राजनीति

ऊर्जा संकट से कैसे बाहर निकलें मजदूर ?


सौरभ वार्ष्णेय


आज जब देश ऊर्जा संकट की चुनौती से जूझ रहा है, उसका सबसे गहरा असर समाज के उस वर्ग पर पड़ रहा है जो पहले से ही आर्थिक रूप से कमजोर है—मजदूर वर्ग। महंगी बिजली, बढ़ते ईंधन दाम और अनिश्चित रोजगार ने मजदूरों की रोजमर्रा की जिंदगी को और कठिन बना दिया है। ऐसे में यह सवाल महत्वपूर्ण हो जाता है कि मजदूर इस संकट से कैसे बाहर निकलें और सरकार व समाज उनकी कैसे मदद कर सकते हैं। ऊर्जा संकट केवल बिजली की कमी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह कोयला आपूर्ति, अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों, और नीतिगत कमजोरियों से भी जुड़ा है। जब उद्योगों की लागत बढ़ती है, तो सबसे पहले असर मजदूरों की मजदूरी और रोजगार पर पड़ता है। कई छोटे उद्योग बंद होने की कगार पर हैं, जिससे मजदूरों का पलायन तेज हो रहा है।


ऊर्जा संकट के बीच मजदूरों का शहरों से गांवों की ओर पलायन ने गहरी चिंता पैदा कर दी है।  देश में बढ़ते ऊर्जा संकट ने केवल उद्योगों और अर्थव्यवस्था को ही प्रभावित नहीं किया है, बल्कि इसका सबसे बड़ा असर आम मजदूर वर्ग पर पड़ रहा है। बिजली की कमी, महंगी ऊर्जा और घटते औद्योगिक उत्पादन के कारण शहरों में रोजगार के अवसर लगातार सिकुड़ रहे हैं। ऐसे हालात में मजदूरों का शहरों से गांवों की ओर पलायन फिर से तेज होता दिख रहा है। ऊर्जा संकट का सीधा असर फैक्ट्रियों और छोटे उद्योगों पर पड़ा है। कई उद्योग या तो बंद हो गए हैं या सीमित क्षमता पर काम कर रहे हैं। इससे दिहाड़ी मजदूरों और असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले लोगों की आय पर गहरा असर पड़ा है। जब शहरों में काम नहीं मिलता, तो मजदूरों के सामने अपने गांव लौटने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता।


यह स्थिति हमें कोविड-19 लॉकडाउन के दौरान हुए बड़े पैमाने के पलायन की याद दिलाती है, जब लाखों मजदूर शहरों से अपने गांवों की ओर लौट गए थे। हालांकि मौजूदा संकट उतना अचानक नहीं है लेकिन इसके प्रभाव धीरे-धीरे उतने ही गंभीर होते जा रहे हैं।गांवों में लौटने के बाद मजदूरों को रोजगार की गारंटी नहीं मिलती। कृषि पहले से ही सीमित संसाधनों पर निर्भर है और सभी के लिए पर्याप्त अवसर नहीं दे सकती। ऐसे में ग्रामीण बेरोजगारी और गरीबी बढऩे का खतरा है। इससे सामाजिक और आर्थिक असंतुलन और गहरा सकता है। सरकार के सामने चुनौती है कि वह ऊर्जा संकट का स्थायी समाधान निकाले और साथ ही शहरी रोजगार को बचाए। नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों को बढ़ावा देना, छोटे उद्योगों को राहत देना और ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर पैदा करना समय की मांग है।मजदूरों का यह पलायन केवल आर्थिक समस्या नहीं, बल्कि एक मानवीय संकट भी है। यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो इसका असर देश के विकास की गति पर भी पड़ सकता है।


भारत जैसे विकासशील देश में जहां आर्थिक प्रगति की गाथाएं अक्सर सुनाई जाती हैं, वहीं एक बड़ा वर्ग ऐसा भी है जिसकी रोज़मर्रा की जि़ंदगी आज भी संघर्षों से भरी हुई है। मजदूर के पास चूल्हे जलाने तक के पैसे नहीं — यह कथन सुनने में अतिशयोक्ति लग सकता है लेकिन ज़मीनी सच्चाई इससे बहुत दूर नहीं है। जब तक मजदूर को स्थायी रोजगार, उचित वेतन और सामाजिक सुरक्षा नहीं मिलेगी, तब तक उसकी स्थिति में ठोस सुधार संभव नहीं है। मजदूर के पास चूल्हे जलाने तक के पैसे नहीं — यह न तो पूरी तरह फ़साना है, न ही हर जगह की सच्चाई। यह उस कड़वी हकीकत का प्रतीक है, जिसे हम अक्सर आंकड़ों और विकास के शोर में नजरअंदाज कर देते हैं।


