धर्म-अध्यात्म

बरसाने की लट्ठमार होली: नारी-शक्ति का उत्सवी स्वर

डा. शिवानी कटारा

फाल्गुन का महीना आते ही ब्रज की हवाओं में एक अलग ही कंपकंपी दौड़ जाती है। यह केवल ऋतु-परिवर्तन नहीं, भाव-परिवर्तन का समय होता है। मथुरा जनपद में स्थित बरसाना की लट्ठमार होली इसी भाव-परिवर्तन का सबसे सशक्त और दृश्यात्मक रूप है—जहाँ रंगों के बीच नारी-शक्ति का स्वर स्पष्ट, आत्मविश्वासी और उत्सवधर्मी होकर उभरता है।

लोककथा से लोक-उत्सव तक

लट्ठमार होली की परंपरा राधा-कृष्ण की ब्रज-लोककथाओं से प्रेरित मानी जाती है। कहा जाता है कि एक अवसर पर कृष्ण अपने सखा-ग्वालों के साथ राधा रानी से मिलने बरसाना आए। स्वभाववश कान्हा ने प्रेमपूर्ण परिहास और मधुर विनोद का वातावरण रचा, और राधा जी व उनकी सखियों से स्नेहिल चुटकी ली। इस चंचल और सौहार्दपूर्ण प्रसंग में सखियों ने भी संकोच नहीं किया; उन्होंने लाठियाँ उठा लीं और कृष्ण व उनके साथियों को हर्षोल्लास के साथ प्रतीकात्मक उत्तर दिया।

आज भी उसी स्मृति को जीवित रखते हुए नंदगाँव से पुरुष ढाल लेकर बरसाना पहुँचते हैं और महिलाएँ सांकेतिक रूप से लाठी चलाती हैं। यह परंपरा आक्रोश की नहीं, सांस्कृतिक अभिनय की है—जहाँ इतिहास लोक में जीवित रहता है।

समय के साथ यह रसपूर्ण प्रसंग एक सुसंगठित सांस्कृतिक उत्सव में बदल गया, जिसे बरसाना और नंदगाँव में बड़े उत्साह और भक्ति-भाव से मनाया जाता है।

यह कथा केवल विनोद की नहीं, बल्कि संवाद की कथा है—जहाँ स्त्री अपनी असहमति को मुस्कान और साहस के साथ व्यक्त करती है।

स्त्री का केंद्रत्व: उत्सव की आत्मा

बरसाना की लट्ठमार होली में स्त्रियाँ दृश्य का केंद्र हैं। वे केवल सहभागी नहीं, आयोजन की धुरी हैं। पारंपरिक परिधान में सजी महिलाएँ जब सामूहिक रूप से लाठी थामे आगे बढ़ती हैं, तो वह दृश्य आत्मविश्वास और सौम्यता का अनोखा संतुलन रचता है।

पुरुषों की ढाल यहाँ स्वीकार का प्रतीक बनती है—यह मान्यता कि इस खेल की दिशा स्त्रियाँ तय करेंगी। लाठी की ताल और ढाल की थाप मिलकर एक ऐसी लय बनाती है, जो शक्ति और मर्यादा दोनों को साथ लेकर चलती है।

भक्ति और शक्ति का संगम

उत्सव का आध्यात्मिक आरंभ श्रीजी मंदिर—राधा रानी मंदिर—में फाग-आरती से होता है। राधा यहाँ प्रेम की प्रतीक भर नहीं, ब्रज की अधिष्ठात्री शक्ति हैं। ब्रज के लोकगीत इस भाव को स्वर देते हैं:

आज बिरज में होली रे रसिया
होली रे रसिया, बरजोरी रे रसिया

बरजोरी – शब्द में निहित चंचलता स्त्री के आत्मविश्वास का सांस्कृतिक रूपक है। यह बताता है कि शक्ति सिर्फ कठोरता में ही नहीं, मुस्कान में भी प्रकट हो सकती है।

जब वातावरण में यह रसिया गूँजता है:
राधा करे तैयारी संग बुलालई सखियां सारी,
उधर कन्हैया ग्वाल बाल संग भर मारे पिचकारी

तो यह स्पष्ट हो जाता है कि लीला की पूर्णता राधा की सहभागिता से ही संभव है।

बरसाना की लट्ठमार होली अंततः यह संदेश देती है कि यहाँ स्त्री उत्सव की परिधि नहीं, उसकी केंद्र-रेखा है। लाठी उसके आत्मविश्वास का प्रतीक है और उसकी सामूहिक उपस्थिति इस परंपरा की असली शक्ति है—जहाँ नारी गरिमा, नेतृत्व और उल्लास एक साथ रंग बनकर खिल उठते हैं।