राजनीति

भारत बनेगा ब्लू इकोनॉमी का पावर हाउस

रामस्वरूप रावतसरे

भारत एक ऐसा देश है जिसकी 7,517 किलोमीटर लंबी तटरेखा है और तीन तरफ से समुद्र घिरा हुआ है। यहाँ की अर्थव्यवस्था में समुद्री व्यापार की बड़ी भूमिका है। लगभग 95 प्रतिशत विदेशी व्यापार समुद्र के रास्ते होता है। लेकिन अब तक भारत जहाज निर्माण में बहुत पीछे रहा है। इसे बढ़ाने के लिए मोदी सरकार ने 44700 करोड़ खर्च करने की तैयारी कर ली है।

वैश्विक स्तर पर जहाज निर्माण में चीन, दक्षिण कोरिया और जापान का दबदबा है और ये तीन देश मिलकर 95 प्रतिशत से ज्यादा जहाज बनाते हैं। भारत का हिस्सा सिर्फ 0.1 प्रतिशत से भी कम है और वैश्विक रैंकिंग में 20वें स्थान के आसपास है।

वैश्विक स्तर पर जहाज निर्माण में भारत का हिस्सा सिर्फ 0.1 प्रतिशत से भी कम है और वैश्विक रैंकिंग में 20वें स्थान के आसपास है। मोदी सरकार इसे बदलना चाहती है। अब सरकार ब्लू इकोनॉमी को मजबूत बनाने पर जोर दे रही है। ब्लू इकोनॉमी का मतलब है समुद्र के संसाधनों का टिकाऊ इस्तेमाल। जैसे मछली पकड़ना, बंदरगाह, जहाजरानी, समुद्री ऊर्जा, पर्यटन और जहाज निर्माण। इससे अर्थव्यवस्था बढ़ेगी, रोजगार बनेगा और पर्यावरण सुरक्षित रहेगा। सरकार का लक्ष्य है कि 2047 तक भारत जहाज निर्माण में विश्व के टॉप-5 देशों में शामिल हो जाए। इसके लिए हाल ही में दो बड़ी योजनाओं के दिशानिर्देश जारी किए गए हैं, 1- शिपबिल्डिंग फाइनेंशियल असिस्टेंस स्कीम और दूसरा – शिपबिल्डिंग डेवलपमेंट स्कीम। इन पर कुल 44,700 करोड़ रुपए खर्च होंगे।

केंद्रीय बंदरगाह, जहाजरानी और जलमार्ग मंत्री सर्बानंद सोनोवाल के अनुसार “प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी की अगुवाई में जहाज निर्माण क्षेत्र को नई नीति मिली है। ये दिशानिर्देश पारदर्शी और स्थिर ढाँचा बनाएँगे, जिससे घरेलू जहाज निर्माण फिर से जीवित होगा। इससे मेक इन इंडिया को बल मिलेगा, बड़े निवेश आएँगे और विश्व स्तरीय क्षमता बनेगी। भारत विकसित भारत और आत्मनिर्भर भारत की राह पर एक बड़ी समुद्री राष्ट्र बनेगा।”

जानकारी के अनुसार मोदी सरकार की शिपबिल्डिंग फाइनेंशियल असिस्टेंस स्कीम और शिपबिल्डिंग डेवलपमेंट स्कीम योजनाएँ सितंबर 2025 में कैबिनेट से मंजूर 69,725 करोड़ रुपए के पैकेज का हिस्सा हैं। दिसंबर 2025 में इनके ऑपरेशनल गाइडलाइंस जारी हुए। दोनों योजनाएँ 31 मार्च 2036 तक चलेंगी और 2047 तक बढ़ाई जा सकती हैं।

शिपबिल्डिंग फाइनेंशियल असिस्टेंस स्कीम का बजट 24,736 करोड़ रुपये है। इसमें भारतीय जहाज निर्माण कंपनियों को हर जहाज पर 15 से 25 प्रतिशत तक वित्तीय मदद मिलेगी। यह मदद जहाज के प्रकार पर निर्भर करेगी, जिसमें छोटे सामान्य जहाज, बड़े सामान्य या विशेष जहाज होंगे। सरकार की ओर से मदद चरणबद्ध तरीके से मिलेगी, स्टेप-दर-स्टेप काम पूरा होने के आधार पर। इसके साथ ही सीरीज ऑर्डर पर अतिरिक्त प्रोत्साहन भी दिया जाएगा। एक नई सुविधा है शिपब्रेकिंग क्रेडिट नोट। अगर कोई पुराना जहाज भारतीय यार्ड में तोड़ा जाता है, तो मालिक को स्क्रैप वैल्यू का 40 प्रतिशत क्रेडिट मिलेगा। इसे नए जहाज बनाने में इस्तेमाल कर सकते हैं। इससे सर्कुलर इकोनॉमी को बढ़ावा मिलेगा और पुराने जहाज से नए बनेंगे।