समाज और सरकार दोनों की जिम्मेदारी है कि मजदूर वर्ग को सिर्फ योजनाओं का लाभ ही नहीं बल्कि सम्मानजनक जीवन जीने का अवसर भी मिले। तभी असली विकास संभव होगा। देश के असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले करोड़ों मजदूर आज भी अस्थिर आय, महंगाई और सामाजिक सुरक्षा की कमी से जूझ रहे हैं। दिहाड़ी मजदूर की कमाई अक्सर इतनी सीमित होती है कि वह सिर्फ दो वक्त की रोटी का इंतज़ाम कर पाता है। ऐसे में अगर एक दिन भी काम न मिले, तो चूल्हा जलना मुश्किल हो जाता है। महंगाई ने इस संकट को और गहरा किया है। रसोई गैस, खाद्यान्न और अन्य आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में लगातार वृद्धि ने गरीब परिवारों की कमर तोड़ दी है। कई जगहों पर आज भी लोग लकड़ी या कंडे से खाना बनाने को मजबूर हैं। हालांकि यह भी सच है कि सरकार ने गरीबों के लिए कई योजनाएं चलाई हैं—मुफ्त राशन, उज्ज्वला योजना, मनरेगा जैसी योजनाएं मजदूरों को राहत देने का प्रयास करती हैं। इन योजनाओं से कई परिवारों की स्थिति में सुधार भी आया है। लेकिन सवाल यह है कि क्या ये योजनाएं हर जरूरतमंद तक पूरी तरह पहुंच पा रही हैं? अक्सर भ्रष्टाचार, जानकारी की कमी और व्यवस्थागत खामियों के कारण कई मजदूर इन लाभों से वंचित रह जाते हैं। समस्या केवल आय की नहीं, बल्कि असमानता और अवसरों की भी है।


समाधान के रास्ते
पहला समाधान यह हो सकता है कि सरकारी हस्तक्षेप यानी सरकार को सस्ती बिजली और ईंधन उपलब्ध कराने के लिए सब्सिडी और राहत पैकेज देने चाहिए। ग्रामीण और शहरी गरीबों के लिए विशेष योजनाएं बनाई जानी चाहिए।
दूसरा  वैकल्पिक ऊर्जा को बढ़ावा देना । सौर ऊर्जा और अन्य नवीकरणीय स्रोतों को अपनाना इस संकट का स्थायी समाधान हो सकता है। अगर मजदूरों को सोलर पैनल जैसी सुविधाएं सस्ती दरों पर मिलें, तो वे अपनी ऊर्जा जरूरतें खुद पूरी कर सकते हैं।
तीसरा रोजगार के नए अवसर पैदा करना ऊर्जा क्षेत्र में ही रोजगार सृजन किया जा सकता है—जैसे सोलर इंस्टॉलेशन, बैटरी मेंटेनेंस आदि। इससे मजदूरों को नया कौशल और काम मिलेगा।


चौथा सामाजिक सुरक्षा यानी मजदूरों के लिए राशन, स्वास्थ्य और आवास जैसी बुनियादी सुविधाएं सुनिश्चित करना जरूरी है, ताकि वे संकट के समय भी सम्मानजनक जीवन जी सकें।


ऊर्जा संकट केवल आर्थिक समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक असमानता को बढ़ाने वाला मुद्दा भी है। यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो इसका सबसे बड़ा खामियाजा मजदूर वर्ग को ही भुगतना पड़ेगा। सरकार, उद्योग और समाज—तीनों को मिलकर ऐसा समाधान खोजना होगा जिससे विकास की रोशनी हर घर तक पहुंचे, न कि केवल कुछ वर्गों तक सीमित रह जाए। मजदूर केवल अर्थव्यवस्था का पहिया नहीं हैं बल्कि देश की असली ताकत हैं। उनकी समस्याओं का समाधान ही ऊर्जा संकट से बाहर निकलने का सबसे सही रास्ता है।

सौरभ वार्ष्णेय