-सुनील कुमार महला
हमारे देश में सीवर और सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान होने वाली मौतें एक अत्यंत गंभीर, संवेदनशील और शर्मनाक सच्चाई हैं। वास्तव में, यह समस्या केवल और केवल तकनीकी नहीं, बल्कि यह सामाजिक, प्रशासनिक और मानवाधिकारों से गहराई से जुड़ी हुई है।इस क्रम में, सबसे दुखद व अहम् तथ्य यह है कि ‘हाथ से मैला ढोने वालों के नियोजन का प्रतिषेध और उनका पुनर्वास अधिनियम, 2013’ हमारे देश में लागू होने के बावजूद भी यह प्रथा वर्तमान में पूरी तरह से समाप्त नहीं हो सकी है।
बहरहाल,यदि हम यहां पर आंकड़ों की बात करें तो उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2018 से 2023 के बीच देश में 400 से अधिक मजदूरों की मौत सीवर या सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान हुई। वहीं पिछले पाँच वर्षों (वर्ष 2018 से वर्ष 2023 तक) में लगभग 339 मौतें दर्ज की गईं। वर्षवार सरकारी आंकड़ों के अनुसार साल 2018 में 67, 2019 में 117, 2020 में 22, 2021 में 58, 2022 में 66 तथा 2023 में (आंशिक डेटा) 9 मौतें हुईं। वहीं, राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग के अनुसार वर्ष 1993 से 2025 तक कुल लगभग 1313 मौतें दर्ज की गई हैं। इसके अतिरिक्त, साल 2019 से 2023 के बीच लगभग 377 मौतें, 2016–2020 के बीच लगभग 340 मौतें तथा 1993–2010 के बीच करीब 920 मौतें हुईं। वर्ष 2017 के बाद कुछ समय तक औसतन हर 5 दिन में एक मौत सीवरेज सफाई के दौरान दर्ज की गई।
यदि हम यहां पर राज्यवार स्थिति को देखें तो उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु, हरियाणा, दिल्ली और महाराष्ट्र में अपेक्षाकृत अधिक मौतें सामने आई हैं। संसद में प्रश्नकाल के दौरान प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार 2021 से 2025 के बीच कुल 315 सफाईकर्मियों की मौत हुई, जिनमें महाराष्ट्र में 53, हरियाणा में 43, तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश में 35-35, दिल्ली में 26 तथा गुजरात में 24 मौतें दर्ज की गईं।
हालिया आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2017 से 2026 के बीच लगभग 622 से अधिक सफाईकर्मियों की मौत हो चुकी है, जिनमें से 471 मौतें केवल 2019 के बाद दर्ज की गईं। महाराष्ट्र, तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में इन घटनाओं की संख्या सबसे अधिक है।
यहां यह ध्यान देने योग्य है कि ये केवल आधिकारिक आंकड़े हैं; वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक हो सकती है, क्योंकि अनेक घटनाएं तो दर्ज ही नहीं हो पातीं हैं।
जैसा कि ऊपर भी इस आलेख में चर्चा कर चुका हूं कि भारत में मैनुअल स्कैवेंजिंग-2013 के कानून के तहत पूर्णतः प्रतिबंधित है, फिर भी ठेकेदारी प्रथा, विभिन्न सुरक्षा उपकरणों की कमी और प्रशासनिक लापरवाही के कारण ये मौतें आज भी जारी हैं। कहना ग़लत नहीं होगा कि अधिकांश घटनाएं शहरी क्षेत्रों में और विशेष रूप से ठेकेदारी व्यवस्था के अंतर्गत होती हैं। कितनी बड़ी बात है कि आज हम आधुनिक तकनीक व एआइ के जमाने में जी रहे हैं, लेकिन बावजूद इसके आज भी कई स्थानों पर सीवर की सफाई मैन्युअल रूप से कराई जाती है। यह एक कटु सत्य है कि आज भी मास्क, ऑक्सीजन सिलेंडर, गैस डिटेक्टर जैसे आवश्यक सुरक्षा उपकरणों का गंभीर अभाव बना हुआ है।
वास्तव में, सीवरेज साफ-सफाई की यह समस्या गहरे सामाजिक आयाम भी रखती है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार लगभग 92% सफाईकर्मी अनुसूचित जाति और अत्यंत पिछड़े वर्गों से आते हैं, जिन्हें निजी ठेकेदार कम मजदूरी पर अत्यंत खतरनाक परिस्थितियों में काम करने के लिए मजबूर करते हैं। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि सीवर में होने वाली मौतें मात्र दुर्घटनाएँ नहीं, बल्कि व्यवस्था की विफलता हैं।
