रामस्वरूप रावतसरे
ईरान जंग की वजह से पूरी दुनिया में बेचौनी है। कच्चे तेल के दाम बढ़ने से हर तरफ महंगाई बढ़ रही है। अमेरिका से लेकर नेपाल तक हर मुल्क की जनता परेशान है। भारत भी इस जंग के असर से अछूता नहीं है लेकिन, अब भारत के हाथ अलादीन का चिराग लग गया है। खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसकी घोषणा की है। अगर सब कुछ ठीक रहा तो इस अलादीन के चिराग के दम पर भविष्य में भारत एक जगमगाता सितारा बन जाएगा। भारत को अरब देशों या रूस से तेल पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा।
फास्ट ब्रीडर न्यूक्लियर रिएक्टर एक बेहद जटिल टेक्नोलॉजी है। पश्चिमी देश इस तकनीक को हासिल करने में नाकाम रहे हैं। इस तकनीक वाले न्यूक्लियर रिएक्टर में यूरेनियम की जगह थोरियम का इस्तेमाल किया जाता है और दुनिया के थोरियम भंडार का 25 फीसदी हिस्सा भारत में हैं यानी इस तकनीक की बदौलत परमाणु बिजली के क्षेत्र में भारत की यूरेनियम पर निर्भरता खत्म हो जाएगी। भारत में यूरेनियम भंडार बहुत नगण्य है। इसके लिए भारत को रूस और ऑस्ट्रेलिया पर निर्भर रहना पड़ता है।
जानकारी के अनुसार भारत ने फास्ट ब्रीडर न्यूक्लियर रिएक्टर की कल्पना 70 साल पहले की थी। जानेमाने वैज्ञानिक होमी जहांगीर भाभा ने इस दिशा में काम शुरू किया था। तब से भारत इस तकनीक को हासिल करने में लगा था। दरअसल, दुनिया के सबसे अमीर छह देशों ने फास्ट ब्रीडर न्यूक्लियर रिएक्टर्स तकनीक हासिल करने पर 50 बिलियन डॉलर (लगभग 4.25 लाख करोड़ रुपये) खर्च कर चुके हैं। लेकिन, असफलता के कारण एक-एक करके सभी ने प्रोजेक्ट छोड़ दिए। इस तकनीक को विकसित करने के लिए अमेरिका ने 15 बिलियन, जापान ने 12 बिलियन, ब्रिटेन ने 8 बिलियन, जर्मनी ने 6 बिलियन डॉलर खर्च कर दिए. फ्रांस और इटली भी भाग खड़े हुए। सबने कहा कि यह तकनीक हासिल करना बहुत मुश्किल और बहुत महंगा है लेकिन भारत ने सिर्फ 90 करोड़ डॉलर (लगभग 7,700 करोड़ रुपये) में अपना पहला कमर्शियली वायबल प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर विकसित कर लिया। ऐसा करने वाला भारत, रूस और चीन के बाद तीसरा देश है। वर्ष 2004 में यह प्रोजेक्ट शुरू हुआ प्रोजेक्ट था। शुरुआती बजट 42 करोड़ डॉलर का था. अब 22 साल बाद दर्जनों बार डेडलाइन खत्म होने और लागत दोगुनी होने के बाद भारत के हाथ सफलता लगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे सिविल न्यूक्लियर के सफर में एक अहम कदम बताया है।
प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर ( पीएफबीआर ) एक बेहद उन्नत किस्म का न्यूक्लियर रिएक्टर है, जिसे भारत ने अपनी खास जरूरतों को ध्यान में रखकर तैयार किया है। ‘फास्ट’ का मतलब है कि इसमें तेज गति वाले न्यूट्रॉन का इस्तेमाल होता है और ‘ब्रीडर’ का मतलब है कि यह रिएक्टर जितना परमाणु ईंधन खर्च करता है, उससे ज्यादा नया ईंधन खुद बना लेता है।
