वाकई भ्रष्टाचार कोई मुद्दा नहीं रहा ?

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अनिल अनूप

कई बार लगता है मानो भ्रष्टाचार कोई मुद्दा ही नहीं रहा। नेता भ्रष्ट हैं, अधिकारी भ्रष्ट हैं, व्यापारी भ्रष्ट हैं, जनता भ्रष्ट है। हमारी रग-रग में भ्रष्टाचार भर गया है। जब सभी भ्रष्ट हैं, तो इसे जीवन का हिस्सा मानकर स्वीकार कर लिया गया है। भ्रष्टाचार के मुद्दे पर किसी भ्रष्ट सरकारी अधिकारी से लड़ना ‘आ बैल मुझे मार’ जैसा है, अतः हम लोग चुपचाप रिश्वत देकर काम करवाना ही ठीक समझते हैं। वरना यह लगभग पक्का है कि उस भ्रष्ट अधिकारी का कुछ बिगड़े या न बिगड़े पर हमारा काम जरूर अटक जाएगा। भ्रष्टाचार की मकबूलियत इस हद तक की है कि आज से 45 साल पहले भी जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने ‘हमारा भारत महान’ का नारा दिया था, तो समाज में प्रचलित चुटकुलों में ‘99 प्रतिशत बेईमान, फिर भी मेरा देश महान’ शामिल हो गया। हम लोग इन चुटकुलों को पढ़ते थे, हंसते थे और भुला देते थे, हमें गुस्सा नहीं आता था। भ्रष्टाचार के बहुत से नुकसान हैं। हमारा देश गरीब लोगों का अमीर देश है। यहां प्राकृतिक संसाधनों और खनिज पदार्थों की भरमार है, लेकिन लोग गरीब हैं। गरीबों और अमीरों के बीच की खाई उत्तरोत्तर बढ़ती जा रही है। अन्नदाता होने के बावजूद किसान आत्महत्या कर रहे हैं। गरीबी से सताया हुआ व्यक्ति इतना विवश हो जाता है कि वह अकसर अपना अपमान भी चुपचाप सह लेता है। इससे उसका आत्मविश्वास जाता रहता है और समाज में उसका योगदान घटने लगता है। गरीब-अमीर के बीच की खाई के कारण सत्ता कुछ ही हाथों में केंद्रित होकर रह गई है और देश का विकास थम गया है।

भ्रष्टाचार पर काबू पाने के उपायों के संबंध में लोगों की राय अलग-अलग है। कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि पहले हमें बदलना होगा, तभी कोई सुधार संभव है। दूसरी ओर प्रशासनिक सुधारों से जुड़े रहे अनुभवी लोगों का मानना है कि भ्रष्टाचार पर काबू पाने का एक ही तरीका है कि सिस्टम में आमूल-चूल सुधार किया जाए। मुझे लगता है कि यह नजरिया ज्यादा कारगर है। मेरा अपना अनुभव भी इसी की गवाही देता है। लगभग दो दशक पहले जब मैं छुट्टियां मनाने इंग्लैंड गया था, तो हमारे परिवार की महिलाएं खरीदारी के लिए एक बड़े मॉल में गईं। चूंकि उनकी सारी खरीददारी महिलाओं के सामान से संबंधित थी और बाहर मौसम बहुत सुहावना था इसलिए मैं कुछ देर के लिए मॉल से बाहर निकल कर पार्किंग में आ गया। पार्किंग में गाडि़यों की भरमार थी और कुछ गाडि़यों में लोग बैठे हुए आपस में गपशप भी कर रहे थे। मैंने देखा कि पार्किंग में एक जगह चमड़े की एक नई बैल्ट गिरी पड़ी थी। निश्चय ही कोई ग्राहक खरीददारी के बाद अपनी गाड़ी में बैठते समय गलती से बैल्ट वहां गिरा गया था। उसके साथ की पार्किंग की जगह पर जो गाड़ी खड़ी थी, उसमें दो युवतियां और एक युवक बैठे आपस में बातचीत में मशगूल थे। मैं लगभग 10 मिनट तक देखता रहा। इस बीच कई गाडि़यों वाले आए और गए, लेकिन किसी ने भी वह बैल्ट उठाने की कोशिश नहीं की। तभी मॉल का एक कर्मचारी बाहर पार्किंग में आया, तो मैंने उसे बैल्ट दिखाकर बताया कि किसी ग्राहक की बैल्ट गिर गई है और वह उसे संभाल ले ताकि यदि ग्राहक वापस पूछता हुआ बैल्ट लेने आए, तो उसे बैल्ट मिल जाए।

