आओ सजाऊँ तुम्हें नटखट नंदलाल

श्रृंगार करूँ तिहारा मेरे लड्डू गोपाल
आओ सजाऊँ तुम्हें नटखट नंदलाल।
केसर-चंदन तिलक, लाऊँ मोतियन माल
चित हर लेते तुम्हारे ये घुँघराले बाल।
श्रृंगार करूँ तिहारा मेरे लड्डू गोपाल
आओ सजाऊँ तुम्हें नटखट नंदलाल।

स्नान कराऊँ सूंदर वस्त्र पहनाऊँ
शीश पर तेरे मोर-पंख मैं सजाऊँ।
गले में पहनाऊँ तुझे वैजयंती हार
वारी जाऊँ कान्हा तुझ पर बारंबार।
छवि अनोखी तुम्हारी मेरे मोहन
साँवरी सूरत पर रीझ गया मेरा मन।
श्रृंगार करूँ तिहारा मेरे लड्डू गोपाल
आओ सजाऊँ तुम्हें नटखट नंदलाल।

कोमल पग में पहनाऊँ सुंदर नुपूर
लाली लगे होंठ तेरे हर रहे मेरा उर।
अधरों पर तेरे बंसी मधुर सजाऊँ
चंचल नैनों में तेरे काजल बसाऊँ।
सज रही साँवरी छवि अति न्यारी
मोहिनी सूरत पर मैं जाऊँ बलिहारी।
श्रृंगार करूँ तिहारा मेरे लड्डू गोपाल
आओ सजाऊँ तुम्हें नटखट नंदलाल।

बस जाओ इस चित में बाँके बिहारी
श्रृंगार करूँ ऐसा हे मोर मुकुटधारी !
काली टीकी लगाऊँ नजर लूँ उतार
बखान न हो रूप है तेरा अपरंपार।
हे रास-रचैया मेरे सांवरे कृष्णमुरारी !
छवि सजाऊँ अनोखी आज बनवारी।
श्रृंगार करूँ तिहारा मेरे लड्डू गोपाल
आओ सजाऊँ तुम्हें नटखट नंदलाल।
लक्ष्मी अग्रवाल

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