लेख विश्ववार्ता

अमेरिकी चक्रव्यूह  में फंसे ईरान को तारणहार की तलाश!

कमलेश पांडेय

खाड़ी देश ईरान में बढ़ते जनअसंतोष से अमेरिका-इजरायल के पौ बारह हो चुके हैं। जिस तरह से अमेरिका ने इस जनअसंतोष को हवा दी, उससे तो यही प्रतीत होता है कि देर सबेर ईरान को घुटने टेकने ही पड़ेंगे या फिर चीन-रूस-तुर्किये के अलावा इस्लामिक देशों का साथ लेकर उसे अपने अस्तित्व की रक्षा करनी होगी हालांकि बेनेज़ुएला का नजीर उसके सामने है। अमेरिका जो चाहता है, कर लेता है। यहां भी रूस-चीन उसके राष्ट्रपति को नहीं बचा पाए। इसलिए यक्ष प्रश्न है आखिर ईरान कैसे अमेरिकी चक्रव्यूह  को भेदेगा? क्या चीन-रूस-तुर्किये समेत 56 मुस्लिम देश ईरान की मदद को आगे आएंगे और उसका तारणहार बनेंगे?

ऐसा सुलगता सवाल इसलिए कि ईरान अमेरिकी दबाव, सैन्य धमकियों और आंतरिक विरोध प्रदर्शनों के बीच गंभीर संकट में फंसा हुआ है जहां ट्रंप प्रशासन स्ट्राइक विकल्पों पर विचार कर रहा है। ऐसे में ईरान के पास प्रतिक्रिया के सीमित लेकिन रणनीतिक विकल्प बाकी हैं जो सैन्य, कूटनीतिक और आर्थिक क्षेत्रों में फैले हैं हालांकि, ईरान को यह ध्यान रखना होगा कि रूस या चीन के भरोसे वह कोई रिस्क नहीं ले क्योंकि बेनेज़ुएला का उदाहरण उसके सामने है। 

बेहतर होगा कि ईरान दुनिया के 56 मुस्लिम देशों के साथ अपने अस्तित्व रक्षा की डील करे। इससे उनकी इस्लामिक सियासत की परीक्षा भी हो जाएगी क्योंकि अधिकांश मुस्लिम देश तो अमेरिका व यूरोप के गठजोड़ के समक्ष नतमस्तक रहते हैं। वहीं ईरान को इराक व सीरिया के हश्र से भी सबक लेनी चाहिए लेकिन अफगानिस्तान मॉडल को अपना कर देर सबेर ईरान खुद को अमेरिकी चंगुल से बचा सकता है।

इसलिए ईरान आत्मरक्षार्थ सैन्य विकल्प आजमाने हेतु अपनी रणनीति मजबूत करे क्योंकि ईरान अपनी मिसाइल क्षमता और क्षेत्रीय प्रॉक्सी ताकतों (जैसे- हिजबुल्लाह, हूती, इराकी मिलिशिया) का उपयोग करके अमेरिकी और उसके सहयोगियों के ठिकानों पर हमला कर सकता है। साथ ही होर्मुज जलडमरूमध्य बंद करना या अमेरिका के खिलाफ साइबर हमले भी संभावित हैं लेकिन ये पूर्ण युद्ध को आमंत्रित कर सकते हैं।

शायद इसलिए ईरान को कूटनीतिक रास्ते अपनाने होंगे। ईरान अमेरिका के विशेष दूत स्टीव विटकॉफ के साथ संवाद को पुनः शुरू कर सकता है जैसा विदेश मंत्री अराघची ने संकेत दिया है, वहीं क्षेत्रीय सहयोगियों (रूस, चीन) से समर्थन मांगना या परोक्ष वार्ता भी एक प्रयास हो सकता है।  ईरान आर्थिक प्रतिरोध भी कर सकता है। इस हेतु ईरान अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद तेल निर्यात जारी रखे या वैकल्पिक व्यापारिक रास्ते (चीन, तुर्की) मजबूत करे जो ईरान की सफल रणनीति साबित हो सकती है हालांकि, ईरान का आर्थिक संकट गहरा रहा है जो उसकी आंतरिक अस्थिरता को बढ़ा सकता है। मौजूदा जनअसंतोष की यही वजह है।