मॉल के उस कर्मचारी ने बड़ी विनम्रतापूर्वक बात करते हुए मुझे बताया कि बैल्ट का छूट जाना उनके संज्ञान में है और जो भी व्यक्ति बैल्ट उठाएगा, वे उसका उस दिन की खरीददारी का बिल चैक करेंगे और जांच लेंगे कि क्या उसने उनके मॉल से सचमुच उस दिन बैल्ट खरीदी थी। मॉल के कर्मचारी की उस सूचना ने मेरे ज्ञान चक्षु खोल दिए। वह बैल्ट वहां दो घंटे से ज्यादा समय से पड़ी थी और पार्किंग में आने वाला हर व्यक्ति उसे देख रहा था, तो भी अगर उस बैल्ट को कोई उठा नहीं रहा था तो इसका कारण यह था कि उन्हें पता था कि सीसीटीवी कैमरे के माध्यम से इस बैल्ट पर नजर रखी जा रही है और बैल्ट उठाने वाले व्यक्ति के बिल की जांच की जाएगी। अगर ऐसा भारतवर्ष में हुआ होता, तो वह बैल्ट शायद वहां 5 मिनट भी न रह पाती। हमारे देश में महापुरुषों की कमी कभी नहीं रही, हम स्वभाव से आदर्शवादी हैं, फिर भी यदि समाज में नैतिक गिरावट बढ़ती जा रही है, तो इसका कारण यही है कि भ्रष्टाचार की रोकथाम के लिए कोई मजबूत सिस्टम उपलब्ध नहीं है। इसका प्रमाण यह है कि विदेशों में बसे भारतीय सफल भी हैं और नैतिक तथा समाजिक रूप से जिम्मेदार भी। यदि सचमुच भारतीय होने के कारण हम बेईमान होते, तो फिर विदेशों में बसे भारतीय भी बेईमान ही होते। विभिन्न अध्ययनों से सिद्ध होता है कि देश का सिस्टम कैसा भी हो, लगभग 10 प्रतिशत लोग ईमानदार होते ही हैं और कुछ भी कर लें तो भी 10 प्रतिशत के लगभग लोग बेईमानी से बाज नहीं आते।

समाज के शेष बचे 80 प्रतिशत लोग समाज की स्थितियों के अनुसार ढल जाते हैं। यदि सिस्टम मजबूत हो,बेईमानी पर तुरंत सजा होती हो, तो ये लोग बेईमानी की कोशिश नहीं करते। लेकिन यदि वे यह देखें कि बेईमानी करने वाला फल-फूल रहा है, उसे कोई सजा नहीं मिल रही, बल्कि वह बेईमानी के बावजूद जीवन का ज्यादा आनंद ले रहा है अथवा सत्ता का सुख भोग रहा है, तो ये 80 प्रतिशत लोग भी बेईमानी पर उतर आते हैं। इसलिए कहा जाता है कि भ्रष्टाचार पर रोकथाम के लिए आवश्यक है कि हम सिस्टम की मजबूती की ओर ध्यान दें। हमारे समाज की अवनति का कारण ही यह है कि हमारे देश में सत्तारूढ़ लोगों ने अपने निहित स्वार्थों की खातिर सिस्टम को मजबूत बनाने के बजाय या तो सिस्टम बनाया ही नहीं, या फिर जानबूझकर उनमें खामियां छोड़ दीं। कर्नाटक के हालिया विधानसभा चुनावों के परिणाम आने के बाद सिस्टम की खामी फिर से उजागर हुई, जब राज्यपाल ने बहुमत प्राप्त दल के नेता को शपथ न दिलवा कर भाजपा के नेता को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलवा दी। इसकी जगह यदि हमारे संविधान में यह प्रावधान होता कि अस्पष्ट बहुमत की स्थिति में बहुमत वाले गठबंधन को सरकार बनाने का मौका सबसे पहले दिया जाए, विधायकों और सांसदों का दलबदल संभव न हो तथा अस्पष्ट बहुमत की स्थिति में सदन में शक्ति-परीक्षण तुरंत करवाया जाए, तो विधायकों की खरीद-फरोख्त की आशंका ही न रहती और भ्रष्टाचार का डर न रहता। यह स्पष्ट है कि भारतीय आदतन भ्रष्ट नहीं हैं, हमारा सिस्टम हमें भ्रष्ट बनने के लिए विवश कर रहा है। भ्रष्टाचार पर रोकथाम के लिए एक-एक आदमी को बदलना न संभव है न वांछित। उपाय यही है कि हम सिस्टम को मजबूत बनाएं, भ्रष्टाचार की संभावना पर रोक लगाने के उपाय करें, ताकि समाज में चल रहे नैतिक पतन पर रोकथाम लग सके और हम विकास के पायदान चढ़ते रह सकें।

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