राजेश कुमार पासी
इजराइल-अमेरिका ने ईरान के साथ जो युद्ध शुरू किया है, उसका अंत कब होगा, अभी कुछ कहा नहीं जा सकता। इस युद्ध के बारे में एक बात पक्की हो गई है कि इस युद्ध में किसी की जीत नहीं होने वाली है। ईरान के खिलाफ युद्ध तो शुरू कर दिया गया लेकिन खत्म कैसे करें, ये दोनों देशों को समझ नहीं आ रहा है। ईरान ने अपनी बर्बादी की ओर देखना बंद कर दिया है. अब उसे अपनी तबाही की कोई चिंता नहीं है। वो अब अमेरिका और उसके सहयोगियों को ज्यादा से ज्यादा नुकसान पहुंचाने की कोशिश कर रहा है। अमेरिका और इजराइल ने सोचा नहीं था कि ईरान इतनी लंबी लड़ाई लड़ सकता है, इसलिए वो हतप्रभ होकर दुनिया से मदद मांग रहे हैं। ईरान पिछले 30-40 सालों से अमेरिकी प्रतिबंधों का सामना कर रहा है और वो आर्थिक रूप से बेहद कमजोर देश है। दूसरी तरफ अमेरिका दुनिया की इकलौती महाशक्ति है जिसकी आर्थिक, राजनीतिक और सैन्य शक्ति का कोई मुकाबला नहीं है। एक तरह से अमेरिका दुनिया का थानेदार बना हुआ है। इसी हनक में आकर उसने ईरान पर हमला किया है। इजराइल अपनी सुरक्षा के लिए ईरान से लड़ रहा है लेकिन अमेरिका क्यों लड़ रहा है, इसकी वजह वो भी नहीं जानता।
इस बात को स्वीकार नहीं किया जा सकता कि अमेरिका सिर्फ इजराइल की मदद के लिए ईरान से युद्ध लड़ रहा है। इस युद्ध को शुरू करने के उसके भी कुछ उद्देश्य रहे होंगे लेकिन अब उसका उद्देश्य सिर्फ सम्मानजनक रूप से युद्ध से बाहर निकलना है। डोनाल्ड ट्रंप क्या करते हैं, ये वो खुद भी नहीं जानते क्योंकि वो कभी भी पलट जाते हैं। उनका स्वभाव इतना ज्यादा मनमौजी है कि उनके दुश्मनों से ज्यादा दोस्तों को उनसे डर लगता है। यही कारण है कि अमेरिका के अपने ही सहयोगियों से रिश्ते बिगड़ते जा रहे हैं। यूरोप अमेरिका का सबसे बड़ा सहयोगी है लेकिन इस युद्ध में वो अमेरिका के साथ आने को तैयार नहीं है। कितनी अजीब बात है कि डोनाल्ड ट्रंप चीन से मदद मांग रहे हैं. शायद ही किसी ने इसकी कल्पना की होगी। अभी तक जो आदमी सबको धमकाता घूम रहा था, आज वो सबसे मदद मांग रहा है। इसका मतलब है कि ईरान की ताकत का अंदाजा ट्रंप लग गया है। वो समझ गए हैं कि इस युद्ध को खत्म करना उनके बस में नहीं है।
ईरान युद्ध ऐसे लड़ रहा है, जिसमें सिर कटने के बाद उसका धड़ लड़ता है। अगर धड़ भी कट जाए तो हाथ-पैर और सब अंग अलग-अलग लड़ने लगते हैं। अमेरिका-इजराइल ने एक झटके में ईरान का सिर काट दिया और सोचा कि वो जंग जीत गए हैं । आज उन्हें पता चल रहा है कि ये जंग वो कभी जीतने वाले नहीं है। युद्ध में अगर नेतृत्व खत्म हो जाये तो उसे लड़ना मुश्किल हो जाता है लेकिन ईरान ने युद्ध का विकेन्द्रीयकरण कर दिया है। जब सेंट्रल कमांड से निर्देश नहीं मिलते हैं तो आईआरजीसी के क्षेत्रीय कमांडर अपने स्तर पर लड़ते हैं। ईरान अमेरिका से जीत नहीं सकता लेकिन वो अपनी हार की इतनी बड़ी कीमत वसूल रहा है कि उसकी हार ही जीत बन गयी है। चार सालों से यूक्रेन-रूस युद्ध चल रहा है लेकिन दुनिया अपना काम कर रही है। ऐसा नहीं है कि उसका असर दुनिया पर नहीं हो रहा है लेकिन दुनिया चुपचाप उससे निपट रही है। इस युद्ध ने तो सिर्फ 18 दिनों में ही दुनिया में त्राहिमाम मचा दिया है। होरमुज़ स्ट्रेट के बंद होने से पूरी दुनिया में ऊर्जा संकट खड़ा हो गया है। हमारा इस युद्ध से कोई लेना-देना नहीं है लेकिन इसकी मार हम पर भी पड़ रही है। अगर कच्चे तेल की बढ़ती कीमत पर लगाम नहीं लगी तो वैश्विक अर्थव्यवस्था को बड़ा नुकसान होने वाला है।
