राजनीति विधि-कानून

मतांतरण और आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला

राजेश कुमार पासी

मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने बहुत महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है जो देश की राजनीतिक और सामाजिक व्यवस्था की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है। इसके अलावा देश की धार्मिक व्यवस्था पर भी इसका बड़ा असर होने वाला है। संविधान में आरक्षण की व्यवस्था केवल धार्मिक आधार पर की गई है, क्योंकि जातिगत भेदभाव हिन्दू धर्म का हिस्सा है। इस्लाम और ईसाईयत दोनों ही विदेशी धर्म हैं जिनमें जातियां नहीं होती हैं। जो दलित और आदिवासी धर्मांतरण करके इन धर्मों में चले गए हैं, उनके लिए कई वर्षों से इस समुदाय को मिलने वाली रियायतों की मांग की जा रही है। बहुत कोशिश करने के बाद भी ये काम नहीं हो सका क्योंकि संविधान में इसके लिए कोई व्यवस्था नहीं है। इसके बावजूद कई राज्यों में धर्मांतरण करने वाले लोगों को ऐसी सुविधाएं मिली हुई हैं ।  सुप्रीम कोर्ट ने आंध्रप्रदेश हाईकोर्ट के फैसले पर मोहर लगाते हुए अपना निर्णय सुनाया है। हाईकोर्ट ने कहा था कि जो लोग ईसाई धर्म अपनाते हैं और सक्रिय रूप से उसका पालन करते हैं, वे अनुसूचित जाति का दर्जा बनाये नहीं रख सकते।

सुप्रीम कोर्ट ने इस पर फैसला देते हुए कहा है कि कानून इस मामले में पूरी तरह से स्पष्ट है। एक ईसाई पादरी चिंथाडा आनंद ने अपने विरोधी पक्ष के खिलाफ एससी-एसटी कानून के तहत मामला दर्ज करवाया था जिसे अदालत ने खरिज कर दिया था । उसका कहना था कि वो ईसाई बनने से पहले अनुसूचित जाति से संबंध रखता था, इसलिए उसे इस कानून के तहत संरक्षण प्राप्त है। अदालत ने कहा था कि आप धर्मांतरण के बाद अनुसूचित जाति को मिलने वाली सुविधाओं को हासिल नहीं कर सकते। उसने आन्ध्रप्रदेश हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि हिन्दू, सिख या बौद्ध धर्म छोड़कर अन्य धर्म अपनाने वाले व्यक्ति का अनुसूचित जाति का दर्जा अपने आप समाप्त हो जाता है और उससे जुड़े संवैधानिक व वैधानिक लाभ भी खत्म हो जाते हैं। जन्म से याचिकाकर्ता अनुसूचित जाति का था लेकिन बाद में उसने ईसाई धर्म अपना लिया था। जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस मनमोहन की पीठ ने कहा कि किसी भी ऐसे व्यक्ति को अनुसूचित जाति आदेश 1950 के खंड-3 के तहत अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं माना जाता है। उसे कानून के तहत वैधानिक लाभ, संरक्षण, आरक्षण या अन्य अधिकार न तो दिए जा सकते हैं और न ही वो दावा कर सकता है। 

                 इस प्रकार की कई याचिकाएं अदालतों में लंबित पड़ी हैं, उन पर इस फैसले का बड़ा प्रभाव पड़ने वाला है। इस फैसले का दूरगामी प्रभाव धर्मांतरण करने वालों पर पड़ने वाला है। धर्मांतरण करके ईसाई और मुस्लिम धर्म अपनाने वाले अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों की मांग है कि उन्हें धर्मांतरण के बाद भी सभी सुविधाएं मिलनी चाहिए। उनके पक्ष में यह दलील दी जाती है कि धर्म बदलने से उनकी सामाजिक स्थिति नहीं बदलती है। सवाल यह है कि उनके धर्म परिवर्तन करने का आधार क्या है। देखा जाए तो उनका धर्म परिवर्तन करने का आधार यही होता है कि हिन्दू धर्म में भेदभाव है, इसलिए वो धर्म परिवर्तन करके ईसाई या मुस्लिम बन रहे हैं। उन्हें कहा जाता है कि धर्मांतरण के बाद उन्हें बराबरी का मौका मिलेगा, क्योंकि ईसाईयत और इस्लाम में सब बराबर हैं, वहां कोई भेदभाव नहीं है। धर्मांतरण का आधार ही सामाजिक स्थिति में बदलाव लाने का है।

