विश्ववार्ता

शांति वार्ता में अमेरिका से अड़ गया ईरान आखिर लेबनान को इजराइली हमलों से क्यों बचा रहा? 

राजेश श्रीवास्तव

दुनिया भर की निगाहें ईरान और अमेरिका की पाकिस्तान के इस्लामाबाद में हुई शांति वार्ता पर लगी थीं लेकिन एक दिन के भीतर ही दोनों देशों के अड़ियल रवैये के चलते इस्लामाबाद शांति वार्ता धूल चाटते नजर आयीं। अब जब दोनों देशों के बीच वार्ता टूट गयी हैं और दोनों देश वापस आमने-सामने हैं तो परिणाम भी और घातक होने की उम्मीद है। इस वार्ता में सबसे बड़ी बाधा बना इजरायल का लेबनान पर हमला। ईरान किसी कीमत पर इस मुद्दे को छोड़ने को राजी नहीं हुआ और उधर इजरायल ने भी अमेरिका को दो टूक कह दिया कि परिणाम कुछ भी हो लेकिन वह लेबनान को अंतिम क्षण तक नहीं छोड़ेगा। तो आखिर ऐसा क्या है कि लेबनान का साथ छोड़ने को ईरान तैयार नहीं हो रहा है, यह हमें समझना होगा। शांति वार्ता में ईरान ने लेबनान का मुद्दा उठाया। ईरान लेबनान में इजराइल के हमले रोकने अमेरिका से अड़ गया। अब सवाल है कि ईरान लेबनान पर हमले रोकने की बात क्यों कर रहा है? उसे लेबनान की इतनी चिता आखिर क्यों है?

इस्लामाबाद में ईरान-अमेरिका की शांति वार्ता में लेबनान एक बड़ा मुद्दा बना। ईरान ने साफ कहा, इजराइल लेबनान पर हमले तुरंत बंद करे और इसके लिए अमेरिका इजराइल पर दबाव बनाए। उसे यह भी पता है कि अगर अमेरिका कहेगा तो इजराइल हमले बंद कर सकता है अन्यथा वह इस काम को जारी रखेगा। ऐसे में सवाल है कि युद्धरत ईरान, अपने सुप्रीम लीडर को खोने वाला ईरान, दर्जनों टॉप लीडर्स की मौत के बाद भी वह लेबनान पर हमले रोकने की बात क्यों कर रहा है? उसे लेबनान की इतनी चिता आखिर क्यों है?

दरअसल पश्चिम एशिया की राजनीति बहुत जटिल है. ईरान और लेबनान का रिश्ता भी अलग तरह का है। इसके पीछे रणनीति, सुरक्षा, विचारधारा और क्षेत्रीय असर की बड़ी कहानी है। ईरान के लिए लेबनान सिर्फ एक छोटा अरब देश नहीं है बल्कि यह उसके क्षेत्रीय समीकरण का अहम हिस्सा है। अगर लेबनान अस्थिर होता है तो उसका असर सिर्फ बेरूत तक नहीं रहता. उसकी गूंज तेहरान, दमिश्क, गाजा, इराक और यहां तक कि इजरायल की सीमा तक सुनाई देती है।

ईरान लंबे समय से खुद को पश्चिम एशिया की बड़ी ताकत के रूप में देखता है। वह चाहता है कि इस क्षेत्र में उसका प्रभाव बना रहे। इस मकसद के लिए उसे ऐसे स्थान चाहिए, जहां उसका राजनीतिक और सामरिक असर हो। लेबनान ऐसा ही एक अहम बिदु है। लेबनान की स्थिति बहुत खास है। यह इजराइल के बेहद करीब है। सीरिया से इसका सीधा संपर्क है। भूमध्य सागर तक इसकी पहुंच है। यानी यह एक ऐसा भू-राजनीतिक ठिकाना है, जहां से बड़े क्षेत्रीय समीकरण प्रभावित किए जा सकते हैं। इसीलिए ईरान के लिए लेबनान सिर्फ एक दोस्त देश नहीं है। यह एक रणनीतिक जगह है। अगर यहां उसका प्रभाव कम होता है, तो क्षेत्र में उसकी पकड़ भी कमजोर पड़ सकती है। इसी कारण वह लेबनान को अपने बड़े सुरक्षा ढांचे का हिस्सा मानता है।

