आखिर टल ही गया अमरनाथ यात्रा पर टकराव

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विनोद बंसल

श्री अमरनाथ एवं बूढा अमरनाथ यात्री न्यास के द्वारा गत 8 मई से ही यात्रियों के 15 जून से प्रारम्भ होने बाली यात्रा के लिए पंजीयन प्रारम्भ कर दिया गया तथा हजारों भक्त 13 मई शाम तक जम्मू पहुंच गये। न्यास ने यात्रा रवाना करने की पूरी तैयारी कर ली थी। इसके लिए सुबह जम्मू के रणवीरेश्वर मंदिर में पूजा भी की गई। यात्रियों का जोश व न्यास की तैयारियों के आगे प्रशासन को आखिर झुकना पडा और इस सम्बन्ध में न्यास की सरकार के साथ पिछली 13 दौर की बातचीत विफल रहने के बाद भी सोमवार को एक बार फिर प्रशासन ने यात्री न्यास के सदस्यों को बैठक के लिए कनाल रोड़ स्थित गेस्ट हाउस में बुलाया। दिन भर चली तीन दौर की वार्ता के बाद शाम होते आखिर सरकारी प्रतिनिधियों को यह आभास हो गया कि यात्रा को 15 जून से प्रारम्भ कराने के अलावा कोई विकल्प अब शेष नहीं रह गया है किन्तु, रास्ता पूरी तरह से बर्फ़ की मोटी चादर से ढका है। न्यास जहां ज्येष्ठ पूर्णिमा को पूजा करने पर अडिग था तो प्रशासन को डर था कि यदि इतने बडे पैमाने में यात्रियों को जाने दिया तो कोई बडा हादसा हो सकता है।

हिन्दुओं की पवित्र श्री अमरनाथ यात्रा की अवधि को लेकर गत दो माह से उहा-पोह की स्थिति बनी हुई थी। विहिप सहित देश भर की तीस से अधिक हिन्दू धार्मिक संस्थाओं का प्रतिनिधि संगठन श्री अमरनाथ एवं बूढा अमरनाथ यात्री न्यास (न्यास) जहां एक ओर हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी बर्फ़ानी बाबा की इस यात्रा को दो माह से कम करने को टस से मस नहीं हो रहा था तो वहीं दूसरी ओर जम्मू कश्मीर के राज्यपाल श्री एन एन बोहरा की अध्यक्षता वाला श्री अमरनाथ श्राइन बोर्ड (बोर्ड) यात्रा की अवधि को किसी भी कीमत पर 45 दिन से अधिक न करने पर अडिग था। स्वयं राज्यपाल बोहरा व राज्य के मुख्यमंत्री इस बात को दोहरा चुके थे कि यात्रा किसी भी कीमत पर 29 जून से पहले प्रारम्भ नहीं की जा सकती है।

दोनों पक्षों में आखिर इस बात पर सहमति हुई कि इस वर्ष यात्रा के शुभ मुहूर्त – ज्येष्ठ शुक्ल पूर्णिमा के दिन न्यास व बोर्ड के दो-दो सदस्य हैलीकोप्टर से जाकर विधिवत पूजन अर्चन कर यात्रा को सांकेतिक रूप से प्रारम्भ कर देंगे तथा प्रशासन तुरन्त रास्ता साफ़ करने का कार्य प्रारम्भ करेगा। जैसे ही मार्ग जाने लायक होगा शेष यात्रियों को भी भोले बाबा के दर्शनार्थ जाने की अनुमति दे दी जाएगी। इसके अलावा यात्रा की अवधि तथा उसके धार्मिक पहलुओं पर निर्णय करने हेतु एक उप समिति बनाने पर भी आम सहमति बनी। इस उप समिति के सदस्य धार्मिक संगठनों, पर्यावरण व सुरक्षा से संबंधित क्षेत्रों से होंगे। इसका गठन 22 जुलाई 2011 को श्रीनगर में बोर्ड के सदस्यों की होने वाली बैठक में किया जाएगा।

