कमलेश पांडेय
आतंकवादी शासन, लोकतंत्र से इतर धार्मिक उन्माद से प्रेरित तानाशाही शासन का पर्याय बनकर उभरा है। ईरान और अफगानिस्तान जैसे देशों में यह रूप बदल बदल कर हावी है। इसका दिखावटी जनतंत्र वाला चेहरा पाकिस्तान में सैन्य तानाशाही के रूप में कभी कभार दिख जाता है। इजरायल और भारत के अलावा बहुतेरे देश हैं जो इस्लामिक आतंकवाद से ग्रस्त हैं। हद तो यह कि कतिपय मुस्लिम देश भी शिया-सुन्नी जैसे भेदभाव मूलक आतंकवाद से त्रस्त हैं। वहीं ईसाई मुल्क भी इनके हिंसक दांवपेंच से त्रस्त हैं।
इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने ठीक ही कहा है कि, “अगर ईरान जैसा आतंकवादी शासन… परमाणु हथियार और उनके इस्तेमाल के साधन, बैलिस्टिक और अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइलें हासिल कर लेता है, तो यह पूरी दुनिया को धमकाएगा। इसलिए हमने अपनी रक्षा करने का संकल्प लिया है। लेकिन ऐसा करते हुए, हम दूसरों की भी रक्षा कर रहे हैं।” शायद इसलिए प्रत्यक्ष रूप से अमेरिका और परोक्ष रूप से भारत भी इजरायल को साथ दे रहे हैं। अन्यथा बत्तीस इस्लामिक दांतों के बीच जिह्वा मानिंद घिरे यहूदी देश इजरायल का सुरक्षित रहना मुश्किल होता। ईरान, तुर्किये और पाकिस्तान जैसे वहशी देश तो इजरायल का अस्तित्व मिटाने पर ही तुले हुए हैं। वहीं भारत को लेकर इस्लामिक देशों का नजरिया भी कुछ ऐसा ही दिखता है।
गत सोमवार को नेतन्याहू ने दो टूक शब्दों में कहा कि ईरान का परमाणु और मिसाइल कार्यक्रम पूरी दुनिया के लिए खतरा है और इजराइली सेना की कार्रवाई का उद्देश्य केवल इजराइल की नहीं, बल्कि पूरे विश्व की सुरक्षा करना है। दरअसल, बेत शेमेश पर गत रविवार को हुए ईरान के बैलिस्टिक मिसाइल हमले के बाद वहां का दौरा करते समय नेतन्याहू ने कहा, “यह ऑपरेशन ‘रोरिंग लॉयन’ का तीसरा दिन है। इजराइली सेना और इजराइल सरकार ने हमारे मित्र अमेरिका और राष्ट्रपति ट्रंप के साथ मिलकर इजराइल के अस्तित्व को होने वाले खतरे और अमेरिका तथा पूरी दुनिया के लिए बड़े खतरों को नष्ट करने के लिए यह अभियान शुरू किया है।”
उल्लेखनीय है कि बेत शेमेश में एक आवासीय क्षेत्र में मिसाइल गिरने से नौ लोग मारे गए और 20 से अधिक लोग घायल हो गए। यह क्षेत्र यरूशलम से लगभग 35 किलोमीटर दूर स्थित है। नेतन्याहू ने कहा कि ईरान की धमकियां सिर्फ इजराइल और अमेरिका तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि यूरोप और अन्य क्षेत्रों तक भी फैल गई हैं। उन्होंने साइप्रस में ब्रिटेन के एक सैन्य ठिकाने पर ईरान के हमले की ओर इशारा करते हुए कहा, “वे जोर-जोर से कह रहे हैं ‘इजराइल मुर्दाबाद, अमेरिका मुर्दाबाद।’ यही उनका अंतिम लक्ष्य है। लेकिन मैंने कहा था कि वे बीच में आने वालों को भी निशाना बनाएंगे। वे यूरोप को भी निशाना बनाएंगे। और उन्होंने किया।” उन्होंने साफ साफ कहा, “अगर यह आतंकवादी शासन… परमाणु हथियार और उनके इस्तेमाल के साधन, बैलिस्टिक और अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइलें हासिल कर लेता है, तो यह पूरी दुनिया को धमकाएगा। इसलिए हमने अपनी रक्षा करने का संकल्प लिया है। लेकिन ऐसा करते हुए, हम दूसरों की भी रक्षा कर रहे हैं।”