पाठक यह बात अच्छी तरह से जानते हैं कि सीवर के भीतर मौजूद जहरीली गैसें अत्यंत घातक होती हैं और जैसे ही कोई सफाईकर्मी उसमें उतरता है, गैस तेजी से उसके शरीर में प्रवेश कर जाती है और उसे बचाव का अवसर तक नहीं मिल पाता। इस क्रम में हमारे देश की न्यायपालिका ने समय-समय पर यह साफ निर्देश दिया है कि सीवर सफाई के दौरान वरिष्ठ अधिकारी की उपस्थिति सुनिश्चित हो तथा कार्यस्थल पर ऑक्सीजन, आधुनिक उपकरण और आपातकालीन सेवाएं उपलब्ध कराई जाएं।
हालांकि, ऐसा भी नहीं है कि सरकार इस संबंध में कुछ नहीं कर रही है। वास्तव में, सरकार ने इस समस्या के समाधान के लिए समय-समय पर कई पहलें की हैं। यहां पाठकों को बताता चलूं कि ‘नमस्ते’ (नेशनल एक्शन प्लान फॉर मैकेनाइज्ड सैनिटेशन इकोसिस्टम) योजना और स्वच्छ भारत मिशन 2.0 के तहत मशीनीकरण को बढ़ावा दिया जा रहा है। वास्तव में, इस योजना के अंतर्गत 84,000 से अधिक सीवर और सेप्टिक टैंक कर्मियों की पहचान की गई है। इतना ही नहीं, 3,000 से अधिक शहरी स्थानीय निकायों में 100% मशीनीकृत सफाई की रिपोर्ट दी गई है तथा 2,500 से अधिक गाद निकालने वाले वाहनों के लिए वित्तीय सहायता स्वीकृत की गई है।
इसके अतिरिक्त, सफाईकर्मियों को 35 घंटे का प्रशिक्षण कार्यक्रम प्रदान किया जा रहा है तथा पीपीई किट्स भी उपलब्ध कराई जा रही हैं। उन्हें ‘स्वच्छता उद्यमी’ बनाने के उद्देश्य से ₹5 लाख तक की सब्सिडी और कम ब्याज पर ऋण उपलब्ध कराया जा रहा है, ताकि वे आधुनिक सक्शन मशीनें और रोबोटिक उपकरण खरीद सकें। यहां पाठकों को बताता चलूं कि सक्शन मशीनें ऐसे यांत्रिक उपकरण होते हैं, जो वैक्यूम (खिंचाव) की सहायता से सीवर या सेप्टिक टैंक के अंदर जमा गंदगी, कीचड़ (स्लज) और अपशिष्ट पदार्थ को बाहर निकालती हैं। ये मशीनें आमतौर पर ट्रक या ट्रॉली पर लगी होती हैं। साथ ही, आयुष्मान भारत योजना के तहत ₹5 लाख का स्वास्थ्य बीमा भी प्रदान किया जा रहा है। केरल जैसे राज्यों में रोबोटिक मैनहोल सफाई मशीनों का उपयोग शुरू हो चुका है। केंद्र सरकार ने साल 2023-24 के बजट में देशभर में शत-प्रतिशत मशीनीकरण को बढ़ावा देने पर बल दिया है।
फिर भी, हाल की रिपोर्टें बताती हैं कि 90% से अधिक सीवर मौतों में सफाईकर्मियों के पास कोई सुरक्षा उपकरण नहीं था। छोटे शहरों और संकरी गलियों में मशीनों की कमी के कारण आज भी मानव हस्तक्षेप जारी है। प्रशासन कई बार ‘मैनुअल स्कैवेंजिंग’ और ‘खतरनाक सफाई’ की परिभाषाओं के आधार पर जिम्मेदारी से बचने का प्रयास करता है, जिससे पीड़ितों को न्याय और मुआवजा मिलने में देरी होती है।
यहां यह उल्लेखनीय है कि माननीय सुप्रीम कोर्ट ने अक्टूबर 2023 के अपने ऐतिहासिक निर्णय में सीवर सफाई के दौरान मृत्यु पर मिलने वाले मुआवजे को ₹10 लाख से बढ़ाकर ₹30 लाख कर दिया है, जबकि स्थायी विकलांगता की स्थिति में ₹20 लाख निर्धारित किया गया है। साथ ही यह स्पष्ट किया गया है कि यदि मशीनीकरण के अभाव में किसी कर्मचारी को सीवर या सेप्टिक टैंक में उतारा जाता है, तो इसके लिए संबंधित नगर निकाय के अधिकारी जिम्मेदार होंगे और उनके विरुद्ध आपराधिक मुकदमा चलाया जाएगा।
निष्कर्षतः, भारत में सीवर और सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान होने वाली मौतें यह स्पष्ट करती हैं कि कानूनी प्रतिबंधों और सरकारी प्रयासों के बावजूद जमीनी स्तर पर परिवर्तन अभी अधूरा है। ये घटनाएं केवल दुर्घटनाएँ नहीं, बल्कि प्रशासनिक लापरवाही, तकनीकी कमी, ठेकेदारी व्यवस्था की खामियां और सामाजिक असमानता का परिणाम हैं। जब तक पूर्ण मशीनीकरण, सख्त निगरानी, दोषियों पर कठोर कार्रवाई तथा सफाईकर्मियों के लिए सुरक्षित और सम्मानजनक कार्य-परिस्थितियाँ सुनिश्चित नहीं की जाएंगी, तब तक इस अमानवीय समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं है।
सुनील कुमार महला