दूसरी तरफ अगर यह चर्चा की जाये तो हिजबुल्लाह की चर्चा भी जरूरी है। यह लेबनान का एक बड़ा राजनीतिक और सैन्य संगठन है। दुनिया इसे ईरान का करीबी मानती है। ईरान हिज्बुल्लाह को सिर्फ एक सहयोगी संगठन के रूप में नहीं देखता। वह इसे अपनी प्रतिरोध नीति का हिस्सा मानता है। ईरान का मानना रहा है कि इजरायल के खिलाफ दबाव बनाए रखने में हिज्बुल्लाह की बड़ी भूमिका है। यदि लेबनान में बड़ा युद्ध होता है, तो सबसे बड़ा असर हिज्बुल्लाह पर पड़ता है। यदि हिज्बुल्लाह कमजोर होता है, तो ईरान की क्षेत्रीय ताकत भी कम होती है। इसी कारण ईरान लेबनान में तनाव बढ़ने से चितित रहता है। वह चाहता है कि हालात इतने न बिगड़ें कि उसका सबसे महत्वपूर्ण सहयोगी गहरे संकट में पड़ जाए।

ईरान और इजराइल के रिश्ते लंबे समय से टकराव वाले रहे हैं। दोनों देश एक-दूसरे को बड़े खतरे के रूप में देखते हैं। ईरान सीधे इजराइल से पारंपरिक युद्ध नहीं लड़ता। इसके बजाय वह क्षेत्रीय नेटवर्क, सहयोगी समूहों और राजनीतिक प्रभाव के जरिए संतुलन बनाने की कोशिश करता है।

ईरान के नजरिए से देखें तो लेबनान में मौजूद उसका प्रभाव, इजरायल पर एक तरह का सामरिक दबाव है। यह दबाव सिर्फ सैन्य नहीं, मनोवैज्ञानिक और कूटनीतिक भी है। अगर लेबनान में जंग फैल जाती है तो पूरा संतुलन बिगड़ सकता है. या तो बड़ा क्षेत्रीय युद्ध छिड़ सकता है, या फिर ईरान का एक अहम दबाव बिदु कमजोर हो सकता है। इसीलिए ईरान यह चाहता है कि हालात उसके नियंत्रण से बाहर न जाएं। वह तनाव को अपने हित में बनाए रखना चाहता है लेकिन पूर्ण युद्ध से बचना भी चाहता है।

ईरान खुद को सिर्फ एक देश के रूप में नहीं, बल्कि एक विचार के रूप में भी पेश करता है। इस सोच में ऐसे समूह और देश शामिल माने जाते हैं, जो इजरायल और पश्चिमी दबाव का विरोध करते हैं। लेबनान इस विचारधारा में महत्वपूर्ण जगह रखता है। यहां शिया समुदाय की बड़ी आबादी है। हिज्बुल्लाह का सामाजिक और राजनीतिक आधार भी इसी समाज में है। ईरान ने वर्षों तक इस जुड़ाव को मजबूत किया है। इस रिश्ते में धर्म, राजनीति और पहचान तीनों जुड़े हुए हैं। ईरान खुद को कई बार उन समुदायों का समर्थक बताता है, जिन्हें वह दबाव में मानता है। लेबनान में उसकी सक्रियता इसी छवि को भी मजबूत करती है। यही कारण है कि लेबनान का सवाल ईरान के लिए सिर्फ रणनीतिक नहीं, प्रतीकात्मक भी है। अगर लेबनान में उसके करीबी गुट कमजोर पड़ते हैं तो उसकी वैचारिक साख पर भी असर पड़ सकता है। इसलिए वह वहां जंग और अराजकता को अपने लिए नुकसान मानता है।

ईरान जानता है कि लेबनान में युद्ध कभी सिर्फ लेबनान तक सीमित नहीं रहता। वहां हालात बिगड़ते हैं, तो सीरिया प्रभावित होता है। इजरायल की उत्तरी सीमा पर तनाव बढ़ता है। गाजा का सवाल और जटिल हो जाता है। इराक और यमन तक इसका राजनीतिक असर महसूस किया जा सकता है, यानी लेबनान एक चिंगारी की तरह है। अगर यह भड़कती है तो पूरा क्षेत्र इसकी आग में घिर सकता है।

