शम्भू शरण सत्यार्थी
अचानक विलियम मार्क टली का नाम सुनते ही समय जैसे पीछे लौट गया। नई दिल्ली में उनके निधन की खबर आई और उसके साथ ही पत्रकारिता के एक पूरे युग के अंत का एहसास हुआ। यह सिर्फ़ किसी एक वरिष्ठ पत्रकार के जाने की सूचना नहीं थी, बल्कि उस भरोसे, उस नैतिकता और उस साहस के विदा होने की खबर थी जो कभी पत्रकारिता की पहचान हुआ करती थी।
जब मैं किशोरावस्था में था और पिताजी युवा कम्युनिस्ट और शिक्षक, उनका विश्वास था कि बी बी सी सही खबर देता है। मुझे भी यह विश्वास पुख्ता होते गया और मैं भी नियमित रूप से बी बी सी का समाचार सुनने का फैन हो गया। वह समय आज बहुत साफ़ याद आता है। तब बीबीसी का समाचार सुनना कोई साधारण आदत नहीं थी बल्कि सच जानने की एक मजबूरी थी। उस दौर में भारतीय मीडिया पर आम लोगों का भरोसा लगभग खत्म हो चुका था। लोगों को लगता था कि भारतीय मीडिया सरकार का मीडिया है। सत्ता जो कहना चाहती है, वही खबर बनती है, वही सच घोषित कर दिया जाता है। और यह धारणा पूरी तरह गलत भी नहीं थी।
ऐसे माहौल में बीबीसी की आवाज़ एक भरोसे की आवाज़ थी। जब बीबीसी कहता था, तो लगता था कि यह खबर सरकार नहीं, सच्चाई सुना रही है। करोड़ों भारतीयों के लिए बीबीसी सिर्फ़ एक विदेशी प्रसारण संस्था नहीं थी बल्कि एक वैकल्पिक जनमाध्यम था और बीबीसी की उस विश्वसनीयता का सबसे मजबूत चेहरा थे—विलियम मार्क टली।
जब चारों तरफ़ डर, निगरानी और असुरक्षा का माहौल होता था, तब बीबीसी की आवाज़ यह तसल्ली देती थी कि सच को पूरी तरह दबाया नहीं जा सकता। वह ट्रांजिस्टर सिर्फ़ समाचार सुनने का साधन नहीं था बल्कि यह एहसास दिलाने वाला उपकरण था कि झूठ के इस शोर के बीच भी कहीं न कहीं सच ज़िंदा है।
बीबीसी के ज़रिये, मार्क टली के हवाले से ही जगदेव प्रसाद की शहादत की खबर देश और दुनिया तक पहुँची। उस समय ऐसी खबरों को सामने लाना आसान नहीं था। सत्ता असहज सच्चाइयों को दबाने में पूरी ताक़त झोंक देती थी लेकिन बीबीसी और मार्क टली ने वह जोखिम उठाया जो भारतीय मीडिया उठाने की हिम्मत नहीं कर पा रहा था।
प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या की खबर हो या बाबरी मस्ज़िद विध्वंस जैसी ऐतिहासिक और देश को झकझोर देने वाली घटना—इन सबकी पहली प्रामाणिक, संतुलित और तथ्यपरक सूचना सबसे पहले बीबीसी ने ही दी और इसके पीछे वह पत्रकारिता थी, जो सत्ता की अनुमति से नहीं, अपने विवेक से काम करती थी।
मार्क टली अंग्रेज़ थे लेकिन भारत उनके लिए सिर्फ़ एक पोस्टिंग नहीं था। वे यहाँ आए, यहाँ रहे और यहीं के हो गए। उन्होंने भारत को सतही तौर पर नहीं देखा। उन्होंने भारत की आत्मा को समझने की कोशिश की—उसके गाँवों में, उसकी गलियों में, उसके संघर्षों में। उनकी पत्रकारिता सिर्फ़ सत्ता के गलियारों तक सीमित नहीं थी। वह आम आदमी की ज़िंदगी, उसकी पीड़ा, उसके सवाल और उसके संघर्ष से जुड़ी हुई थी।
