कमलेश पांडेय
देश-दुनिया में अमेरिकी वर्चस्व को चुनौती देने के लिए, उसके समर्थकों को मात देने के लिए, अपने अपने राजनीतिक प्रभाव, धार्मिक वर्चस्व और क्षेत्रीय दादागिरी को स्थायित्व देने के लिए पिछली शताब्दी में अनेक प्रयोग हुए, विभिन्न देशों पर आक्रमण किये गए या करवाए गए, यौद्धिक अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए सारे जहां में विभिन्न हथियार बंद गुट पैदा किए गए, करवाए गए और जो अशांति मचवाई गई, उससे मानवता और शासन दोनों आक्रांत हुए। सुन्नी एक्सिस ऐसी ही क्षुद्र कूटनीति का विस्तार है जो इजरायल के खिलाफ आक्रामक या उससे आत्मरक्षार्थ पहल भी समझा जा सकता है। हालांकि, इससे भारत विरोधी इस्लामिक ताकतों को भी बल मिलना स्वाभाविक है।
ऐसा नहीं है कि यह सबकुछ पहली बार हुआ, या हो रहा है, बल्कि जो क्षुद्र रणनीति प्राचीन कबीलाई सोच, मध्ययुगीन सामंती समाज और राजतंत्रीय शासकों के बीच कायम रही, जिसके तहत वे लोग एक दूसरे को मात देते, दिलाते फिरते थे, वही विनाशकारी सोच औद्योगिक क्रांति के बाद यूरोपीय कम्पनियों खासकर ब्रिटिश, फ्रांसीसी, डचेज और पुर्तगाली कम्पनियों के माध्यम से विश्वव्यापी आकार ग्रहण करती गई, जिससे उनके अपने-अपने उपनिवेश कायम हुए और उनमें भी एक दूसरे को मात देने की होड़ चली।
यही वजह है कि मनुष्य की युद्धगत प्रवृत्ति पर विराम नहीं लगा और हाथी-घोड़े, तलवार-भाले की लड़ाई आधुनिक वाहनों, हथियारों व बम-बारूद से लडी जाने लगी। इसी सैन्य व आर्थिक उन्माद वश प्रथम और द्वितीय विश्वयुद्ध भी हुए, जिससे यूरोपीय देशों और एशियाई जापान तक का पतन हुआ। इसी बीच मौके का फायदा अमेरिका और सोवियत संघ ने उठाया और क्रमशः पूंजीवाद और साम्यवाद के धूरी बन गए। लेकिन साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षाएं यहां भी नहीं थमीं, बल्कि अमेरिका ने चतुराई पूर्वक ब्रिटेन व पश्चिमी यूरोपीय देशों को साधकर मनोनुकूल विश्व व्यवस्था स्थापित की और रूस को पूर्वी यूरोप, एशिया व अफ्रीका तक में चुनौती देने लगा।
इसी बीच यूरोपीय एजेंट पाकिस्तान, और भारत के विश्वासघाती पंचशील मित्र चीन की हरकतों से एशियाई देश खरबूजा की तरह अमेरिका और सोवियत संघ (रूस) के बीच बंट गए। क्योंकि आत्मरक्षार्थ भारत ने जब सोवियत संघ यानी मौजूदा रूस के साथ भरोसेमंद सम्बन्ध स्थापित किए, तो अमेरिकी खलनीति को कड़ी टक्कर मिलने लगी। इससे परेशान अमेरिका ने सोवियत संघ में न केवल बिखराव के हालात पैदा कर दिए, बल्कि पूंजीपतियों को अपने पाले में करके रूस, चीन और भारत को अपने पक्ष में करके नचाने लगा।