आम न्यूक्लियर रिएक्टर जहाँ यूरेनियम का उपयोग करके ऊर्जा पैदा करते हैं, वहीं पीएफबीआर यूरेनियम और प्लूटोनियम के साथ-साथ भविष्य के लिए नया ईंधन भी तैयार करता है, जिससे ईंधन की कमी का खतरा कम हो जाता है। भारत के लिए यह बहुत अहम है, क्योंकि हमारे पास यूरेनियम सीमित है लेकिन थोरियम का भंडार काफी ज्यादा है।
प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर ( पीएफबीआर ) के ‘क्रिटिकलिटी स्तर’ हासिल करने का मतलब यह है कि अब रिएक्टर के भीतर परमाणु प्रतिक्रिया (न्यूक्लियर फिशन) अपने आप लगातार और नियंत्रिति तरीके से चलने लगी है। जब एक परमाणु टूटता है और उससे निकलने वाले न्यूट्रॉन ठीक उतनी ही संख्या में दूसरे परमाणुओं को तोड़ते रहते हैं जिससे यह प्रक्रिया बिना रुके चलती रहे, उसी स्थिति को ‘क्रिटिकल’ कहा जाता है। इंटरनेशनल एटॉमिक एनर्जी एजेंसी के अनुसार, क्रिटिकलिटी वह स्थिति है जब परमाणु श्रृंखला अभिक्रिया स्थिर रूप से खुद चलती रहती है, यानी हर फिशन से उतने ही न्यूट्रॉन पैदा होते हैं जितने अगले फिशन को जारी रखने के लिए जरूरी होते हैं। इस चरण के बाद वैज्ञानिक धीरे-धीरे इसकी क्षमता बढ़ाते हैं और इसे बिजली उत्पादन के लिए पूरी तरह तैयार करते हैं।
रिपोर्ट के अनुसार भारत का परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम तीन चरणों में बनाया गया है, जिसे होमी जे भाभा ने तैयार किया था। अभी जो प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर ( पीएफबीआर ) ने ‘क्रिटिकलिटी’ हासिल की है, वह दूसरे चरण की एक बड़ी उपलब्धि जरूर है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि भारत पूरी तरह तीसरे चरण में पहुँच गया है। असल में, भारत अभी दूसरे और तीसरे चरण के बीच के संक्रमण दौर में है।
दूसरे चरण का मकसद फास्ट ब्रडर रिएक्टर के जरिए प्लूटोनियम का इस्तेमाल करके ज्यादा ईंधन तैयार करना और आगे के लिए जरूरी सामग्री जुटाना है। पीएफबीआर का सफल होना दिखाता है कि यह तकनीक अब काम कर रही है, लेकिन पूरे देश में इस तरह के और रिएक्टर लगने औऱ स्थिर रूप से चलने के बाद ही कहा जा सकता है कि दूसरा चरण पूरी तरह सफल हुआ है।
तीसरे चरण में भारत का फोकस थोरियम पर आधारित रिएक्टरों पर होगा, क्योंकि भारत के पास थोरियम का बहुत बड़ा भंडार है। इसके लिए पहले पर्याप्त मात्रा में यू-233 जैसे ईंधन का उत्पादन जरूरी है, जो दूसरे चरण से ही मिलेगा। डिपार्टमेंट ऑप एटॉमिक एनर्जी के अनुसार, यह एक लंबी और चरणबद्ध प्रक्रिया है, जिसमें हर स्टेज अगले स्टेज के लिए आधार तैयार करता है।
जानकारों के अनुसार यह रिएक्टर उसी दिशा में एक मजबूत कदम है, जिससे आगे चलकर थोरियम आधारित ऊर्जा को बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया जा सकेगा। तमिलनाडु के कलपक्कम में बना यह रिएक्टर पूरी तरह स्वदेशी तकनीक से तैयार किया गया है, जो भारत की वैज्ञानिक ताकत और इंजनीयरिंग क्षमता को दिखाता है। आसान शब्दों में कहें तो यह सिर्फ बिजली बनाने वाली मशीन नहीं है, बल्कि भविष्य के लिए ‘ईंधन बनाने वाली फैक्ट्री’ भी है, जो भारत को ऊर्जा के मामले में आत्मनिर्भर बनाने में बड़ी भूमिका निभा सकती है।( अदिति फीचर्स )
रामस्वरूप रावतसरे