मैं इस देश का आवाम नही , सिर्फ वोटर हूँ !

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voterअब्दुल रशीद

छियासठ साल पहले विदेशी सत्ता से मुक्त होने के बाद से हर साल 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस के रुप में राष्ट्रीय पर्व मनाया जाता रहा है,और आज भी बड़े धूमधाम से मनाया जा रहा है। कहीं देशभक्ति के नारे लगाए जा रहें हैं तो कहीं शहीदों के नाम के कसीदे पढे जा रहे हैं। मैं भी इसी जश्न को मानाने में शरीक हूँ, लेकिन जब मेरी नज़र भूखे नंगे बच्चों पर पड़ती है तो मेरी आंखे भर आती है, और मन में सवाल उठता है की आज़ादी क्या चंद लोगों को नसीब हुआ है, यदि ऐसा नहीं तो इस देश में किसान आत्महत्या क्यों करते है? और भूखे नंगे बच्चे सड़को पर भीख क्यों मांगते नजर आते है? मां बहने घर के बाहर महफूज़ क्यों नहीं? कुछ लोग कहेंगे के यह सही वक्त़ नहीं है बात करने का, आखिर छ: द्शक गुजरने के बाद आज भी हम गरीबी मिटाने की सियासी बात तो कर ही रहें हैं न, तो क्यों न ईमानदारी से बात करें? हमारे बड़े और बुजुर्ग हमें बचपन से यह बात समझाते रहें कि कुशासन व अन्याय करने वाली विदेशी राज से देश आजाद हो चुका है। अब अपने लोग, अपने लोगों वाली,अपनी सरकार होने की खुशी मे हम लोग हर साल आजादी का जश्न मनाते ,तिरंगा लेकर प्रभातफेरी निकालते हैं और छोटा सा बालक मैं तब उन्हें कौतुहल भरे नज़रों से निहारा करता था। आज अपने जीवन के 32वें साल मे मै फिर वही मंजर देख रहा हूँ। हांथों मे तिरंगा लिये आज फिर लोग सड़कों पर हैं और बच्चे प्रभातफेरी करते खुश हो रहे हैं। क्या उन्हे पता है कि आजादी का मतलब क्या है।
विदेशी शासन से आजादी पाने के बाद हमारे देश के संविधान निर्माताओं ने देश के हर नागरिक की सत्ता मे भागीदारी सुनिश्चित करने के लिये जो नियम कानून बनाये उस चुनावी प्रणाली वाले संविधान का ही एक नाम है “लोकतंत्र”। संविधान के प्रस्तावना में ही समस्त नागरिकों की विचार,अभिव्यक्ति,विश्वास,धर्म और उपासना की स्वतंत्रता को सुनिश्चित करने का जिक्र किया गया। इस संविधान की न्यायिक व्यवस्था मे देश के सभी नागरिकों को एक समान आधिकार दिये गये । इस व्यवस्था मे न कोई बडा है न कोई छोटा न कोई अमीर है न कोई गरीब। कहने को तो अपने मूलभूत अधिकारों के साथ सभी लोग सम्मान जनक रूप से जीने को आजाद हैं ,लेकिन इस भ्रष्ट तंत्र में आम नागरिक के लिए आजादी के मायने है क्या? जन्म मृत्यु प्रमाण पत्र बनवाने तक के लिए तो देश के तंत्र को चढावा चढाना पड़ता है।
आसानी से न्याय मिलने कि बात तो छोडिये, मूलभूत अधिकार भी आजादी के 66 साल बाद आम नागरिक के लिए कस्तूरी मृग बना हुआ है। कारण राजनैतिक माया जाल में फंसा आम नागरिक रोजी रोटी के लिए इतना उलझकर रह गया के उसे अपने अधिकार का बोध ही न रहा। सूचना पाने के अधिकार को कुचला जा रहा है। दो साल की सजा भुगत चुके लोगों को चुनाव लड़ने से रोकने वाले सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को बदलने की कोशिश की जा रही है। दान मे मिलने वाली रकम को राजनैतिक दल सार्वजनिक करने को तैयार नहीं और आरटीआई का अधिकार छीनने की तैयारी करने में लगे हैं । पारदर्शी एवं सशक्त जन लोकपाल न लाकर लोकतांत्रिक तानाशाही का दरवाजा खोल दिया गया है। जीविका के हर संसाधन पर भ्रष्टाचार का बोलबाला है और मंहगाई के बोझ तले आम जनता दबी जा रही है, तो ऐसे हालात में स्वतंत्र है कौन?
स्वतंत्र भरत की पहली स्वदेसी सरकार से अब तक सत्ता की पुश्तैनी पकड़ के लालच मे आमजनता को बराबर बांटा गया। पहले बहुसंख्यक व अल्पसंख्यक मे बांटे गये और फिर धार्मिक रूप से भी आपस मे अलग थलग कर दिए गये। सवर्णों व कुवर्णों मे बाटने से जब काम नही चला तो हमे जातिवादी बेडियों मे जकड़ दिया गया।स्थिति ऐसी बना दी गयी है कि आम नागरिक के मन में नफरत के बीज पड़ गए और एक दूसरे से समाजिक सरोकार का लेस मात्र ही बस दिखाई पड़ रहा है। यह संकीर्ण मानसिकता नहीं तो और क्या है, के अब अधिकांशतः लोग पार्टी की बात करते हैं देश की बात कम ही लोग करते हैं। हमारी पार्टी का नेता है तो सही है भले ही वह अपराध के दलदल में सर से पांव तक सना हो। यही कारण है के राजनैतिक बंदरबांट के खेल में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप मे शामिल हो कर हम संकीर्णता के गुलाम हो चुके हैं। और हम आजाद भारत मे भी आपस मे बंट कर वोट बैंक बन कर रह गये हैं।
अब मैं इस देश का आवाम नही , सिर्फ वोटर हूँ। जिसका इस्तेमाल सत्ता पाने के लिए राजनैतिक दल करते हैं। क्या यही पहचान बन कर रह जाएंगी आज़ाद भारत के नागरिकों की ? या वह दिन भी आएगा जब सत्ता आम नागरिक के लिए होगा, और तंत्र लोक के लिए काम करेगा? ऐसा समय आएगा,यकीनन आएगा लेकिन उसके लिए हमें जाति – धर्म, अल्पसंख्यक – बहुसंख्यक जैसी मनोरोग से उपर उठना होगा,और देशप्रेम की भावना का अलख जगाना होगा, तभी हम राजनैतिक कुचक्र को तोड़ पाएँगें और आने वाली पीढी को स्वतंत्रता का वास्तविक मतलब समझा पाएंगे।

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