शम्भू शरण सत्यार्थी
होली केवल एक त्योहार नहीं है। यह भारतीय लोकजीवन का जीवंत महाकाव्य है। यह रंगों का उत्सव अवश्य है पर उससे कहीं अधिक यह सामूहिक स्मृति, सांस्कृतिक निरंतरता और मानवीय संबंधों का पुनर्जागरण है। शहरों में होली एक दिन का आयोजन हो सकती है, पर गाँवों में यह पूरे फागुन का स्पंदन है। वहाँ होली खेली नहीं जाती—वह साँसों में बसती है, गीतों में गूँजती है और संबंधों में खिलती है।
फागुन के आते ही प्रकृति स्वयं होली का निमंत्रण-पत्र लिखती है। सरसों के पीले फूल जैसे धरती पर अबीर बिखेर देते हैं। गेहूँ की बालियाँ हवा के संग लहराकर ताल देती हैं। आम के बौरों की गंध वातावरण में एक अनकहा संगीत घोल देती है। कोयल की पहली कूक मानो फाग का पहला स्वर हो। यही वह समय है जब लोकजीवन में राग और रंग का संगम होता है। राग—जो भीतर की भावधारा है; रंग—जो बाहर की अभिव्यक्ति है। इन दोनों का मिलन ही गाँव की होली है।
गाँवों में होली की शुरुआत फाल्गुन पूर्णिमा से नहीं, वसंत पंचमी से होती है। सरस्वती पूजा के बाद जब पहली बार चौपाल पर ढोलक रखी जाती है और युवाओं की टोली “ताल तोड़ती” है, तब समझ लिया जाता है कि फागुन ने दस्तक दे दी है। ताल तोड़ना केवल गीत की शुरुआत नहीं, सामूहिक स्वर-साधना है। अलग-अलग घरों से आए लोग एक ही लय में बँध जाते हैं। यह लय ही लोकजीवन की आत्मा है।
अगजा गाड़ने की परंपरा इस सांस्कृतिक उत्सव का आधार है। गाँव के बीच गड्ढा खोदकर उसमें कसैली और सिक्का डालना, फिर रेंड़ गाड़ना—यह केवल क्रिया नहीं, प्रतीक है। कसैली जीवन की कड़वाहटों का स्वीकार है; सिक्का समृद्धि की आकांक्षा; और रेंड़ सामूहिक आस्था का स्तंभ। बच्चे घर-घर जाकर गोइठा और जलावन माँगते हैं—
“अगजा गोसाईं गोड़ लागी ला, बारह गोइठा माँगी ला।”
उनके स्वर में आग्रह कम, अपनापन अधिक होता है। पाँच दिन पहले वे फिर पुकारते हैं—
“जय जजमानी, तोहर सोने के केवाड़ी पंच गोइठा द।”
हर घर से पाँच गोइठा मिलना केवल सहयोग नहीं, सामाजिक साझेदारी का उत्सव है। अगजा में डाली वस्तु को वापस न लाने की लोकमान्यता सामूहिक अनुशासन की सुंदर मिसाल है। जब अगजा जलता है, तो केवल लकड़ियाँ नहीं जलतीं—मन के मैल, कटुता और अहंकार भी अग्नि को समर्पित कर दिए जाते हैं।
इसके बाद शुरू होता है फाग और चौताल का वह प्रवाह, जो पूरे गाँव को एक स्वर में बाँध देता है। ढोल, झाल, मंजीरा और खँजरी की सम्मिलित ध्वनि जैसे हवा में रंग घोल देती है। होली की शुरुआत सुमिरन से होती है—
“एक नाम होली गाय, पहले सुमिरे श्री गणपति के…”
यह सुमिरन लोकजीवन में आस्था की उपस्थिति का प्रमाण है। उत्सव भी स्मरण से आरंभ होता है—यही उसकी गरिमा है।
फाग के गीतों में प्रेम, प्रतीक्षा और हास्य का अद्भुत संतुलन है—
“चलूँ रे सखी मड़वा वर देखन…”
“पिया हो कंगहिया मंगा द…”
इन गीतों में लोकस्त्री का मन बोलता है—सहज, चंचल, आत्मीय। चौताल के गीतों में श्रृंगार रस अपनी मधुर छटा के साथ प्रकट होता है—
“गोरी बाज रहे पैजनिया झमाझम…”
शम्भू शरण सत्यार्थी