अब अमेरिका की फितरत यह बनी कि रूस को यूक्रेन में, चीन को ताइवान व दक्षिण चीन सागर में तथा भारत को कश्मीर, लद्दाख और उत्तर-पूर्वी राज्यों में उलझाए रखकर अपने हथियार और ड्रग्स उद्योग को बढ़ावा दिया जाए। लेकिन चीन की नवसाम्राज्यवादी नीति और भारत की चतुर कूटनीति से अमेरिकी रणनीति धरी की धरी रह गई। प्रतिक्रिया वश तीनों देशों ने अमेरिका विरोधी रूख अख्तियार करने का प्लान बी तैयार कर लिया और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ब्रिक्स के गठन से जी-सात समूह परेशान रहने लगा।
ऐसा इसलिए कि अमेरिकी व यूरोपीय सहयोग से चीन और भारत ने आत्मविकास करके अब अमेरिका के लिए ही चुनौती बनकर उभर गए। वहीं, फ्रांस, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका, जापान जैसे देशों ने भी अमेरिकी निर्भरता घटाने के लिए भारत से सांठगांठ मजबूत कर ली। इससे अमेरिकी-यूरोपीय देशों को अरब और खाड़ी देशों तक में रुस-चीन-भारत की वैकल्पिक रणनीति से कड़ी टक्कर मिलने लगी।
चूंकि भारत अंतर्राष्ट्रीय मामलों में गुटनिरपेक्ष कूटनीतिक राजनीति करता है और रणनीतिक कूटनीतिक स्वायत्तता का हिमायती है, साथ ही रूस जैसे वफादार दोस्तों की कद्र करता है और चीन जैसे गद्दार दोस्तों को काबू में रखने के लिए ही अमेरिका-यूरोपीय-अरब देशों से भी मजबूत रिश्ते चाहता है, फिर भी भारत ने पूर्ण रूप से अमेरिकी नाटो के पाले में जाने से इनकार कर दिया और वन टू वन द्विपक्षीय रिश्तों व कारोबारी डील को तवज्जो देनी शुरू कर दी।
इससे अग्रसोची अमेरिका-चीन भारत से चिढ़ने लगे। फिर भारत को घेरने के लिए इस्लामिक चक्रब्यूह की रचना तेज हुई। पहले अब्राहम परिवार एकता, फिर इस्लामिक नाटो का गठन और अब सुन्नी एक्सिस के साइड इफेक्ट्स से निबटने के लिए भारत ने भी न केवल इजरायल, आर्मेनिया, ग्रीस बल्कि अफगानिस्तान, ईरान, यूएई, जैसे देशों को भी साधकर चल रहा है। ऐसा इसलिए कि पाकिस्तान, तुर्की, सऊदी अरब जैसे देश भारत विरोधी धुरी को मज़बूत कर चुके हैं और भारतीयों के विरुद्ध आतंकी चालें चल रहे हैं।
जानिए सुन्नी एक्सिस क्या है?
सुन्नी एक्सिस मुख्य रूप से तुर्की, कतर, पाकिस्तान और संभावित रूप से सऊदी अरब, मिस्र जैसे अरब देशों का उभरता गठबंधन है, जो ईरान के कमजोर होने के बाद मध्य पूर्व में रैडिकल सुन्नी विचारधारा (मसलन मुस्लिम ब्रदरहुड) पर आधारित है। यह इजरायल-विरोधी रुख अपनाते हुए क्षेत्रीय प्रभाव बढ़ाने का प्रयास है, जिसमें तुर्की की सैन्य शक्ति और कतर की वित्तीय सहायता प्रमुख हैं।
# सुन्नी धुरी का अरब राजनीति पर प्रभाव
यह एक्सिस सऊदी अरब की इजरायल के साथ अब्राहम समझौते जैसी नीतियों को बाधित कर सकता है, जिससे सऊदी का रुख अधिक आक्रामक या तुर्की-समर्थक हो सकता है। इससे मिस्र और यूएई जैसे देशों में मुस्लिम ब्रदरहुड विरोधी तनाव बढ़ेगा, क्योंकि तुर्की-कतर इस विचारधारा को बढ़ावा दे रहे हैं, जो अरब राजतंत्रों के लिए खतरा है। कुल मिलाकर, शिया-सुन्नी संतुलन सुन्नी पक्ष की ओर झुकेगा, जिससे यमन, सीरिया और लेबनान में नई प्रतिस्पर्धा और अस्थिरता पैदा हो सकती है।
आखिर सुन्नी एक्सिस की रणनीति क्या है?