जहां तक ईरान की आंतरिक स्थिरता की बात है तो विरोध दबाने के लिए IRGC और बसीज तैनाती बढ़ाना जारी है लेकिन यह विद्रोह को भड़का सकता है। जिस तरह से ईरानी सेना उपद्रवियों के दमन कर रही है, उससे जनअसन्तोष और भड़क सकता है और भड़क भी रहा है क्योंकि प्रदर्शनकारियों को अमेरिका, रजा शाह और इजरायल का पूरा सहयोग व नैतिक समर्थन मिल रहा है। इसलिए ईरान अपने न्यूक्लियर कार्यक्रम को तेज करे क्योंकि ऐसा करना उसकी हिफाजत का अंतिम हथियार हो सकता है।

कहना न होगा कि ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंधों और आर्थिक संकट ने भारी दबाव डाला है जहां मुद्रा अवमूल्यन और 64% खाद्य महंगाई आम जनता को प्रभावित कर रही है। फिर भी, कुछ राहत के रास्ते बचे हैं. मुख्यतः चीन और रूस जैसे सहयोगियों के साथ तेल व्यापार पर निर्भर है।

ईरान के तेल निर्यात पर ही उसका सब कुछ निर्भर है। चीन ईरान का 90% तेल खरीदता है जो स्वतंत्र रिफाइनरियों को छूट पर बेचा जाता है जिससे उत्पादन पूर्व-प्रतिबंध स्तर पर पहुंचा। वहीं, रूस के साथ ईरान का निर्यात बढ़ा (2022 में $692 मिलियन) है जो वैकल्पिक बाजार प्रदान करता है।

जहां तक कूटनीतिक प्रयास की बात है तो विदेश मंत्री अराघची प्रतिबंध हटाने के लिए JCPOA जैसी वार्ताओं को आगे बढ़ा रहे हैं जो आर्थिक सुधार ला सकती हैं।

हालांकि, अमेरिका से प्रमुख राहत की मांग राजनीतिक बदलाव पर निर्भर है। जहां तक आंतरिक उपाय की बात है तो सरकार मासिक $7 भुगतान और सब्सिडी क्रेडिट दे रही है लेकिन ये अपर्याप्त हैं। वहीं, होर्मुज जलमार्ग का सामरिक महत्व व्यापार बनाए रखने में मदद करता है।

चूंकि ईरान को उसके आर्थिक संकट में तत्काल राहत प्रदान करने के लिए चीन, रूस और तुर्की जैसे प्रमुख देश हैं जो उसकी मदद कर सकते हैं, खासकर तेल खरीद और व्यापार के माध्यम से समर्थन दे सकते हैं क्योंकि ये देश ही अमेरिकी प्रतिबंधों को दरकिनार कर ईरान को आर्थिक सांस प्रदान करते हैं। इसमें चीन का योगदान अधिक है। चीन ईरान का सबसे बड़ा तेल खरीदार है जो 77-90% निर्यात सोखता है और 400 अरब डॉलर निवेश का वादा कर चुका है। यह तत्काल नकदी प्रवाह सुनिश्चित करता है।

वहीं रूस का समर्थन भी ईरान को प्राप्त है। रूस ने निर्यात को $692 मिलियन तक बढ़ाया और संयुक्त ब्रिक्स प्रयासों से आर्थिक सहायता दे सकता है। दोनों देश प्रतिबंध-विरोधी व्यापार बढ़ा रहे हैं। वहीं ईरान को अन्य संभावित स्रोत से भी मदद लेनी चाहिए। जैसे- तुर्की और यूएई ईरान के व्यापारिक साझेदार हैं (2022 में $10-37 अरब), जो सीमापार लेन-देन से त्वरित मदद दे सकते हैं। हालांकि, ईरान के व्यापारिक सहयोगियों पर ट्रंप के नए 25% टैरिफ लगाने से ये रास्ते जटिल हो रहे हैं।