ईरान ऐसा नहीं चाहता, खासकर उस समय जब वह कई मोर्चों पर दबाव झेल रहा हो। उसके लिए यह जरूरी है कि संघर्ष इतना न बढ़े कि अमेरिका जैसे बाहरी खिलाड़ी सीधे ज्यादा सक्रिय हो जाएं। यह भी जरूरी है कि क्षेत्रीय युद्ध की स्थिति न बने। ईरान कई बार लेबनान में युद्ध विराम या तनाव कम करने की बात पहले भी करता रहा है, यह सिर्फ मानवता का सवाल नहीं होता, यह उसके अपने रणनीतिक हित का भी मामला होता है। इस तरह साफ शब्दों में कहें तो लेबनान, ईरान के लिए सिर्फ एक पड़ोसी क्षेत्रीय मुद्दा नहीं है, यह उसकी सुरक्षा, रणनीति, विचारधारा और प्रभाव का महत्वपूर्ण केंद्र है। लेबनान में उसका प्रभाव, इजराइल के खिलाफ संतुलन देता है। हिज्बुल्लाह के कारण उसकी पकड़ मजबूत होती है। विचारधारा के स्तर पर भी उसे एक पहचान मिलती है.

सबसे बड़ी बात, लेबनान की स्थिरता या अस्थिरता पूरे पश्चिम एशिया का तापमान तय कर सकती है। इसीलिए जब शांति वार्ता होती है तो ईरान लेबनान में जंग रोकने की मांग पर जोर देता है। यह सिर्फ दोस्ती का मामला नहीं है। यह उसके हित, उसके नेटवर्क और उसके भविष्य की राजनीति का सवाल है। लेबनान शांत रहता है, तो ईरान को क्षेत्र में सांस लेने की जगह मिलती है. अगर लेबनान जलता है, तो उसकी लपटें पूरे इलाके को घेर सकती हैं। यही वजह है कि तेहरान, लेबनान को लेकर हमेशा बेहद सतर्क रहता है और इस बार इस्लामाबाद में भी उसकी वही सतर्कता दिखाई दे रही है।

…जो ईरान से चाहता है अमेरिका

अमेरिका और ईरान के बीच इस्लामाबाद में चलने वाली शांति वार्ता वैध मांगों की वजह से फ़ेल हो गई। ये बयान ईरान के विदेश मंत्रालय की तरफ से सामने आया। 21 घंटे तक चलने वाली बातचीत का कोई नतीजा क्यों नहीं निकला? आखिर इस्लामाबाद से अमेरिका को खाली हाथ वापस फिर से क्यों जाना पड़ा? इन सवालों को जवाब है वो लीबिया मॉडल, जिसे अमेरिका ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर लागू करना चाहता है। ये मॉडल ईरान को पूरी तरह से पंगु बना देगा, जिसका नतीजा उसके लिए भयानक हो सकता है। ये एक ऐसी रणनीति है जिसका मकसद सैन्य बल के बजाय कूटनीतिक दबाव के ज़रिए तेहरान की परमाणु क्षमताओं को खत्म करना है। हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से मुलाकात के बाद, इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने मीडिया से कहा था कि वह ईरान के साथ 2००3 में लीबिया के साथ हुए समझौते जैसा ही एक समझौता करना चाहते हैं। अमेरिका के रिपब्लिकन सीनेटर टॉम कॉटन की पहले बयानों से नेतन्याहू का बयान मेल खाता है। इसी समझौते के तहत लीबिया की राजधानी त्रिपोली ने अपने परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह और हमेशा के लिए खत्म कर दिया था।

अगर ईरान, अमेरिका के लीबिया मॉडल को मान लेता है तो उसे परमाणु कार्यक्रम को खुद से बंद करना होगा। ईरान को अपने संवंर्धित यूरेनियम और हथियारों का पूरी तरह से सरेंडर करना होगा। ईरान को भविष्य में कभी भी फिर से परमाणु कार्यक्रम शुरू करने की अनुमति नहीं होगी। लीबिया मॉडल के तहत अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के द्बारा निरीक्षण की अनुमति होगी, यानी ईरान में परमाणु परीक्षण हो रहा है या नहीं, इसको लेकर वहां अंतरराष्ट्रीय संगठन जाकर निरीक्षण कर सकते हैं। अमेरिका के लीबिया मॉडल के मुताबिक, अगर ईरान इसे स्वीकार कर लेता है तो परमाणु कार्यक्रम बंद करने के बदले उसे आर्थिक राहत दी जाएगी। ईरान को अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों से पूरी तरह छूट रहेगी। यहां हैरान करने वाली बात ये है कि 2००3 में लीबिया के नेता गद्दाफी ने अमेरिका की बात मानकर परमाणु कार्यक्रम बंद किया था। परमाणु कार्यक्रम बंद करने के बाद गद्दाफी की हत्या कर दी गई थी। गद्दाफी के करीबियों ने माना परमाणु कार्यक्रम को बंद करना गद्दाफी की गलती थी।