शहर में लगे ‘कर्फ्यू’ की वजह…?

carfueeशहर में ‘कर्फ्यू’ लग ही गया। ‘कर्फ्यू’ की अवधि में शहरवासियों का साँस लेना दूभर हो गया था। बूटो की खट खटाहट से शहर के वासिन्दे सहमे-सहमें मनहूस ‘कर्फ्यू’ से छुटकारा पाने की सोच रहे थे। शहर के ‘कर्फ्यू ग्रस्त’ इलाके में हर जाति/धर्म के लोग रहते हैं, सभी के लिए ‘कर्फ्यू’ कष्टकारी रहा, लेकिन इस कष्ट को धार्मिक कट्टरवादी जानते हुए भी अनजान बने हुए थे। यही नहीं वे कर्फ्यू लगने के कारणों को अपने तरीके से परिभाषित करके धार्मिक उन्माद फैलाते हुए प्रशासन/शासन मुर्दाबाद के नारे भीं बुलन्द करने से बाज नहीं आ रहे थे।
कर्फ्यू क्यो लगा…? पुलिस एवं सुरक्षा बल से जब उग्र भीड़ काबू में नहीं आ सकी तो पुलिस अधिकारी ने प्रशासनिक ब्रम्हास्त्र ‘कर्फ्यू’ की उद्घोषणा करवा दिया। प्रत्यक्ष दर्शियों के अनुसार यदि पुलिस अधिकारी चाहते तो ‘कर्फ्यू’ का दंश पूरे शहर को न झेलना पड़ता। एक कथित बहुसंख्यक सम्प्रदाय के धार्मिक संगठन के युवा नेता की हत्या हो गई थी, जिसको लेकर उक्त सम्प्रदाय के लोगों में बेहद आक्रोश उत्पन्न हो गया था। हत्या का आरोप अल्प संख्यक सम्प्रदाय के लोगों पर लगाया जाने लगा जिसमें एक माननीय को सूत्रधार बताया गया।
मृतक युवा नेता का शव पुलिस ने पोस्टमार्टम के लिए अपने कब्जे में ले लिया था। अन्त्य परीक्षण उपरान्त नेता का शव उसके शहर स्थित आवास ले जाया गया जहाँ पुलिस बल अपर्याप्त था और फिर दंगा-फसाद शुरू हो गया। कहते हैं कि धार्मिक संगठन के मृत युवा नेता के घर के विपरीत दिशा में ठीक सामने एक इबादतगाह है जो काफी पुरानी हो चुकी है वहाँ जीर्णोद्धार कार्य हो रहा था। शव दिन में उस समय मृतक के घर पुलिस अभिरक्षा में लाया गया जब नमाज का वक्त था। घर के सामने जैसे ही शव को एम्बुलेन्स के स्ट्रेचर से उतारा गया मृतक के घर में रूदन-क्रन्दन शुरू हो गया।
इसी बीच एकत्र भीड़ में से किसी युवक ने एक पत्थर मस्जिद की तरफ जोर से उछाला जो वहाँ जीर्णोद्धार कार्य के लिए लगी बाँस-बल्ली से जोर से टकराकर पुनः सड़क पर गिर पड़ा। फिर क्या था वहाँ एकत्र भीड़ में से आवाज आई कि यह पत्थर मस्जिद से आया है और शुरू हो गया हंगामा, आगजनी और पत्थर बाजी। दोनो सम्प्रदाय के लोगों ने जमकर कोहराम मचाना शुरू कर दिया।
पुलिस बल का नेतृत्व कर रहे एक दोयम दर्जे के पुलिस अधिकारी ने ज्यादा जोखिम न लेते हुए सड़क पर आकर ‘कर्फ्यू’ लगाए जाने की उद्घोषणा कर दिया। प्रत्यक्ष दर्शियों का कहना है कि कर्फ्यू तब तक नहीं लगता जब तक मजिस्ट्रेट का हस्ताक्षरयुक्त आदेश न हो। होशियार पुलिस अफसर ने बाद में कर्फ्यू की गिरफ्त में आकर खामोश हो गया। इस सम्बन्ध में जब शहर के शान्तप्रिय प्रबुद्ध लोगों से बातचीत की गई तब पता चला कि हंगामा तो बरपा जिसके नियंत्रण के लिए ‘कर्फ्यू’ ही एक चारा था लेकिन-
एक मुस्लिम शिक्षित नगरवासी के अनुसार यदि पुलिस/प्रशासनिक अधिकारी सचेत होते तो शहर में कर्फ्यू लगता ही नहीं उसके लिए उन्हें मृतक के शव को नमाज के 15-20 मिनट पहले अथवा बाद में लाना चाहिए था। उस पुरानी मस्जिद में कुछ बुजुर्ग नमाज अदा कर रहे थे जिन्हें यह आशंका भी नहीं थी कि वहाँ ‘हंगामा’ बरपेगा और ‘कर्फ्यू’ लग जाएगा। दूसरी बात यह कि जिस पत्थर को बहुसंख्यक लोग यह कह रहे हैं कि वह मस्जिद के गुम्बद से फेंका गया था वह झूठ है क्योंकि मस्जिद जैसे पाक स्थान पर ‘बलवाई’ थे ही नहीं। उसके अन्दर दोपहर (अपरान्ह) की नमाज अदा करने वाले कुल पाँच-दस बुजुर्ग मुसलमान ही थे।
उनका कहना था कि अपना शहर गंगा-जमुनी तहजीब के लिए विख्यात है।यहाँ किसी भी मन्दिर-मस्जिद में उग्रवादी/आतंकवादी छिप ही नहीं सकते क्योंकि शहर में भाईचारा ही ऐसा है कि यहाँ के लोग किसी भी अप्रिय घटना को अंजाम ही नहीं दे सकते। उधर एक हिन्दू शिक्षित नगर वासी जो पेशे से पत्रकार हैं का कहना है कि पत्थर मस्जिद से ही आया और तत्पश्चात् वहाँ एकत्र भीड़ ने जवाब में पत्थर बाजी शुरू कर दिया। कुछेक छोटे आटो वाहनों को आग लगा दिया। स्ट्रेचर और एम्बुलेन्स को क्षति पहुँचाया गया। यही नहीं काफी हंगामा बरपाया गया। पुलिस का दोयम अधिकारी ‘कर्फ्यू’ का ‘ऐलान’ न करता तो क्या करता…?
शहर के युवा व्यवसाई और धार्मिक संगठन के पदाधिकारी की हत्या हुए महीनों हो गए। धार्मिक संगठनों ने धरना-प्रदर्शन जैसे सभी आन्दोलन कर डालेेेेेे नतीजा सिफर। माननीय (जनप्रतिनिधि) पर लगाए गए आरोपों की तरफ प्रशासन, पुलिस महकमा और शासन ने देखा तक नहीं। कुछेक युवा पकड़कर जेल भेजे गए। मृतक के हमदर्द, वोट के सौदागरों का आरोप है कि सरकार तुष्टिकरण की नीति अपना रही है इसीलिए हिन्दुओं की हत्या करने-कराने वाले साफ बचते जा रहे हैं।
इस तरह की बातें शुरूआती दौर में खूब हुईं अब समय बीतने के साथ-साथ सब शान्त होने लगा है। एक प्रबुद्धवर्गीय शिक्षित का कहना था कि ‘कर्फ्यू’ के समय और उसके पूर्व अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों के घर जलाए गए। वह लोग निराश्रित हो गए। तमाशबीन बनकर शहरवासी उनकी दुर्दशा देखने वहाँ जाते थे, लेकिन किसी ने भी ‘इमदाद’ नहीं दिया। उन्होंने आश्चर्य जताया कि जिला प्रशासन ने भी उन पीड़ितों को कोई इमदाद नहीं दिया। ‘कर्फ्यू’ की अवधि समाप्त होने पर स्थानीय लोग और शहर के धनी वर्गीय लोग उनकी इमदाद के लिए आगे आए। कर्फ्यू समाप्ति को लम्बा समय हो रहा है अब सभी पीड़ित अपने आशियाने फिर से लोगों की मदद से बना रहे हैं, और कर्फ्यू कभी न लगे यही दुआ कर रहे हैं।

