सौरभ वार्ष्णेय
पश्चिम बंगाल की राजनीति में नए समीकरण बनने की आहट अक्सर सियासी बहस को तेज कर देती है। हाल के दिनों में हुमायु कबीर और ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन के संभावित गठबंधन की चर्चा इसी संदर्भ में देखी जा रही है। सवाल यह है कि क्या इससे तृणमूल कांग्रेस कमजोर होगी? जबकि ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस पार्टी (टीएमसी) की पकड़ बहुत मजबूत है। गांव-गांव ममता की की छवि प्रभावशील नेता के रूप में विख्यात है। ममता दीदी के नाम से सब जगह उन्हें प्यार दुलार के रूप में देखा जाता है। ममता को कम आंकना बेइमानी होगी। वहीं भाजपा को अन्य राज्यों में हुए चुनाव में समीकरण देखने से पता चता है कि आवेसी की पार्टी ने कुछ हद तक प्रभाव डाला है। अब ऐसे में ममता की तीसरी पारी कैसी होगी यह समय के गर्त में है।
पश्चिम बंगाल का चुनाव ऐसे समय हो रहा है जहां विश्व में कई देश में युद्ध की आग में झुके हुए हैं जिससे पूरे विश्व में चीजें अवरुद्ध हो रही है। ऐसे ही युद्ध चलता रहा तो निश्चित ही महंगाई भी चरम सीमा पर हेागी। अगर देखा जाये तो वोट बैंक की राजनीति और प्रभावित होगी। पश्चिम बंगाल में मुस्लिम वोट बैंक एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, जो अब तक बड़े पैमाने पर टीएमसी के साथ रहा है। ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन की रणनीति आमतौर पर इसी वोट बैंक में सेंध लगाने की रही है, जैसा कि उसने बिहार और अन्य राज्यों में करने की कोशिश की। यदि हुमायु कबीर जैसे स्थानीय प्रभाव वाले नेता ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन के साथ आते हैं तो कुछ इलाकों में वोटों का बंटवारा संभव है
हालांकि, यह मान लेना जल्दबाजी होगी कि इससे टीएमसी को बड़ा नुकसान होगा। इसके पीछे कुछ कारण हैं संगठनात्मक मजबूती ममता बनर्जी के नेतृत्व में जमीनी नेटवर्क काफी मजबूत है। स्थानीय बनाम बाहरी छवि बंगाल की राजनीति में बाहरी बनाम स्थानीय का मुद्दा अहम रहता है, और ओवेसी की पार्टी को अक्सर बाहरी पार्टी के रूप में देखा जाता है।
वोट ट्रांसफर की चुनौती:
गठबंधन बनने के बावजूद वोटों का पूरी तरह ट्रांसफर होना आसान नहीं होता। किन क्षेत्रों में असर संभव? सीमावर्ती जिलों और मुस्लिम बहुल सीटों—जैसे मुर्शिदाबाद, मालदा, उत्तर दिनाजपुर—में इसका कुछ असर दिख सकता है लेकिन यह असर अधिकतर ञ्जरूष्ट को हराने की बजाय विपक्षी वोटों के और बिखराव के रूप में सामने आ सकता है। दिलचस्प बात यह है कि इस तरह के गठबंधन का अप्रत्यक्ष फायदा भारतीय जनता पार्टी को मिल सकता है। यदि विपक्षी वोट बंटते हैं, तो त्रिकोणीय मुकाबले में भाजपा को बढ़त मिल सकती है।
हुमायु कबीर गठबंधन के लिए स्थानीय स्तर पर चुनौती जरूर खड़ी कर सकता है, लेकिन इसे टीएमसी की व्यापक कमजोरी के रूप में देखना अभी उचित नहीं होगा। यह ज्यादा संभावना है कि इससे विपक्षी खेमे में वोटों का विभाजन बढ़े, जिसका लाभ किसी तीसरे पक्ष को मिल सकता है। कुल मिलाकर, यह गठबंधन बंगाल की राजनीति में हलचल तो पैदा करेगा, लेकिन टीएमसी की जड़ों को हिलाने के लिए अभी और मजबूत, व्यापक और संगठित चुनौती की जरूरत है।
ममता का संघर्ष, सादगी और सियासत की मिसाल
भारतीय राजनीति में ममता का नाम एक ऐसे नेता के रूप में लिया जाता है, जिन्होंने ज़मीनी संघर्ष से सत्ता के शिखर तक का सफर तय किया। उनका राजनीतिक जीवन केवल पद और सत्ता की कहानी नहीं बल्कि जिद, जनसंपर्क और निरंतर संघर्ष की दास्तान है। ममता बनर्जी का जन्म 5 जनवरी 1955 को हुआ। साधारण परिवार से आने वाली ममता ने कम उम्र में ही राजनीति में दिलचस्पी दिखानी शुरू कर दी थी। उन्होंने छात्र जीवन से ही सक्रिय राजनीति में भाग लिया और जल्द ही इंडियन नेशनल कांग्रेस से जुड़ गईं। 1970-80 के दशक में उन्होंने कांग्रेस के युवा चेहरों में अपनी पहचान बनाई। 1984 में उन्होंने पहली बार लोकसभा चुनाव जीतकर राष्ट्रीय स्तर पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। तृणमूल कांग्रेस की स्थापना ऐसे समय में हुई जब समय के साथ कांग्रेस में मतभेद बढऩे लगे। 