सुन्नी एक्सिस, जिसमें तुर्की, कतर, पाकिस्तान और संभवतः सऊदी अरब प्रमुख हैं, इजरायल को सैन्य, कूटनीतिक और वैचारिक मोर्चों पर घेरने की रणनीति अपनाएगा। इसके दृष्टिगत तुर्की अपनी मजबूत सेना और नाटो सदस्यता का उपयोग कर क्षेत्रीय दबाव बनाएगा, जबकि कतर मीडिया (अल जजीरा) के जरिए इजरायल-विरोधी प्रचार चला रहा है।
पाकिस्तान के परमाणु और गठबंधन का खतरा
पाकिस्तान की परमाणु क्षमता इस एक्सिस को ‘न्यूक्लियर रियर’ प्रदान करती है जो इजरायल की पारंपरिक श्रेष्ठता को चुनौती देते हुए तुर्की को अप्रत्यक्ष परमाणु छत्रछाया दे सकती है। वहीं यह गठबंधन सऊदी को इजरायल के साथ अब्राहम समझौते से दूर खींचकर अरब देशों को एकजुट करेगा, जिससे इजरायल बहिष्कृत हो सकता है।
सुन्नी एक्सिस से पैदा होने वाली दीर्घकालिक चुनौतियाँ
तुर्की के शासक एर्दोगन की चतुर कूटनीति मुस्लिम ब्रदरहुड जैसी विचारधाराओं को बढ़ावा देकर फिलिस्तीन मुद्दे पर सुन्नी एकता पैदा करेगी, जो इजरायल के लिए ईरान जैसी लेकिन अधिक संगठित धमकी बनेगी। नेफ्ताली बेनेट की चेतावनी के अनुसार, इजरायल को अब रक्षात्मक से आक्रामक रणनीति अपनानी पड़ेगी।
तुर्की का “M-प्लान” इजरायल के खिलाफ
तुर्की का “M-प्लान” इजरायल के खिलाफ एक कथित रणनीतिक योजना को संदर्भित करता है, जो हालिया मीडिया रिपोर्ट्स में उभरा है। यह मुख्यतः सुन्नी एक्सिस के संदर्भ में एर्दोगन की कूटनीति से जुड़ा है। यह प्लान तुर्की की क्षेत्रीय महत्वाकांक्षा पर आधारित है, जिसमें मुस्लिम ब्रदरहुड जैसी विचारधाराओं को बढ़ावा देकर सऊदी और अन्य अरब देशों को इजरायल-विरोधी मोर्चे पर एकजुट करना शामिल है। वहीं, तुर्की सीरिया में प्रॉक्सी गुटों (जैसे विद्रोहियों) का उपयोग कर इजरायल की उत्तरी सीमाओं पर दबाव बनाएगा, साथ ही कतर के साथ मिलकर अल जजीरा जैसे मीडिया के जरिए प्रचार चलेगा।
सुन्नी एक्सिस के सैन्य आयाम
तुर्की अपनी नई हाइपरसोनिक मिसाइलों (टायफून ब्लॉक-4) और ड्रोन क्षमताओं से इजरायल को 2000 किमी रेंज में धमकी देगा, जबकि पाकिस्तान की परमाणु ताकत अप्रत्यक्ष समर्थन देगी। एर्दोगन का लक्ष्य ओटोमन प्रभाव बहाल करना है, जो इजरायल को ईरान से भी बड़ा खतरा बना सकता है।
इजरायल की दमदार प्रतिक्रिया और इजरायल, ग्रीस और साइप्रस का गठबंधन
इजरायल नागेल कमेटी की सिफारिशों के तहत तुर्की के खिलाफ रक्षा बजट बढ़ा रहा है, ग्रीस-साइप्रस के साथ गठबंधन बना रहा है, और लंबी दूरी की हथियार क्षमता मजबूत कर रहा है। इससे मध्य पूर्व में नया तनाव बढ़ेगा।