सवाल यह है कि अमेरिका की गलतियों की सजा दुनिया कब तक भुगतेगी। इस लिहाज से देखें तो अमेरिका का ये आखिरी बड़ा युद्ध हो सकता है। अमेरिका को इस युद्ध ने अहसास करवा दिया है कि वो किसी को बर्बाद कर सकता है लेकिन उसकी बड़ी कीमत उसे भी चुकानी होगी। ईरान ने अरब देशों में बने अमेरिकी सैन्य अड्डों को तबाह कर दिया है। ये सैन्य अड्डे अमेरिका की बड़ी ताकत थे जो अब पहले जैसे कभी नहीं रहेंगे। ईरान ने इन अड्डों के अलावा भी अमरीकी ठिकानों पर हमले किये हैं। दुनिया भर में अमेरिकी सैन्य अड्डे हैं, ये अड्डे ही अमेरिका को सुपर पावर बनाते हैं। इसके अलावा अमेरिका की सबसे बड़ी ताकत उसके नौसैनिक बेड़े हैं जो जहां जाते हैं, तबाही मचा देते हैं और अमेरिका के पास लगभग ऐसे नौ बेड़े हैं । हर नौसैनिक बेड़ा चलती-फिरती पूरी नौसेना है जो अकेले ही पूरे देश को बर्बाद करने की ताकत रखती है। जब ये बेड़ा किसी देश पर हमला करने के लिए पहुंच जाता है तो दुनिया उसकी बर्बादी मान लेती है। ईरान ने अमेरिका की इस ताकत को मिट्टी में मिला दिया है। जिन बेड़ो से दुनिया डरती थी, वो अपनी सुरक्षा के डर से ईरान से 2000 किलोमीटर दूर जाकर खड़े हो गए हैं। जो दूसरों को बर्बाद करते थे, उन्हें अपनी बर्बादी का डर सता रहा है। ये अमेरिका की सबसे बड़ी हार है कि जिनके दम पर वो कहीं भी हमला करने चला जाता था, वो आज अपनी जान बचाते हुए घूम रहे हैं।
ईरान तो अपनी बर्बादी से उबर जाएगा लेकिन इस युद्ध ने अमेरिका की छवि को जो नुकसान पहुंचाया है, उसकी पूर्ति कभी होने वाली नहीं है। अब अमेरिका की सुरक्षा गारंटी की कोई अहमियत नहीं रही है। वो अरब देशों की सुरक्षा में असफल साबित हुआ है। अमेरिका की वायु सुरक्षा व्यवस्था की ईरान ने धज्जियां उड़ा दी हैं। इजराइल और अमेरिका अपने एयर डिफेंस सिस्टम का ढिंढोरा पीटते थे, लेकिन उसकी हकीकत दुनिया के सामने आ गई है। ईरान के छोटे-छोटे ड्रोन हज़ारों करोड़ के राडार को चकमा देने में सफल हुए हैं। इजराइल को भी पता चल गया है कि उसका एयर डिफेंस सिस्टम पूरी तरह से उसे सुरक्षा नहीं दे सकता। पहली बार इजराइल ने इतनी बर्बादी देखी है जिसकी उसने कल्पना नहीं की थी। अभी तक डोनाल्ड ट्रंप पूरी दुनिया में युद्ध रुकवाने का श्रेय लेने की कोशिश किया करते थे लेकिन अब वो अपना भी युद्ध रोक नहीं पा रहे हैं। भारत-पाक युद्ध रुकवाने का कितनी बार उन्होंने दावा किया है, उसे गिनना भी मुश्किल है।