यह कोई पहला अवसर नहीं था जब इस पवित्र यात्रा में व्यवधान डालने की कोशिश की गई हो। पहले भी अनेक बार अत्यंत दुर्गम रास्ते, खराब मौसम और आतंकवादियों की धमकियों व हमलों के साथ सरकारों के उदासीन रवैये के चलते यात्रा में व्यवधान पडता रहा है। जब राज्य में पी डी पी-कांग्रेस गठबन्धन की सरकार थी तब मुख्यमंत्री मुफ़्ती मोहम्मद सईद और तत्कालीन राज्यपाल एस के सिन्हा के बीच बात-चीत तक बंद हो गई थी क्यों कि सिन्हा यात्रा की अवधि दो माह रखना चाहते थे जो मुख्यमंत्री को मंजूर नहीं था। वर्ष 2008 का अमरनाथ जमीन का मामला तो इतना तूल पकडा कि राज्य की सरकार को भी अपने तय समय से सात महीने पहले ले डूबा। वर्ष 1996 में प्राक्रतिक आपदा के चलते लगभग 243 शिव भक्त घाटी से वापस नहीं आ सके। इसके बाद यात्रा के सुचारू रूप से चलाने हेतु जस्टिस सैन की अध्यक्षता में एक जांच आयोग का गठन किया गया। जिसने कहा कि रास्ते की हालत व अन्य परिस्थितियों को देखते हुए यात्रियों की प्रतिदिन संख्या को 7-8 हजार से अधिक करना उचित नहीं है। दर्शनार्थियों की संख्या अधिक होने पर यात्रा अवधि को बढाना ही उचित होगा।

 

गत अनेक वर्षों से इस यात्रा को ज्येष्ठ पूर्णिमा से प्रारंभ कर श्रावण पूर्णिमा (रक्षा बन्धन) के दिन को पूर्ण किया जाता रहा है। वर्ष 2008 की यात्रा में 5,33,368 भक्तों ने बाबा के दर्शन किए थे। श्रद्धालुओं की हर वर्ष बढ रही संख्या को ध्यान में रखते हुए यात्रा अवधि को कम से कम दो माह रखना ही तर्क संगत लगता है। अन्यथा विश्व भर से आने वाले कम से कम दो लाख यात्री प्रतिवर्ष भोले बाबा के दर्शनों से वंचित रह जाएंगे। जम्मू-कश्मीर के श्रीनगर शहर से 125 किमी दूर हिमालय की बर्फ़ीली चोटियों के बीच 13,500 फीट की ऊंचाई पर स्थित भगवान शिव का अदभुत शिवर्लिंग करोडों हिन्दुओं की आस्था का केन्द्र ही नहीं बल्कि पूरे भारत वर्ष को एक सूत्र में पिरो कर रखने का एक प्रमुख आधार स्तंभ भी है। इस यात्रा से जहां बाबा के भक्त अपनी मन मांगी मुराद पूरी कर ले जाते हैं वहीं कश्मीर क्षेत्र में रहने वाली जनता (अधिकांश मुसलमान) इससे वर्ष भर की अपनी रोजी रोटी का जुगाड़ भी कर लेती है। राज्य की अर्थव्यवस्था को बैठे बिठाये लाखों पर्यटक मिल जाते हैं जिससे करोडों की आय राज्य कोष में जमा होती है। ऐसी स्थिति में यात्रा को बढावा देने में ही सबकी भलाई है।

15 जून को तय कार्यक्रम के अनुसार न्यास के अध्यक्ष श्री सुरेन्द्र अग्रवाल व महामंत्री के साथ बोर्ड के मुख्य कार्यकारी अधिकारी श्री आर के गोयल द्वारा बाबा अमरनाथ का पूजन कर यात्रा का प्रारम्भ तो हो ही गया देखना अब यह है कि आगे आने वाले समय में कोई अन्य रोडा न अटकाया जाए।। खैर ! अभी तो यही कहा जाएगा कि लौट के बुद्धू घर को आए। आखिर फ़िलहाल तो टल ही गया इस बार की अमरनाथ यात्रा का टकराव।

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