राजनीति

मलक्का स्ट्रेट में दबदबा बढाने के लिए भारत का अंडमान-निकोबार पायलट प्रोजेक्ट


रामस्वरूप रावतसरे


अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में भारत ने बड़े स्तर पर हवाई ढाँचे के विस्तार की योजना शुरू कर दी है। इस योजना का मकसद एक ओर पर्यटन और विकास को बढ़ावा देना है, तो दूसरी ओर हिंद महासागर क्षेत्र में चीन की बढ़ती गतिविधियों का जवाब देना भी है। द्वीप समूह के प्रशासक एडमिरल डीके जोशी ने दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान इस पूरी योजना की टाइमलाइन और उद्देश्य को स्पष्ट किया।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह नया हवाई अड्डा अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के सबसे दक्षिणी हिस्से ग्रेट निकोबार द्वीप पर बनाया जाएगा। यह स्थान मलक्का जलडमरूमध्य से करीब 40 समुद्री मील की दूरी पर बताया जा रहा है। मलक्का जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री मार्गों में से एक है और यहाँ से वैश्विक व्यापार का बड़ा हिस्सा गुजरता है। चीन के अधिकतर ऊर्जा आयात भी इसी मार्ग से आते हैं।
जानकारी के अनुसार करीब 15,000 करोड़ रुपए की लागत से बनने वाला यह हवाई अड्डा 2 रनवे वाला होगा और यहाँ बड़े सैन्य और नागरिक विमान उतर सकेंगे। एडमिरल जोशी ने कहा योजना के अनुसार लगभग 3 साल में यहाँ से पहली उड़ान शुरू हो जाएगी। यह परियोजना रक्षा मंत्रालय के मार्गदर्शन में आगे बढ़ाई जा रही है।
जानकारी के अनुसार मलक्का जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे व्यस्त और रणनीतिक समुद्री मार्गों में से एक है। यह संकरा समुद्री रास्ता हिंद महासागर को दक्षिण चीन सागर से जोड़ता है और इसी के जरिए एशिया, यूरोप, मध्य-पूर्व और अफ्रीका के बीच बड़े पैमाने पर व्यापार होता है। अनुमान है कि वैश्विक समुद्री व्यापार का लगभग एक तिहाई हिस्सा इसी मार्ग से होकर गुजरता है।
भौगोलिक दृष्टि से यह मलक्का जलडमरूमध्य, मलेशिया, सिंगापुर और इंडोनेशिया के बीच स्थित है। इसकी चौड़ाई कुछ स्थानों पर केवल 2.8 किलोमीटर तक रह जाती है, जिससे यह क्षेत्र सामरिक रूप से बेहद संवेदनशील बन जाता है। यदि किसी कारणवश यह मार्ग अवरुद्ध हो जाए तो पूरी दुनिया की आपूर्ति श्रृंखला पर तत्काल और गहरा प्रभाव पड़ सकता है। इसी वजह से दुनिया की बड़ी शक्तियाँ इस क्षेत्र पर करीबी नजर रखती हैं।
जानकारों का कहना है कि पिछले एक दशक में चीन ने अपनी समुद्री शक्ति में उल्लेखनीय विस्तार किया है। चीन की ऊर्जा आपूर्ति का बड़ा हिस्सा पश्चिम एशिया और अफ्रीका से आता है, जो मलक्का जलडमरूमध्य के रास्ते ही चीन पहुँचता है। इस निर्भरता को कई विश्लेषक ‘मलक्का दुविधा‘ के रूप में देखते हैं यानि अगर इस मार्ग पर नियंत्रण या अवरोध हो जाए तो चीन की ऊर्जा सुरक्षा पर गंभीर संकट आ सकता है।
भारत के लिए अंडमान और निकोबार द्वीप समूह की स्थिति अत्यंत महत्वपूर्ण इसलिए हो जाता है क्योंकि ये द्वीप मलक्का जलडमरूमध्य की पश्चिमी एंट्री के निकट स्थित हैं। भौगोलिक रूप से देखें तो भारत इन द्वीपों के माध्यम से उस समुद्री मार्ग के बेहद करीब मौजूद है, जहाँ से एशिया का विशाल व्यापारिक यातायात गुजरता है।
भारत ने इन द्वीपों पर पहले से ही त्रि-सेवा कमान स्थापित कर रखी है जो सेना, नौसेना और वायुसेना की संयुक्त कमांड है। अब यदि यहाँ हवाई पट्टियों का विस्तार और लॉजिस्टिक सुविधाओं का विकास किया जा रहा तो यह भारत की समुद्री निगरानी क्षमता को कई गुना तक बढ़ा सकता है। इसके साथ ही, समुद्र के नीचे बिछी कम्युनिकेशन केबलों की सुरक्षा भी मजबूत होगी। अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों के लिए भी यह कदम महत्वपूर्ण है क्योंकि वे भारत को क्षेत्र में संतुलन कायम रखने वाली ताकत के रूप में देखते हैं।
भारत द्वारा अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में सिर्फ हवाई अड्डे ही नहीं बनाए जा रहे हैं बल्कि पूरे द्वीपों को विकसित करने की बड़ी योजना चल रही है। एडमिरल जोशी ने बताया कि यहाँ बंदरगाहों को बेहतर बनाया जा रहा है, तेल की खोज पर काम हो रहा है, दूरसंचार यानी मोबाइल और इंटरनेट कनेक्शन मजबूत किए जा रहे हैं और पर्यटन को भी बढ़ावा दिया जा रहा है।
इन सभी कामों का मकसद है कि द्वीप आर्थिक रूप से मजबूत बनें और देश की सुरक्षा में भी अहम भूमिका निभा सकें। यहाँ हवाई अड्डों और सैन्य अड्डों का विस्तार भारत की सेना को आधुनिक और मजबूत बनाने की योजना का हिस्सा है। हिंद-प्रशांत क्षेत्र में बदलते हालात को देखते हुए यह कदम भारत की रणनीतिक ताकत बढ़ाने में मदद करेगा बल्कि देश की सुरक्षा भी और मजबूत होगी।

रामस्वरूप रावतसरे