प्रधानमंत्री मोदी की रणनीति को समझना अब आसान है जो ऑपरेशन सिंदूर को रोकने पर समझ नहीं आ रही थी। तब ये समझना मुश्किल हो रहा था कि पाकिस्तान के नौ एयरबेस तबाह करने के बाद युद्ध-विराम के लिए भारत क्यों तैयार हो गया था। वास्तव में भारत का इरादा युद्ध करने का नहीं था. उसका इरादा सिर्फ पाकिस्तान को सबक सिखाना था कि भारत पर आतंकवादी हमले करने की उसे कीमत चुकानी पड़ेगी। भारत एक बर्बाद देश से युद्ध करके अपनी बर्बादी को आमंत्रित नहीं करना चाहता था। जैसे ही मौका मिला, भारत युद्ध से बाहर आ गया। अमेरिका के लिए यही सबसे मुश्किल काम साबित हो रहा है। प्रधानमंत्री मोदी समझ गए हैं कि वर्तमान समय युद्ध का नहीं है क्योंकि इसमें कोई नहीं जीतता है। भारत की सेना चीन के सामने चार साल तक खड़ी रही लेकिन युद्ध नहीं किया। चीन को बता दिया गया कि हम युद्ध नहीं चाहते लेकिन आगे बढ़े तो युद्ध करना पड़ेगा। चीन भी युद्ध की कीमत जानता है, इसलिए चुपचाप पीछे हट गया। युद्ध किसी समस्या का हल नहीं है, ये मोदी जानते हैं इसलिए देश को युद्ध से बचा गए। अब धौंस जमाने का दौर चला गया है. दुश्मन को कमजोर समझना आपकी बड़ी भूल साबित हो सकती है। ये अमेरिका और इजराइल को समझ आ रहा होगा।
रूस ने यूक्रेन पर हमला करते हुए सोचा नहीं होगा कि वो एक लंबी लड़ाई में फंसने जा रहा है। उस युद्ध में भी यूक्रेन बर्बाद हो चुका है लेकिन हथियार नहीं डाल रहा है। रूस जैसी बड़ी ताकत के सामने वो डटकर खड़ा हुआ है। उस युद्ध में भी कोई नहीं जीत रहा है। अगर यूक्रेन बर्बाद हुआ है तो रूस की भी कम बर्बादी नहीं हुई है। रूस अपने प्राकृतिक संसाधनों की ताकत से आज खड़ा हुआ है लेकिन उसके नुकसान की भरपाई होने वाली नहीं है। रूस की सैन्य शक्ति की भी यूक्रेन ने पोल खोल दी है। जिस लड़ाई को रूस कुछ दिनों की समझ रहा था, वो चार साल से चल रही है और खत्म होने के आसार दिखाई नहीं दे रहे हैं। इजराइल ने गाजा को समतल कर दिया है लेकिन हमास आज भी उससे लड़ रहा है। इजराइल पूरी ताकत लगाकर भी उसे खत्म नहीं कर पाया है। हमास बेशक हार गया हो लेकिन इजराइल की अभी तक जीत नहीं हुई है। पाकिस्तान अपनी एयर पावर के भरोसे अफगानिस्तान पर हमले कर रहा है लेकिन उसे कुछ हासिल होने वाला नहीं है। जब रूस और अमेरिका ने अफगानिस्तान के हर कोने में बम बरसा कर देख लिया कि उसे हराया नहीं जा सकता तो पाकिस्तान किस खेत की मूली है। उसे समझ नहीं आ रहा है कि जब रूस और अमेरिका बरसों तक बम बरसा कर कुछ नहीं कर पाए तो वो क्या कर लेगा। पाकिस्तान एक ऐसे युद्ध को शुरू कर रहा है, जिसमें जीतने की कोई संभावना नहीं है।
ड्रोन युग शुरू हो गया है. अब बड़े-बड़े हथियार काम नहीं आ रहे हैं। अब ऐसे युद्ध होंगे, जिसमें कोई नहीं जीतेगा, सब हारेंगे। जब अमेरिका और इजराइल मिलकर भी ईरान जैसे देश को झुका नहीं पा रहे हैं तो बराबर की शक्ति वाले देशों की क्या हालत होगी। अरब देशों की अर्थव्यवस्था को इतनी बड़ी चोट लगने वाली है कि उनके लिए ये युद्ध सबसे बड़ी त्रासदी साबित होगा। उनका नुकसान कितना होगा, ये महत्वपूर्ण नहीं है, उनकी पूरी व्यवस्था बदलने वाली है। उन्हें अपनी सुरक्षा के लिए आत्मनिर्भर बनना होगा। अब युद्ध सिर्फ आत्मरक्षा के लिए लड़ना होगा. किसी को जीतने के लिए युद्ध करना अतीत की बात हो जाएगी। इस युद्ध ने बता दिया है कि युद्ध केवल बर्बादी लाते हैं और समस्याओं को पैदा करते हैं। युद्ध किसी समस्या का समाधान नहीं हैं, बल्कि खुद बड़ी समस्या हैं। ये बात अब दुनिया को समझ आ जानी चाहिए।