इजरायल, ग्रीस और साइप्रस का गठबंधन पूर्वी भूमध्य सागर में तुर्की की आक्रामकता का मुकाबला करने के लिए बनाया गया है। यह रैपिड रिस्पॉन्स फोर्स (RRF) पर आधारित है, जिसमें हवाई, नौसेना और थलसेना का संयुक्त उपयोग होगा।
इजरायल, ग्रीस और साइप्रस का गठबंधन की सैन्य ताकत
गठबंधन की मुख्य शक्ति इजरायल की IDF (एयर फोर्स, खुफिया और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध) है, जो ग्रीस की मजबूत वायुसेना के साथ मिलकर तुर्की को हवाई श्रेष्ठता में चुनौती देगी। प्रस्तावित 2,500 सैनिकों वाली यूनिट (इजरायल-ग्रीस से 1,000-1,000, साइप्रस से 500) पूर्वी भूमध्य क्षेत्र में तुर्की की गतिविधियों को रोक सकेगी। रणनीतिक लाभयह गठबंधन गैस पाइपलाइन (ग्रेट सी इंटरकनेक्टर) और IMEC कॉरिडोर की सुरक्षा सुनिश्चित करेगा, साथ ही अमेरिका के 3+1 प्रारूप से मजबूती मिलेगी। तुर्की के मुकाबले सामूहिक रूप से यह संतुलन बदल सकता है, हालांकि अभी योजना चरण में है।
इजरायल-ग्रीस-साइप्रस गठबंधन में भारत की भूमिका
भारत इजरायल-ग्रीस-साइप्रस गठबंधन (जिसे कभी-कभी मेडिटेरेनियन क्वाड कहा जाता है) में अप्रत्यक्ष लेकिन महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। यह भूमिका तुर्की-पाकिस्तान-सऊदी सुन्नी एक्सिस के खिलाफ संतुलन बनाने में सहायक होगी। जहां तक रणनीतिक साझेदारी की बात है तो भारत इजरायल के साथ मजबूत रक्षा सहयोग (ड्रोन, मिसाइल सिस्टम) को बढ़ाते हुए ग्रीस-साइप्रस को हथियार आपूर्ति और खुफिया साझा कर सकता है। वहीं, IMEC कॉरिडोर (भारत-मध्य पूर्व-यूरोप) की सुरक्षा में भारत की नौसेना भूमिका निभाएगी, जो तुर्की की गतिविधियों को सीमित करेगी।
जहां तक संभावित योगदान की बात है तो तकनीकी समर्थन बढ़ेगा, यानी भारत ब्रह्मोस मिसाइल, आकाश एयर डिफेंस जैसे सिस्टम ग्रीस को उपलब्ध कराएगा। वहीं कूटनीतिक वजन के फलस्वरूप QUAD और I2U2 जैसे मंचों से अमेरिकी समर्थन जुटाएगा, जिससे गठबंधन मजबूत होगा। जहां तक आर्थिक हित की बात है तो गैस पाइपलाइन (ईस्ट मेड गैस फोरम) में निवेश से ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करनी होगी। । यह भारत को पाकिस्तान-तुर्की धुरी के खिलाफ पूर्वी भूमध्य में सशक्त स्थिति देगा हालांकि पूर्ण सदस्यता की बजाय साझेदार भूमिका अधिक संभावित है।
कमलेश पांडेय