इसीलिए धीरे-धीरे वे सिर्फ़ बीबीसी के संवाददाता नहीं रहे। वे करोड़ों भारतीयों के लिए भरोसेमंद आवाज़ बन गए। एक ऐसा विदेशी, जो भारत को किसी औपनिवेशिक नज़र से नहीं बल्कि इंसानी नज़र से देखता था। एक ऐसा पत्रकार, जो भारत को समझने के लिए भारतीय बन गया।
आदर्श पत्रकारिता की कसौटी पर अगर किसी को परखा जाए, तो मार्क टली निस्संदेह खरे उतरते हैं। उन्होंने कभी यह नहीं पूछा कि सत्ता को क्या पसंद आएगा। उन्होंने यह पूछा कि सच क्या है। उन्होंने सरकारों की सुविधा के अनुसार खबरें नहीं बनाईं, बल्कि घटनाओं की सच्चाई को सामने रखा। यही कारण है कि उनकी रिपोर्टिंग आज भी उदाहरण के तौर पर याद की जाती है।
आज के दौर में, जब मीडिया का बड़ा हिस्सा सत्ता के चारों ओर घूमता दिखाई देता है, जब सवाल पूछने वालों को देशद्रोही कहा जाने लगता है, तब मार्क टली जैसे पत्रकार और भी ज़्यादा याद आते हैं। वे याद दिलाते हैं कि पत्रकारिता का असली धर्म क्या होता है। पत्रकारिता का काम सत्ता की पीठ थपथपाना नहीं, बल्कि उसे सवालों के कटघरे में खड़ा करना है।
मार्क टली ने अपने जीवन से यह साबित किया कि सच की कोई राष्ट्रीयता नहीं होती। सच न तो अंग्रेज़ होता है, न भारतीय। सच बस सच होता है। और जो उसके साथ खड़ा होता है, वही सच्चा पत्रकार कहलाने का हक़दार होता है।
उन्होंने भारतीय लोकतंत्र के कई निर्णायक और कठिन क्षणों को अपने शब्दों में दर्ज किया। वे उन चंद पत्रकारों में थे जिनकी रिपोर्टिंग इतिहास का दस्तावेज़ बन गई। आने वाली पीढ़ियाँ जब इस दौर को समझने की कोशिश करेंगी, तो मार्क टली की पत्रकारिता उन्हें सच के करीब ले जाएगी।
आज उनके जाने से जो खालीपन बना है, वह सिर्फ़ व्यक्तिगत नहीं है। यह उस पत्रकारिता परंपरा का खालीपन है, जिसमें नैतिक साहस, पेशेवर ईमानदारी और जनता के प्रति जवाबदेही सर्वोपरि थी। यह उस दौर का खालीपन है, जब खबरें डरकर नहीं, विवेक से लिखी जाती थीं।
लेकिन उनके जाने के साथ यह भरोसा भी बचता है कि मार्क टली जैसे पत्रकारों की विरासत पूरी तरह खत्म नहीं होगी। उनकी पत्रकारिता आने वाली पीढ़ियों के लिए एक कसौटी बनी रहेगी—कि पत्रकार होना क्या होता है और क्यों होता है।
विलियम मार्क टली सिर्फ़ बीबीसी के पूर्व संवाददाता नहीं थे।
वे सच के सिपाही थे। वे उस पत्रकारिता के प्रतीक थे, जो सत्ता से नहीं, समाज से संवाद करती है। विलियम मार्क टली को सादर नमन। सच के साथ खड़े रहने वाले एक सच्चे पत्रकार को विनम्र श्रद्धांजलि।
शम्भू शरण सत्यार्थी