लेख

भारतीय संविधान और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता 

26 जनवरी गणतंत्र दिवस

विवेक रंजन श्रीवास्तव 

भारतीय संविधान और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का संबंध लोकतंत्र की आत्मा से जुड़ा हुआ है। यह केवल एक कानूनी प्रावधान नहीं बल्कि नागरिक‑जीवन, राजनीतिक विमर्श और सामाजिक परिवर्तन का मूल प्रेरक सिद्धांत है।

भारतीय संविधान की प्रस्तावना “विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, आस्था और उपासना की स्वतंत्रता” देने का संकल्प व्यक्त करती है जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की वैचारिक नींव है।  इस स्वतंत्रता को मानव गरिमा, व्यक्तित्व‑विकास और लोकतांत्रिक भागीदारी के लिए अनिवार्य माना गया है।

स्वतंत्रता आंदोलन के अनुभवों ने यह स्पष्ट किया कि बिना मुक्त अभिव्यक्ति के न तो औपनिवेशिक दमन का प्रतिरोध संभव था , न ही स्वतंत्र भारत में उत्तरदायी शासन की स्थापना हो सकती थी । इसलिए अभिव्यक्ति  के इस अधिकार को मौलिक अधिकारों के रूप में स्थान दिया गया।

अनुच्छेद 19(1)(क) : संवैधानिक प्रावधान

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(क) प्रत्येक नागरिक को “वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता” का मौलिक अधिकार प्रदान करता है। न्यायालयों की व्याख्या के अनुसार यह अधिकार केवल बोलने लिखने तक सीमित न रहकर मुद्रण, प्रेस, कला, सिनेमा, नाटक, प्रतीक, हाव भाव, पोस्टर, बैनर, डिजिटल और सोशल मीडिया आदि सभी माध्यमों से विचार व्यक्त करने की स्वतंत्रता समाविष्ट करता है।

इस अधिकार में विचार बनाने, उन्हें दूसरों तक पहुँचाने और सूचना प्राप्त करने की स्वतंत्रता भी निहित है।  यही कारण है कि प्रेस स्वतंत्रता और सूचना तक पहुँच को भी इसी अनुच्छेद के विस्तार के रूप में समझा जाता है। न्यायपालिका ने “कुछ न कहने” या मौन रहने के अधिकार को भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का ही नकारात्मक रूप माना है।

 अनुच्छेद 19(2) : युक्तियुक्त प्रतिबंध

भारतीय संविधान अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को निरंकुश नहीं मानता, बल्कि अनुच्छेद 19(2) के तहत उस पर युक्तियुक्त प्रतिबंध लगाने की अनुमति भी देता है। राज्य भारत की संप्रभुता और अखंडता, राज्य की सुरक्षा, विदेशी राज्यों से मैत्रीपूर्ण संबंध, सार्वजनिक व्यवस्था, शालीनता या सदाचार, न्यायालय की अवमानना, मानहानि और अपराध के लिए उकसावे के आधार पर कानून द्वारा इस स्वतंत्रता को सीमित कर सकता है।

उच्चतम न्यायालय ने समय समय पर स्पष्ट किया है कि कोई भी प्रतिबंध तभी वैध है जब वह प्रत्यक्ष और तर्कसंगत रूप से इन आधारों से जुड़ा हो तथा आवश्यकता से अधिक व्यापक न हो।  इसे ही “युक्तियुक्तता” की कसौटी कहा गया है। इस प्रकार संविधान अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सामाजिक हितों के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास करता है।

 न्यायालयों की प्रमुख व्याख्याएँ

सत्ता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रायः परस्पर आमने सामने खड़े नजर आते हैं, तथा अनेक बार न्यायालय को इस में हस्तक्षेप करना पड़ता है।

स्वतंत्रता के बाद आरंभिक निर्णयों में ही सर्वोच्च न्यायालय ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को “सभी लोकतांत्रिक संगठनों की नींव” कहा। रोमेश थापर बनाम मद्रास राज्य (1950) में सार्वजनिक व्यवस्था के नाम पर लगाए गए सेंसर को असंवैधानिक ठहराते हुए अदालत ने कहा कि सरकार की आलोचना और असहमति लोकतंत्र का स्वाभाविक अंग है।

