सोशल मीडिया के इस दौर में कैसे करें लेखन कार्य ?

सुनील कुमार महला


लिखना भी एक कला है। पहले पत्र-लेखन किया जाता था। अंतर्देशीय पत्र, पोस्टकार्ड लिखे जाते थे, डायरी लिखने की भी परंपरा थी। पत्र-लेखन की और डायरी लेखन की परंपरा आज भी है लेकिन आज सूचना क्रांति, तकनीक और सोशल नेटवर्किंग साइट्स का दौर है। काग़ज़-कलम लेकर आज विरले ही लोग लिखते हैं। ई-मेल, इंटरनेट का प्रयोग किया जाने लगा है। सोशल नेटवर्किंग साइट्स का प्रयोग करके लोग आजकल खूब लिख रहे हैं। जैसा कि ऊपर बता चुका हूं कि लिखना एक कला है, हर कोई नहीं लिख सकता है। कुछ लिखने के लिए विचारों की आवश्यकता होती है, चिंतन-मनन की आवश्यकता होती है। कौनसे सब्जेक्ट पर और कितना लिखना है, कैसे लिखना है, उसके बारे में हम सभी को जानकारी होनी चाहिए,तभी अच्छा लेखन कार्य किया जा सकता है।

वास्तव में कुछ भी लिखते समय हमें यह ध्यान में रखना चाहिए कि हम जो भी लिखें वह सत्य पर आधारित हो,सही हो। संक्षिप्तीकरण तो लिखने का आवश्यक तत्व है ही। हम जो भी लिखें वह पूर्ण ईमानदारी और निष्ठा से लिखें, क्यों कि ‘कलम बोलती है।’ यूं ही नहीं कहा गया है कि ‘कलम की धार तलवार की धार से भी तेज होती है।’ लिखते समय हम कभी भी अपनी निजता का गुणगान न करें। न तो दूसरों को खुश करने के लिए ही लिखें और न ही कुछ ऐसा लिखें जिससे दूसरे पढ़ें तो उन्हें अजीब, अटपटा सा लगे या अच्छा नहीं लगे। आज पत्र-पत्रिकाएं, अखबार, प्रिंट मीडिया अच्छे संक्षिप्त लिखे, सत्यता पर आधारित लेखों/आलेखों को स्थान देती है। कुछ भी अंट-शंट लिखे को पत्र-पत्रिकाओं और अखबारों में स्थान नहीं दिया जाता।

पहले विशेषकर अखबारों में पाठक-पीठ स्तंभ में शानदार -जानदार पत्र छपा करते थे, शब्द-सीमा भी काफी होती थी,आज नहीं है। आज अखबारों में अधिकाधिक पाठकों को स्थान देने की कोशिश की जाती है और पाठकों के पत्र आठ-दस पंक्तियों तक ही सिमट गये हैं। संपादकीय पृष्ठ पर भी आज पहले की भांति एकाध राइटर्स को स्थान नहीं दिया जाता, अपितु संपादकीय पृष्ठ पर चार या पांच राइटर्स तक को स्थान मिलता है। अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं के कलेवर, साज-सज्जा और ले-आउट में भी काफी परिवर्तन आ गये हैं। सच तो यह है कि प्रिंट मीडिया में आज पहले की तुलना में आमूलचूल परिवर्तन आए हैं। लिखते समय हमारी भाषा भी क्लिष्ट नहीं होनी चाहिए। सच तो यह है कि 

जो भी लिखा जाए उसे आसान और बोलचाल के शब्दों में ही लिखा जाना चाहिए, जिससे कि अधिक से अधिक लोग उसको आसानी से पढ़ और समझ सकें। हमारे विचार तथ्यों और सूचनाओं पर आधारित होने चाहिए। लिखने के लिए विषय की पूरी जानकारी होना तो आवश्यक है ही। लिखने पर हमारी पकड़ भी बहुत मजबूत होनी चाहिए और हमारी शब्दावली भी अच्छी होना बहुत जरूरी है। लिखने से पहले पृष्ठभूमि सामग्री जुटाई जाना बहुत ही आवश्यक और जरुरी है। सोशल नेटवर्किंग साइट्स के इस दौर में लिखना पहले की तुलना में आसान जरूर हो गया है लेकिन एक लेखक को कट, कॉपी और पेस्ट की आदत से बचना चाहिए और मूल रूप से लिखना चाहिए। लेखन में मूल कार्य का होना लेखक को प्रतिष्ठा, मान-सम्मान दिला सकता है और उसे बुलंदियों पर पहुंचा सकता है। एक अच्छा लेख किसी के लिए मार्गदर्शक बन सकता है। आर्टिकल में प्रासंगिक संदर्भ लेख को बेहतर बनाते हैं। कुछ भी लिखा जाए तो उसे उचित शीर्षक दिया जाना चाहिए ताकि संपादक को किसी प्रकार की कोई परेशानी न आए।

लिखने से हमारी इम्यूनिटी बूस्ट होती है,हमारा तनाव और अवसाद कम होता है। मनुष्य की भावनात्मक सेहत में सुधार आता है। काग़ज़ पर लिखने से हमारी हैंडराइटिंग भी शनै:शनै: अच्छी हो जाती है।हाथों से लिखने के दौरान कई तरह की ज्ञानेन्द्रियां काम करती हैं और इससे हमारा मस्तिष्क मांसपेशियों और उंगलियों के पोरों से प्रतिक्रिया हासिल करता है। लिखना व्यक्ति में फील गुड हार्मोन यानी कि एन्डॉर्फिन का निर्माण करता है। कहना ग़लत नहीं होगा कि लिखने से हमें मानसिक शांति और सुकून व खुशी का अहसास होता है। कारण यह है कि लिखने से हम अपने विचारों को आसानी से व्यक्त कर पाते हैं। लिखने से हम हमारी सोचने की प्रक्रिया को आसानी से जाहिर कर सकते हैं। हमारी सीखने की क्षमता के साथ ही हमारी क्रिएटिविटी भी लिखने से बढ़ती है।

सुनील कुमार महला

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