग बिरले ही होते हैं और ऐसे हैं मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव. वे सामान्य हैं, सहज हैं, सरल हैं और लोगों की चिंता करते हैं. उनके सामने अपने-पराये का कोई भेद नहीं है लेकिन अपने प्रदेश और प्रदेशवासियों के खिलाफ कोई गया तो वे निर्मम होकर डॉक्टर बनकर सर्जरी करने से भी नहीं चूकते हैं. उनका एक ही वाक्य होता है-‘सीधी बात, नो बकवास’ जन्मदिवस पर डॉ. मोहन यादव पर समीक्षा की जाएगी कि उन्होंने प्रदेश को क्या-क्या दिया तब ऐसे अनछुए कार्य उनके खाते में गिने जाएंगे. सामाजिक समरसता के साथ सामाजिक सद्भाव के साथ नवाचार के लिए मोहन सरकार ने स्वयं को रेखांकित किया है. कई मिथकों को तोड़ते हुए अनेक नए आयाम छूूने की कोशिश में डॉ. मोहन यादव आगे निकल गए हैं.
डॉ. मोहन यादव अपने लोगों के बीच ‘मोहन भिया’ हैं. मोहन भिया को राजनीति और समाज में जो कुछ मिला, वह तश्तरी में परोसा हुआ नहीं है. तपकर, जूझकर और संघर्ष कर पाया है. वे संतोषी हैं और सब कुछ पा लेने की प्रवृत्ति नहीं हैं. संघ दीक्षित मोहन भिया अपने कॉलेज के दिनों से जूझ रहे हैं. वे गलत के खिलाफ बिगुल बजा देते हैं लेकिन जो जायज है, उसका साथ देने में पीछे नहीं हटते हैं. सहज और सरल इतने कि मन में जो आया, वे कह देते हैं. मिथक तोडऩे में तो जैसे उन्हें परमानंद की अनुभूति होती है. मुख्यमंत्री की ताजपोशी के बाद अपने घर उज्जैन पहुँचे तो लोगों ने कहा कि मान्यता के अनुरूप उनकी सत्ता चली जाएगी लेकिन उन्हें भरोसा था कि वे मुख्यमंत्री नहीं, महाकाल के बेटे हंै और अपने घर आए हैं. उनका भरोसा पक्का निकला और मिथक टूट गया. मान्यता है कि महाकाल स्वयं में राजा हैं और उनके अलावा कोई दूसरा उज्जैन में विश्राम नहीं कर सकता है. लेकिन मान्यता के विपरीत लोग भूल गए कि मोहन भिया राजा नहीं, बेटे थे हैं और रहेंगे. महाकाल का साथ होने से उन्हें और साहस मिलता है.
सम्राट विक्रमादित्य के आदर्शों पर चलकर न्याय की एक नयी परिभाषा गढऩे के लिए तत्पर रहते हैं. सबका साथ, सबका विकास के तर्ज पर उन्होंने दशकों से उदास परेशान सैकड़ों मजदूरों के जीवन में खुशी की दस्तक देने में वक्त नहीं गंवाया. हुकूमचंद कपड़ा मिल इंदौर के सैकड़ों मजदूर अपना अधिकार पाने के लिए परेशानहालों को मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की संवेदनशहीलता ने राहत प्रदान की. मोहन भिया खुद एक मध्यमवर्गीय परिवार से आते हैं तो लोगों की पीड़ा उन्हें परेशान करती है. यही कारण है कि सबके अपने मोहन भिया के निर्देश पर प्रदेश के सभी मिलों का परीक्षण किया जा रहा है ताकि मजदूर परिवारों को राहत मिल सके. किसान, महिला, पिछड़ा, आदिवासी वर्गों के लिए नित नए कल्याणकारी योजनाओं का आगाज हो रहा है. रघुकुलवंश की ‘प्राण जाए पर वचन ना जाए’ कि भाँति उन्होंने लाडली बहनों से किया गया वायदा पूरा किया. नियत तय तारीख पर उन्हें बढ़ी हुई स्वाभिमान राशि बहनों के खाते में 1500 रुपये ट्रांसफर कर उनका भरोसा जीत लिया.
देश भर में भारत सरकार आकाशवाणी केन्द्रों को समेट रही है तब उज्जैन में आकाशवाणी केन्द्र का आरंभ होना एक बड़ी उपलब्धि के तौर पर गिना जाएगा. मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के अथक प्रयासों का सुपरिणाम है कि उज्जैन में आकाशवाणी केन्द्र को ना केवल मंजूरी मिली बल्कि अल्प समय में इसका प्रसारण शुरू हो गया. वे परम्परागत सोच से बाहर नवाचार पर जोर देते रहे. आज जब पूरी दुनिया एआई के नक्शे पर है, डिजीटली दुनिया हो चुकी है तो वे अपने मध्यप्रदेश को भी इसी के साथ चलाने की मंशा रखते हैं. अब मध्यप्रदेश का नया पता है @mp
मध्यप्रदेश शांति का टापू कहलाता है और इस पर एक बार फिर डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में मुहर लग गई है. स्मरण रहे कि उज्जैन नगर विकास के लिए अनेक धर्मस्थलों को हटाया जाना एक चुनौतीपूर्ण कार्य था लेकिन डॉ. मोहन यादव की सूझबूझ और समरसता के प्रयासों से यह कार्य भी सरलता से पूर्ण हो गया. यह संभवत: देश का पहला मसला रहा होगा जब बिना किसी हो-हल्ला यह काम पूर्ण हो गया. सनातनी परम्परा को एक नया आयाम देने के लिए डॉ. मोहन यादव ने प्रदेश के समस्त धर्मस्थलों को नवीन स्वरूप देने का प्रयास किया. इसी क्रम में मध्यप्रदेश में होने वाले प्रतिष्ठित सिंहस्थ के लिए लैंड पुलिंग एवं ममलेश्वर लोक निर्माण का प्रस्ताव सरकार ने किया था लेकिन विरोध के बाद सरकार ने पूरी सह्दयता के साथ दोनों ही प्रस्ताव को वापस कर लिया. सरकार को घेरने के इरादे से इसे बैकफुट पर जाना कहा गया लेकिन सत्यता है कि मुख्यमंत्री डॉ. मोहन सरकार का यह फैसला बेकअप देना था. वे कोई भी फैसला जनमानस के समर्थन के बिना नहीं लेते हैं और लैंड पुलिंग तथा ममलेश्वर के मामले को इसी संदर्भ में देखा और समझा जाना चाहिए.
मोहन भिया सीधी बात पर यकीन करते हैं और ऑन द स्पॉट फैसला लेते हैं. इसलिए उनका स्टैंड है-नो बकवास, सीधी बात. अपराधों के खिलाफ उनका रूख निर्मम प्रशासक का है और वे यहाँ पीएच-डी. डॉक्टर के आगे सच में डॉक्टर बनकर ‘सर्जरी’ करने से नहीें चूकते हैं. आम आदमी के साथ संवेदनशील होना डॉ. मोहन यादव का गुण है. महाकाल के बेटे डॉ. मोहन यादव नित नयी कामयाबी गढ़ रहे हैं. उन्होंने दशकों से स्थापित इस मिथक को चटका दिया है जिसमें कहा जाता था कि उज्जैन का राजा महाकाल है और कोई राजा उज्जैन में नहीं रूक सकता है. इस मिथक को दोहराने वाले भूल गए थे कि डॉ. मोहन यादव राजा नहीं, शासक नहीं अपितु महाकाल के बेटे हैं और महाकाल का उन पर आशीष है.