1 COMMENT

  1. आपलोग यह भी पढ़िए:
    एक दिन एक कव्वे के बच्चे ने कहा की हमने लगभग हर चौपाय जीव का मांस खाया है. मगर आजतक दो पैर पर चलने वाले जीव का मांस नहीं खाया है. पापा कैसा होता है इंसानों का मांस?

    पापा कव्वे ने कहा मैंने जीवन में तीन बार खाया है, बहुत स्वादिष्ट होता है.

    कव्वे के बच्चे ने कहा मुझे भी खाना है… कव्वे ने थोड़ी देर सोचने के बाद कहा चलो खिला देता हूँ.

    बस मैं जैसा कह रहा हूँ वैसे ही करना… मैंने ये तरीका अपने पुरखों से सीखा है.

    कव्वे ने अपने बेटे को एक जगह रुकने को कहा और थोड़ी देर बाद मांस का दो टुकड़ा उठा लाया. कव्वे के बच्चे ने खाया तो कहा की ये तो सूअर के मांस जैसा लग रहा है.

    पापा ने कहा अरे ये खाने के लिए नहीं है, इस से ढेर सारा मांस बनाया जा सकता है. जैसे दही जमाने के लिए थोड़ा सा दही दूध में डाल कर छोड़ दिया जाता है वैसे ही इसे छोड़ कर आना है. बस देखना कल तक कितना स्वादिष्ट मांस मिलेगा, वो भी मनुष्य का.

    बच्चे को बात समझ में नहीं आई मगर वो पापा का जादू देखने के लिए उत्सुक था.

    पापा ने उन दो मांस के टुकड़ों में से एक टुकड़ा एक मंदिर में और दूसरा पास की एक मस्जिद में टपका दिया.

    तबतक शाम हो चली थी, पापा ने कहा अब कल सुबह तक हम सभी को ढेर सारा दुपाया जानवरों का मांस मिलने वाला है.

    सुबह सवेरे पापा और बच्चे ने देखा तो सचमुच गली गली में मनुष्यों की कटी और जली लाशें बिखरी पड़ीं थी.

    हर तफ़र सन्नाटा था. पुलिस सड़कों पर घूम रही थी. जमालपुर में कर्फ्यू लगा हुआ था.

    आज बच्चे ने पापा कव्वे से दुपाया जानवर का शिकार करना सीख लिया था.

    बच्चे कव्वे ने पूछा अगर दुपाया मनुष्य हमारी चालाकी समझ गया तो ये तरीका बेकार हो जायेगा.

    पापा कव्वे ने कहा सदियाँ गुज़र गईं मगर आजतक दुपाया जानवर हमारे इस जाल में फंसता ही आया है.

    सूअर या बैल के मांस का एक टुकड़ा, हजारों दुपाया जानवरों को पागल कर देता है, वो एक दूसरे को मारने लग जाते हैं और हम आराम से उन्हें खाते हैं.

    मुझे नहीं लगता कभी उसे इंतनी अक़ल आने वाली है.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

* Copy This Password *

* Type Or Paste Password Here *

17,162 Spam Comments Blocked so far by Spam Free Wordpress