इसके अलावा धर्मांतरण के बाद बड़ी-बड़ी सुविधाओं का वादा किया जाता है। सच यह है कि धर्मांतरण के बाद लोगों को आर्थिक मदद मिलती है । इसके अलावा नौकरी और इलाज में भी मदद दी जाती है। ईसाई धर्म अपनाने वालों के लिए मुफ्त शिक्षा का भी प्रावधान किया जाता है। हिन्दू धर्म में बने हुए दलितों और आदिवासियों को ऐसी कोई सुविधा नहीं दी जाती । उन्हें केवल सरकारी मदद मिलती है, जबकि ईसाई और मुस्लिम बनने वाले लोगों को अल्पसंख्यक होने का भी लाभ मिलता है। देखा जाए तो धर्म परिवर्तन करने वाले लोगों को धार्मिक संस्थाओं से मदद मिलने के अलावा अल्पसंख्यक होने के सरकारी लाभ भी मिलते हैं। यही कारण है कि भारत में हर साल लाखों लोग धर्म परिवर्तन कर रहे हैं। समस्या यह है कि इन लोगों को मिलने वाली धार्मिक संस्थाओं की मदद धीरे-धीरे कम हो जाती है, फिर इन्हें आरक्षण खोने का दर्द होने लगता है। यही कारण है कि ईसाई धर्म अपनाने वाले धर्मांतरण के बाद भी अपनी पहचान नहीं बदलते। वो ईसाई बनने के बावजूद हिन्दू बनकर रहते हैं, ताकि एससी-एसटी समाज को मिलने वाली सुविधाओं का भी लाभ मिलता रहे। इस तरह ये लोग दोहरा लाभ उठा रहे हैं। जहां एक तरफ धर्मांतरण के बाद इन्हें बड़ा आर्थिक लाभ मिला है, वहीं दूसरी तरफ एससी-एसटी समुदाय को मिलने वाली सुविधाएं भी मिल रही हैं। मुस्लिम धर्म में जाने वाले लोगों की समस्या यह है कि वो लोग अपनी पहचान बदल देते हैं। 

                 जिन लोगों ने काफी पहले धर्मांतरण कर लिया था, उन्हें अब धर्मांतरण करने के नुकसान दिखाई दे रहे हैं। ये लोग चाहते हैं कि वो धर्म परिवर्तन का ढोंग करके पुरानी सुविधाएं हासिल कर लें। ऐसे लोगों के लिए सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि कोई व्यक्ति दावा करता है कि उसने फिर से हिन्दू, सिख या बौद्ध धर्म अपना लिया है तो उसे तीन शर्तें पूरी करनी होंगी। उसे सबूत देना होगा कि वो मूल रूप से 1950 के आदेश के तहत अनुसूचित जाति से संबंधित था। उसे साबित करना होगा कि वो अपने धर्म में लौट आया है। इसके अलावा सबसे महत्वपूर्ण बात कि उसे मूल जाति व सम्बंधित समुदाय द्वारा स्वीकार कर लिया गया है। इसका मतलब है कि अदालत ने स्पष्ट रूप से कह दिया है कि नकली वापिसी से अनुसूचित जाति वाले लाभ मिलने वाले नहीं हैं। कितनी अजीब बात है कि अनुसूचित जाति का लाभ वो व्यक्ति लेना चाहता था, जो एक पादरी के रूप में काम कर रहा था। वास्तव में कई राज्यों में ईसाई धर्म अपनाने वाले यह लाभ ले रहे हैं, इसलिए धर्मांतरण बढ़ता जा रहा है। कई राजनीतिक दल इसके लिए प्रयास कर रहे हैं कि धर्मांतरण के बाद भी इन लोगों को अनुसूचित जाति को मिलने वाली सुविधाएं मिलती रहें ताकि धर्म परिवर्तन निर्बाध रूप से चलता रहे। वास्तव में कई राजनीतिक दलों का वोट बैंक ये लोग बने हुए हैं, इसलिए ये दल उनके लिए लड़ रहे हैं।

 सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से एक हलफनामा दाखिल करके जवाब देने को कहा था कि वो दलित ईसाईयों और दलित मुस्लिमों को अनुसूचित जाति का दर्जा देने के पक्ष में है या नहीं। सरकार ने तर्क दिया कि ‘अनुसूचित जाति’ का दर्जा उन समुदायों को दिया गया, जिन्होंने हिन्दू समाज में ऐतिहासिक रूप में छुआछूत का सामना किया है। सरकार का कहना है कि ईसाई और इस्लाम धर्म में जाति व्यवस्था या छुआछूत जैसी कुरीतियां ‘सैद्धान्तिक रूप से’ मौजूद नहीं हैं, इसलिए धर्म परिवर्तन के बाद वे इस दर्जे के हकदार नहीं रहते। इसके विरोध में तर्क दिया गया कि जब सिख या बौद्ध बन जाने पर अनुसूचित जाति का अधिकार नहीं बदलता, तो ईसाई या मुस्लिम बन जाने पर ये दर्जा क्यों खत्म हो जाता है। सरकार ने कहा कि ये दोनों धर्म हिन्दू धर्म का ही हिस्सा हैं और उनमें भी ये कुरीतियां विद्यमान हैं, इसलिए ये दर्जा नहीं छीना जा सकता। ईसाई और इस्लाम दोनों ही विदेशी धर्म हैं, वहां ऐसी कुरीतियों के लिए कोई जगह नहीं है। ये दोनों धर्म समानता के आधार पर चलने का दावा करते हैं, इसलिए वहां भेदभाव की बात नहीं की जा सकती। 

                अगर इसके बावजूद इन लोगों द्वारा ये दावा किया जाता है कि उनके साथ उनके नए धर्म में भेदभाव हो रहा है तो वो वहां क्या कर रहे हैं। समानता का दावा करने वाले धर्म अगर समानता प्रदान नहीं कर पा रहे हैं तो उन्हें उन धर्मो का सामूहिक रूप से त्याग कर देना चाहिए। जो लोग उनके लिए अनुसूचित जाति को मिलने वाली सुविधाओं की मांग कर रहे हैं, वास्तव में ये लोग अनुसूचित जाति के खिलाफ काम कर रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट द्वारा आरक्षण की एक सीमा तय कर दी गई है, इसलिए इन समुदायों को मिलने वाला आरक्षण नहीं बढ़ सकता। इसका मतलब है कि जो भी लाभ इन लोगों को दिया जाएगा, वो अनुसूचित जाति के लोगों को मिलने वाले लाभ की कीमत पर दिया जाएगा। एक तरफ ईसाई और मुस्लिम धार्मिक संस्थाओं की मदद से आगे बढ़ चुके ये लोग दोहरा लाभ उठाएँगे तो दूसरी तरफ अनुसूचित जाति के लोग पीछे रह जाएंगे। समस्या यह है कि अनुसूचित जाति के लोग इस तरफ से आंखे बंद किये हुए हैं, वो यह देख नहीं पा रहे हैं कि उनके अधिकारों पर डाका डालने का प्रयास दशकों से जारी है। देखा जाए तो ओबीसी आरक्षण पर यह डाका डल चुका है। ईसाई और मुस्लिम ओबीसी कोटे में आरक्षण का लाभ ले रहे हैं, जिसका उन्हें बड़ा नुकसान हो रहा है। यही काम अनुसूचित जाति के लोगों के साथ करने का प्रयास किया जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर इस प्रयास पर पानी फेर दिया है।

इसके लिए केंद्र सरकार का भी धन्यवाद दिया जाना चाहिए कि उसने अनुसूचित जाति का पक्ष अच्छी तरह से अदालत के सामने रखा है। विपक्षी दल डंके की चोट पर हिन्दू धर्म के जातिगत भेदभाव पर बात करते हैं। दूसरी तरफ ये नेता दावा करते हैं कि ईसाई और मुस्लिम समाज में कोई जाति व्यवस्था नहीं है। सवाल यह है कि जहाँ जाति ही नहीं है, वहां जाति के आधार पर लाभ कैसे दिया जा सकता है। दलित ईसाईयों के संगठन बन गए हैं, जो इसके लिए लड़ रहे हैं कि उन्हें धर्मांतरण के बाद भी दलित होने का लाभ मिलता रहे।  हिन्दू दलित संगठन इस बारे में चुप हैं, ये चुप्पी दलित समाज के लिए नुकसानदेह साबित होने वाली है। इस बार अदालत ने बचा लिया है, लेकिन मामला कभी भी बदल सकता है। दलित समाज को इसका विरोध करना चाहिए कि उसके अधिकारों पर दूसरा समुदाय कब्जा करने का प्रयास कर रहा है। जो समाज अपने अधिकारों के लिए नहीं लड़ता, देर सवेर उसके अधिकार छीन लिए जाते हैं। 

राजेश कुमार पासी