1998 में ममता बनर्जी ने अलग हो कर तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की स्थापना की। यह कदम उनके राजनीतिक जीवन का सबसे बड़ा मोड़ साबित हुआ। टीएमसी ने धीरे-धीरे पश्चिम बंगाल में अपनी पकड़ मजबूत की और वाम मोर्चे के लंबे शासन को चुनौती दी। 34 वर्षों से सत्ता में रही सरकार को 2011 में ममता बनर्जी ने सत्ता से बेदखल कर दिया। यह पश्चिम बंगाल की राजनीति में ऐतिहासिक परिवर्तन था। ममता बनर्जी राज्य की पहली महिला मुख्यमंत्री बनीं और उन्होंने खुद को दीदी के रूप में जनता के बीच स्थापित किया। ममता बनर्जी की राजनीति की सबसे बड़ी विशेषता उनकी सादगी और जनसंवाद है। वे अक्सर सीधे जनता के बीच जाती हैं और खुद को एक आम नागरिक के रूप में प्रस्तुत करती हैं।
उनकी सरकार ने कई सामाजिक योजनाएं शुरू कीं, जैसे— कन्याश्री योजना (महिला सशक्तिकरण), सबुज साथी (छात्रों के लिए साइकिल), स्वास्थ्य और शिक्षा क्षेत्र में सुधार, विवाद और चुनौतियां आदि।
हर बड़े नेता की तरह ममता बनर्जी का सफर भी विवादों से अछूता नहीं रहा। विपक्ष अक्सर उन पर तुष्टिकरण की राजनीति का आरोप लगाता है। केंद्र और राज्य के बीच टकराव भी उनकी राजनीति का हिस्सा रहा है। चुनावी हिंसा और प्रशासनिक फैसलों पर भी सवाल उठते रहे हैं।
ममता बनर्जी का राजनीतिक जीवन यह साबित करता है कि दृढ़ इच्छाशक्ति और जनसमर्थन से असंभव भी संभव हो सकता है। उन्होंने पश्चिम बंगाल की राजनीति को नई दिशा दी और खुद को राष्ट्रीय राजनीति में एक प्रभावशाली नेता के रूप में स्थापित किया। आज वे केवल एक मुख्यमंत्री नहीं बल्कि विपक्षी राजनीति की एक मजबूत आवाज भी हैं—जो सत्ता के खिलाफ खड़े होने का साहस रखती हैं।
पश्चिम बंगाल की राजनीति एक बार फिर निर्णायक मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है। आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर जिस तरह का माहौल बन रहा है, उसमें भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) अपनी जीत की संभावनाओं को लेकर आश्वस्त नजर आ रही है। सवाल यह है कि क्या वास्तव में भाजपा पश्चिम बंगाल में सत्ता की दहलीज पार कर पाएगी, या फिर तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) एक बार फिर अपनी पकड़ मजबूत बनाए रखेगी।
भाजपा अपने पक्ष में बनाती माहौल
भाजपा ने पिछले कुछ वर्षों में पश्चिम बंगाल में संगठन को मजबूत करने पर विशेष ध्यान दिया है। बूथ स्तर तक कार्यकर्ताओं की सक्रियता, केंद्रीय नेतृत्व की लगातार रैलियां और हिंदुत्व के मुद्दों को उभारने की रणनीति पार्टी को एक मजबूत चुनौतीकर्ता बना रही है। इसके अलावा, केंद्र की योजनाओं का लाभ जनता तक पहुंचाने का प्रयास भी भाजपा के लिए सकारात्मक कारक बन सकता है। ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली टीएमसी को सत्ता विरोधी लहर, भ्रष्टाचार के आरोप और आंतरिक असंतोष जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। कई बड़े नेताओं का पार्टी छोडऩा भी टीएमसी के लिए चिंता का विषय है हालांकि, ममता बनर्जी की व्यक्तिगत लोकप्रियता और जमीनी पकड़ अभी भी पार्टी की सबसे बड़ी ताकत बनी हुई है। पश्चिम बंगाल में चुनाव केवल विकास के मुद्दों पर नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान के आधार पर भी लड़े जाते हैं। भाजपा जहां हिंदू वोट बैंक को एकजुट करने की कोशिश में है, वहीं टीएमसी अल्पसंख्यक और ग्रामीण वोटरों पर अपनी पकड़ बनाए रखने में जुटी है। यह कहना जल्दबाजी होगी कि भाजपा स्पष्ट रूप से जीत की ओर बढ़ रही है लेकिन इतना जरूर है कि मुकाबला अब पहले से कहीं अधिक कांटे का हो गया है। भाजपा ने अपनी उपस्थिति को मजबूत किया है, परंतु टीएमसी को पूरी तरह कमजोर मान लेना राजनीतिक भूल होगी।
पश्चिम बंगाल का चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन का प्रश्न नहीं बल्कि राज्य की राजनीतिक दिशा तय करने वाला होगा। भाजपा के लिए यह अवसर है कि वह अपनी बढ़त को जीत में बदले, जबकि टीएमसी के लिए यह अपनी साख और वर्चस्व बनाए रखने की परीक्षा है। अंतिम निर्णय जनता के हाथ में है, और वही तय करेगी कि राज्य की बागडोर किसे सौंपी जाए।
सौरभ वार्ष्णेय