# दुनिया की आतंकवादी घटनाओं की प्रवृत्ति को सिलसिलेवार ढंग से जानिए
बता दें कि आतंकवाद की कोई एक निश्चित उत्पत्ति नहीं है, बल्कि यह प्राचीन काल से विभिन्न रूपों में मौजूद रहा है।भले ही ईरान ने इसे उत्पन्न नहीं किया, लेकिन 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद कुछ समूहों को समर्थन देकर क्षेत्रीय स्तर पर आतंकवाद का प्रसार किया। जहां तक आतंकवाद के प्रारंभिक उदाहरण की बात है तो आतंकवाद के सबसे पुराने ज्ञात रूप पहली शताब्दी ईस्वी में यहूदिया प्रांत के सिक्कारी ज़ीलट्स से जुड़े हैं, जिन्होंने रोमन शासन के सहयोगियों की हत्या की। वहीं, 11वीं शताब्दी में हाशशाशीन (असासिन्स) नामक शिया मुस्लिम समूह ने राजनीतिक हत्याओं का सहारा लिया। जबकि आधुनिक संज्ञा ‘टेररिज्म’ फ्रांसीसी क्रांति के ‘राज्य आतंक’ (1793-94) से जुड़ी हैं।
जहां तक ईरान की भूमिका की बात है तो ईरान ने 1979 के बाद इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (IRGC) के माध्यम से हिजबुल्लाह, हमास और हूती जैसे आतंकवादी समूहों को हथियार, प्रशिक्षण और वित्तीय सहायता दी। इससे क्षुब्ध अमेरिका ने 1984 में ईरान को आतंकवाद प्रायोजक देश घोषित किया, लेकिन यह वैश्विक उत्पत्ति का कारण नहीं समझा जा सकता। क्योंकि ईरान इन समूहों को ‘मुक्ति आंदोलन’ मानता है। आधुनिक आतंकवाद 19वीं शताब्दी के अंत से उभरा, जब राजनीतिक समूहों ने नागरिकों को निशाना बनाकर सरकारों को प्रभावित करने की रणनीति अपनाई। इसके प्रमुख उदाहरणों में रूसी निहिलिस्टों के बम हमले, आयरिश रिपब्लिकन आर्मी (IRA) के संघर्ष और 20वीं शताब्दी के अंत में धार्मिक-राजनीतिक घटनाएं शामिल हैं।
प्रारंभिक आधुनिक उदाहरण के तौर पर रूस में 1881 में नारोडनाया वोल्या संगठन ने ज़ार अलेक्जेंडर द्वितीय की हत्या की, जो आधुनिक राजनीतिक आतंकवाद का प्रतीक बना। वहीं 1946 में इर्गुन समूह ने फिलिस्तीन के किंग डेविड होटल पर बमबारी की, जिसमें 91 लोग मारे गए। वहीं, 1970 के दशक में IRA ने ब्रिटेन में बम विस्फोटों की श्रृंखला शुरू की। इसी प्रकार की कुछ प्रमुख वैश्विक घटनाएं इसप्रकार हैं- भारत-केंद्रित उदाहरण के तौर पर भारत में 2001 का संसद हमला और 2008 का मुंबई हमला आधुनिक आतंकवाद के चरम थे। जबकि हाल के वर्षों में ड्रोन-आधारित हमले और लोन वुल्फ घटनाएं बढ़ी हैं, जैसे 2021 जम्मू एयरबेस हमला।