जानकारी के अनुसार अगले दशक में यह योजना 96,000 करोड़ रुपए के जहाज निर्माण प्रोजेक्ट सपोर्ट करेगी। इससे घरेलू विनिर्माण बढ़ेगा और लाखों रोजगार बनेगे। शिपबिल्डिंग डेवलपमेंट स्कीम – मोदी सरकार की इस योजना का बजट 19,989 करोड़ रुपये है। यह लंबे समय की क्षमता बनाने पर फोकस करती है। इसमें नए ग्रीनफील्ड जहाज निर्माण क्लस्टर बनेंगे। केंद्र और राज्य मिलकर 50रू50 स्पेशल पर्पज व्हीकल बनाएँगे, जो सामान्य इंफ्रास्ट्रक्चर पर 100 प्रतिशत पूँजी मदद देगा। पुराने ब्राउनफील्ड यार्ड्स को आधुनिकीकरण के लिए 25 प्रतिशत मदद मिलेगी, जैसे ड्राई डॉक, शिपलिफ्ट, फैब्रिकेशन सुविधाएँ और ऑटोमेशन अपनाने पर।

क्रेडिट रिस्क कवरेज फ्रेमवर्क से प्री-शिपमेंट, पोस्ट-शिपमेंट और वेंडर डिफॉल्ट रिस्क पर सरकारी इंश्योरेंस मिलेगा। इससे प्रोजेक्ट आसानी से फाइनेंस हो सकेंगे। इन योजनाओं से 2047 तक भारत की व्यावसायिक जहाज निर्माण क्षमता 4.5 मिलियन ग्रॉस टनेज प्रति वर्ष हो जाएगी। इससे रोजगार बढ़ेगा, स्वदेशी तकनीक विकसित होगी और समुद्री सुरक्षा मजबूत होगी। जानकारों के अनुसार ब्लू इकोनॉमी भारत की अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है। फिलहाल यह जीडीपी में 4 प्रतिशत योगदान देती है, लेकिन संभावना बहुत ज्यादा है। सरकार का लक्ष्य है कि 2030 तक यह 1 ट्रिलियन डॉलर तक पहुँचे। सागरमाला प्रोजेक्ट इसके केंद्र में है। सागरमाला से बंदरगाह आधुनिक हो रहे हैं, तटीय आर्थिक जोन बन रहे हैं और लॉजिस्टिक्स लागत कम हो रही है। अब तक 839 प्रोजेक्ट्स की पहचान हुई है, जिनकी लागत 5.8 लाख करोड़ रुपए है।

मैरिटाइम इंडिया विजन 2030 और अमृत काल विजन 2047 में जहाज निर्माण को प्रमुख स्थान दिया गया है। विजन 2030 में 150 से ज्यादा पहल हैं, जिन पर 3-3.5 लाख करोड़ निवेश होगा। अमृत काल विजन 2047 में 80 लाख करोड़ निवेश का प्लान है। इससे भारत टॉप-10 से टॉप-5 जहाज निर्माण देश बनेगा।

विश्व में जहाज निर्माण तेजी से बढ़ रहा है। 2025 में ग्लोबल मार्केट 155 अरब डॉलर का है। चीन अकेला 50 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा रखता है, उसके बाद दक्षिण कोरिया और जापान। ये देश सब्सिडी, आधुनिक तकनीक और बड़े क्लस्टर से आगे हैं। भारत अब उसी रास्ते पर है- क्लस्टर बनाकर, फाइनेंशियल मदद देकर और रिस्क कवर देकर। पहले भारत की क्षमता बहुत कम थी, सिर्फ 0.1 मिलियन ग्रॉस टनेज प्रति वर्ष। कोचिन शिपयार्ड और हिंदुस्तान शिपयार्ड जैसे सार्वजनिक यार्ड मुख्य थे, लेकिन व्यावसायिक जहाज कम बनते थे। अब निजी क्षेत्र भी सक्रिय हो रहा है।

जानकारों की माने तो भारत के लिए इस राह में आगे बढ़ने को लेकर काफी चुनौतियाँ हैं, जिसमें लागत ज्यादा होना, पुरानी तकनीकी, स्किल की कमी और महँगा फाइनेंस, लेकिन मोदी सरकार की योजनाएँ इन समस्याओं को दूर करेंगी। इस काम में नेशनल शिपबिल्डिंग मिशन समन्वय करेगा। स्वतंत्र मूल्यांकन और मीलस्टोन बेस्ड पेमेंट से पारदर्शिता आएगी।

सरकार का विजन स्पष्ट है कि आत्मनिर्भर भारत में समुद्र महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। सागरमाला, डीप ओशन मिशन और पीएम मत्स्य संपदा योजना से ब्लू इकोनॉमी मजबूत हो रही है। जहाज निर्माण इसमें केंद्र है। अंत में ये योजनाएं सिर्फ जहाज बनाने की नहीं, बल्कि भारत को समुद्री महाशक्ति बनाने की हैं। इससे देश की अर्थव्यवस्था बुलंद होगी, युवाओं को रोजगार मिलेगा और देश सुरक्षित रहेगा। 2047 तक विकसित भारत का सपना समुद्र से भी पूरा होगा।

रामस्वरूप रावतसरे