सकल पेपर्स (1962) आदि मामलों में न्यायालय ने दो महत्वपूर्ण परीक्षण विकसित किए “निकटता परीक्षण”, जिसके अनुसार संभावित हानि और अभिव्यक्ति के बीच घनिष्ठ संबंध होना चाहिए, और “उचितता परीक्षण”, जिसके तहत किसी प्रतिबंध की संतुलनशीलता और आवश्यकता की जाँच की जाती है।

 राम मनोहर लोहिया प्रकरण में यह स्पष्ट किया गया कि कानून और सार्वजनिक व्यवस्था के बीच वास्तविक और निकट रिश्ता न हो तो अभिव्यक्ति पर लगाए गए प्रतिबंध टिक नहीं सकते।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता ही वह आधार है, जिस पर बहुदलीय राजनीति, निष्पक्ष चुनाव, सक्रिय नागरिक समाज और स्वतंत्र मीडिया खड़े होते हैं। नागरिक इसी के माध्यम से शासन की नीतियों पर राय दे पाते हैं, भ्रष्टाचार और दुरुपयोग को उजागर कर पाते हैं तथा सामाजिक आर्थिक न्याय की माँग उठा पाते हैं।

यह स्वतंत्रता केवल राजनीतिक आलोचना तक सीमित नहीं, बल्कि साहित्य, कला, संस्कृति, अकादमिक विमर्श और वैज्ञानिक अनुसंधान को भी उर्वर बनाती है।  विविध मतों और असहमति के सहअस्तित्व से ही लोकतांत्रिक समाज में सहिष्णुता और रचनात्मकता का विकास होता है।

 समकालीन चुनौतियाँ और संतुलन

डिजिटल युग में सोशल मीडिया, ऑनलाइन प्लेटफॉर्म और 24×7 मीडिया ने अभिव्यक्ति की संभावनाएँ बढ़ा दी हैं, पर साथ साथ फेक न्यूज़, घृणा भाषण और ट्रोलिंग जैसी चुनौतियाँ भी सामने आई हैं। कट्टरता बड़ी चुनौती है। राज्य सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था या “शालीनता” के नाम पर जब अधिक कठोर या अस्पष्ट कानून लागू करता है, तो आशंका पैदा होती है कि कहीं यह असहमति के दमन का उपकरण न बन जाए।

ऐसी स्थिति में न्यायपालिका की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि उसे प्रत्येक मामले में यह जांचना होता है कि क्या वास्तव में अभिव्यक्ति हिंसा, वैमनस्य या विधि भंग की वास्तविक संभावना पैदा करती है, या केवल अप्रिय, आलोचनात्मक और अलोकप्रिय विचार प्रस्तुति भर है। स्वस्थ लोकतंत्र के लिए आवश्यक है कि असहमति को “खतरा” नहीं बल्कि सुधार और आत्मसमीक्षा के अवसर के रूप में देखा जाए।

भारतीय संविधान अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को एक ओर मौलिक और उच्चतर मूल्य के रूप में मान्यता देता है, तो दूसरी ओर सामाजिक जिम्मेदारी और सार्वजनिक हित के साथ जोड़े बिना उसे पूर्ण स्वतंत्रता का रूप नहीं देता। अनुच्छेद 19(1)(क) और 19(2) के माध्यम से वह नागरिक अधिकारों और सामूहिक हितों के बीच गतिशील संतुलन की व्यवस्था करता है, जिसे न्यायालय अपनी व्याख्याओं से निरंतर परिष्कृत करते रहे हैं।

समकालीन भारत में आवश्यकता इस बात की है कि राज्य, न्यायपालिका, मीडिया और नागरिक समाज सभी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को केवल कानूनी प्रावधान न समझकर लोकतांत्रिक संस्कृति का आधार मानें और इसके प्रयोग तथा सीमाओं दोनों को विवेक, सहिष्णुता और जिम्मेदारी से संचालित करें।

साथ ही नागरिक स्वच्छंदता तथा स्वतंत्रता के अंतर को राष्ट्र बोध के साथ स्वयं नियंत्रण में रखते हुए समझें।

विवेक रंजन श्रीवास्तव