# आधुनिक आतंकवाद के बहुआयामी कारण को ऐसे समझिए
आधुनिक आतंकवाद के कारण बहुआयामी हैं, जिनमें धार्मिक कट्टरता, राजनीतिक अस्थिरता और आर्थिक असमानता प्रमुख हैं। हाल के ट्रेंड्स में डिजिटल प्रचार, लोन वुल्फ हमले और ड्रोन तकनीक का उपयोग बढ़ा है। इसके कतिपय मुख्य कारण हैं-
पहला, धार्मिक और वैचारिक कट्टरता: जिहादी समूहों का उदय, जैसे ISIS, धार्मिक व्याख्याओं से प्रेरित।
दूसरा, राजनीतिक शोषण: विदेशी हस्तक्षेप, सीमा विवाद और भू-राजनीतिक तनाव।
तीसरा, सामाजिक-आर्थिक कारक: बेरोजगारी, गरीबी और शिक्षा की कमी युवाओं को आकर्षित करती है।
चौथा, उभरते ट्रेंड: आतंकवाद अब पारंपरिक बम विस्फोटों से आगे बढ़कर साइबर हमले, ड्रोन बमबारी और एन्क्रिप्टेड ऐप्स पर आधारित हो गया है।
पांचवां, लोन वुल्फ और राज्य-प्रायोजित आतंक (जैसे तालिबान) बढ़ रहे हैं, साथ ही AI-जनित डीपफेक से प्रचार तेज किये जा रहे हैं।
# आधुनिक आतंकवाद से निपटने के लिए अपनाई गई है बहुआयामी रणनीति
आधुनिक आतंकवाद के कारणों—जैसे धार्मिक कट्टरता, राजनीतिक अस्थिरता और आर्थिक असमानता—से निपटने के लिए बहुआयामी रणनीति आवश्यक है। ये उपाय खुफिया, कानूनी, सामाजिक और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काम करते हैं।
पहला, कानूनी और सुरक्षा उपाय: सख्त कानून जैसे NIA अधिनियम को मजबूत करना और खुफिया एजेंसियों को आधुनिक उपकरण प्रदान करना प्रमुख है।
दूसरा, सीमा सुरक्षा ग्रिड और ड्रोन निगरानी से घुसपैठ रोकी जा सकती है।
तीसरा, सामाजिक-आर्थिक हस्तक्षेप: गरीबी उन्मूलन, कौशल विकास योजनाएं और शिक्षा के माध्यम से युवाओं को कट्टरता से दूर रखा जा सकता है।
चतुर्थ, सामुदायिक जागरूकता अभियान धार्मिक सद्भाव बढ़ाते हैं।
पंचम, तकनीकी और अंतरराष्ट्रीय प्रयास: अंतरराष्ट्रीय संगठन आतंकवाद रोकने में खुफिया साझा, क्षमता निर्माण और वैश्विक मानकों के माध्यम से महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
छठा, संयुक्त राष्ट्र और FATF जैसे निकाय: ये सभी वित्तपोषण रोकने तथा सहयोग बढ़ाने पर केंद्रित हैं।
सातवां, संयुक्त राष्ट्र की भूमिका: संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) के संकल्पों जैसे 1267 और 1373 के जरिए आतंकी संगठनों पर प्रतिबंध लगाता है तथा सदस्य देशों को कार्यान्वयन सुनिश्चित करने के लिए UNOCT (संयुक्त राष्ट्र आतंकवाद-निरोध कार्यालय) के माध्यम से क्षमता निर्माण करता है।
आठवां, CTTF (काउंटर-टेररिज्म ट्रस्ट फंड): इसके जरिए प्रशिक्षण और तकनीकी सहायता प्रदान करता है, जिसमें भारत ने योगदान दिया है।
नवम, अन्य प्रमुख संगठन FATF: आतंकी वित्तपोषण पर ‘ग्रे’ और ‘ब्लैक’ लिस्ट जारी कर वैश्विक मानक लागू करता है।
दशम, इंटरपोल: रेड नोटिस और डेटाबेस साझा कर आतंकियों की गिरफ्तारी में सहायता करता है।
ग्यारह, BRICS और BIMSTEC: क्षेत्रीय खुफिया साझा और संयुक्त अभ्यास आयोजित करते हैं।( युवराज फीचर्स )
कमलेश पांडेय