बावजूद इसके चीन ईरान को आर्थिक रूप से मजबूत समर्थन दे रहा है, मुख्यतः तेल खरीद के जरिए, जो ईरान के निर्यात का 77-90% हिस्सा है। यह समर्थन 25-30 अरब डॉलर सालाना राजस्व प्रदान करता है, साथ ही 400 अरब डॉलर के लंबी अवधि के निवेश समझौते (2021) से तत्काल नकदी और बुनियादी ढांचा विकास संभव हो रहा है। जहां तक तेल व्यापार का पैमाना है तो 2025-26 में चीन ने ईरान से प्रतिबंध-विरोधी तरीके से 1.5 मिलियन बैरल प्रतिदिन तेल आयात किया, जो टेकआवे रिफाइनरियों के जरिए होता है। इससे ईरान को प्रतिबंधों के बावजूद GDP का 10-15% राजस्व मिला।

वहीं ईरान में निवेश और ऋण से भी चीन मदद कर रहा है। चीन ने 25 अरब डॉलर से अधिक ऊर्जा क्षेत्र में निवेश किया, जिसमें सड़क, रेल और बंदरगाह परियोजनाएं शामिल हैं। BRICS ढांचे में अतिरिक्त वित्तीय सहायता संभव है, जो तत्काल राहत दे सकती है। फिर भी चीन की अपनी सीमाएं हैं। ईरान के कारोबारी सहयोगियों पर ट्रंप ने नया 25% टैरिफ बढ़ाने का जो दांव चला है, उससे ईरान के सहयोगियों पर दबाव बढ़ा है, लेकिन चीन ने प्रतिबद्धता जताई है। कुल मिलाकर, यह समर्थन ईरान की अर्थव्यवस्था को ढहने से बचा रहा है।

इससे ग्रामीण भारत की एक प्रचलित कहावत- जबरा मारे, रोने न दे…ईरान पर सत्य प्रतीत होती है। उसका पड़ोसी इराक भी अमेरिका का सहज शिकार बन चुका है। मसलन, वैश्विक स्तर पर अमेरिका को यही स्थिति प्राप्त है। वह बारी बारी सबको दंडित करता है, लेकिन उसकी आर्थिक, तकनीकी व सैन्य समृद्धि के सामने कोई भी देश हद से ज्यादा चूं-चांय नहीं कर पाता है। आलम यह है कि लोकतंत्र के नाम पर वह पूरी दुनिया में घूम-घूम कर संघर्ष के हालात पैदा करता है, समूह-समूह में झगड़ा लगवाता है और फिर हथियार व अन्य साजो-सामान बेचता है। ड्रग्स की तस्करी करवाता है। आतंकवाद का ‘निर्यात’ करता है। यह उसका मुख्य पेशा है जिससे वह खूब कमाता है और फिर सहयोग के नाम पर पालतू देशों को नचाता है। 

कहा जाता है कि उसका डीप स्टेट यही चाहता है। उसके रणनीतिकारों ने दुनियाभर में अपने पालतू पूंजीपति पैदा किये हैं जो अपने अपने देश के नेताओं के दिल-दिमाग पर काबिज हैं और अमेरिका के लिए लाभदायक स्थिति पैदा करते-करवाते रहते हैं। इस दिशा में जो भी उसके समकक्ष खड़ा होना चाहता है और अमेरिका को खुली चुनौती देने की हिमाकत दिखाता है, अमेरिका उसे बर्बाद करने पर तुल जाता है। 1980-90 के दशक में सोवियत संघ (रूस और अन्य चौदह पड़ोसी देशों का समूह) को क्षत-विक्षत करने के पीछे यही वजह है।

वहीं, अब 2010-20 के दशक में वह चीन-रूस गठजोड़ के पीछे पीलकर पड़ चुका है और एक-एक करके रूस-चीन के सहयोगियों को कमजोर कर रहा है। पहले बेनेज़ुएला और अब ईरान के घटनाक्रम इसी बात की तस्दीक करते हैं। वैसे तो ब्रिक्स में शामिल भारत, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका भी उसके निशाने पर हैं लेकिन वह इनकी आर्थिक व सैन्य मजबूती देखते हुए खल कूटनीति के द्वारा इन्हें हरदी-गुरदी बोलवाने की चालें चल रहा है। 

कमलेश पांडेय