वीरेन्द्र सिंह परिहार
20 जनवरी को नव निर्वाचित भाजपाध्यक्ष नितिन नवीन के भाजपा मुख्यालय नई दिल्ली में पदभार ग्रहण करते समय जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने यह कहा कि- मैं एक कार्यकर्ता और नितिन नवीन मेरे बास। इसके साथ प्रधानमंत्री मोदी ने यह भी कहा कि आज से नितिन नवीन मेरा सी.आर. लिखेंगे- तो उसका विशेष मायने हैं। इसका मायने यह कि संगठन किसे कहते हैं ? इसका एक बड़ा मतलब यह कि संगठन सत्ता की तुलना में सर्वोपरि है क्योंकि प्रधानमंत्री जैसे शीर्ष पद पर बैठने वाला भी पार्टी का एक कार्यकर्ता होता है। प्रधानमंत्री मोदी जब यह कह रहे थे तो वह पार्टी के सभी प्रमुख नेताओं को यह संदेश भी दे रहे थे कि भाजपा में व्यक्तिवाद एवं परिवारवाद के लिये कोई जगह नहीं है और उन्हें पूरी तरह पार्टी-लाइन एवं विचारधारा के अनुरूप कार्य करना पड़ेगा। एक तरह से प्रधानमंत्री मोदी यह भी कह रहे थे कि यदि कोई अनुशासन तोड़ता है, या लक्ष्मण रेखा को लाघंता है तो पार्टी को बड़े से बड़े व्यक्ति के विरूद्ध भी बेझिझक कार्यवाही करने का अधिकार है लेकिन प्रधानमंत्री मोदी उक्त अवसर पर पार्टी की विशिष्ट विचारधारा और उसके आदर्शों पर भी जोर दे रहे थे।
इसका आशय स्पष्ट था कि पार्टी की विशिष्ट विचारधारा सांस्कृतिक राष्ट्रवाद है। पार्टी के आदर्श उसी महात्मा बुद्ध के कथन की तरह है जिसमें ‘‘धम्मं शरणं गच्छामि, संघ शरणं गच्छामि और बुद्धं शरणं गच्छामि’’ की बात कही गई है यानी सबसे पहले धर्म, फिर संघ और उसके बाद बुद्ध का स्थान है। उसी तरह से वर्तमान संदर्भों में सबसे पहले राष्ट्र, फिर संगठन यानी पार्टी और सबसे बाद में व्यक्ति का महत्व है। यह संगठन का ही महत्व है कि भाजपा में आज एक चाय बेचने वाला प्रधानमंत्री है। नितिन नवीन जैसे व्यक्ति जो देश के लिये एक अनजाना चेहरा थे पर अपनी क्षमताओं के चलते राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। यह भाजपा की विचारधारा और आदर्श ही है कि आज भाजपा देश में एक अजेय पार्टी बन चुकी है, और वह दिनों-दिन नये-नये प्रतिमान गढ़ती जा रही है। यहाँ तक कि विरोधी दलों को उसके विरूद्ध कोई मुद्दे नहीं मिल रहे हैं और वह झूठे नैरिटिव गढ़ कर मोदी और भाजपा पर आरोप लगाते हैं। वह मुद्दे न तो टिकते हैं और न मोदी और भाजपा पर चिपकते हैं क्योंकि भारतीय मतदाता यह समझ चुका है कि यदि देश आज विश्व में सबसे ज्यादा तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है तो निश्चित रूप से इसके पीछे भाजपा की राष्ट्र के प्रति प्रतिबद्धता और समर्पण ही सबसे बड़ा कारण है।
अब दिग्विजय जैसे राजनीतिक कांग्रेस पार्टी के संदर्भ में कहते हैं कि संगठन की कमजोरी के चलते वह चुनावों में पिट रही है और संगठन मजबूत होना चाहिए- तो वह आधा सच बोलते हैं क्योंकि यदि किसी पार्टी को अपना संगठन मजबूत करना है, संगठन को प्राथमिकता देनी है तो उसकी सबसे बड़ी शर्त यह है कि नेतृत्व कार्यकर्ताओं के बीच से उभरना चाहिए लेकिन दिग्विजय जैसे राजनीतिज्ञ एक तरफ तो एक खानदान-विशेष की विरुदावली गाते हैं तो दूसरी तरफ संगठन की मजबूती की बातें करते हैं। भला इस तरह से किसी भी पार्टी का संगठन कैसे मजबूत हो सकता है जो एक परिवार की प्रापर्टी जैसा है। कमोबेश देश में भाजपा को छोड़कर सभी राजनीतिक दलों की यही स्थिति है। जिन कम्युनिस्टों की स्थिति इस मामले में अलग थी, वह विजातीय विचारधारा के चलते अप्रसांगिक हो चले हैं।
1977 से 1980 के मध्य जनता पार्टी के अध्यक्ष रहे स्व0 चन्द्रशेखर ने लिखा है कि पार्टी की बैठकों में तबके प्रधानमंत्री मोरार जी देसाई ठीक समय पर पहुँच जाते थे, मैं देर से पहुँचता था पर मेरे आते ही प्रधानमंत्री मोरार जी देसाई उठकर खड़े हो जाते थे। मैं इस पर कहता था- आप इतने वरिष्ठ हैं, ऐसा नहीं होना चाहिए। तो वह कहते थे- मैं पार्टी अध्यक्ष का सम्मान करता हूँ। प्रधानमंत्री मोदी की बातों को भी उसी संदर्भ में लेना चाहिए। पर क्या कांग्रेस समेत दूसरी विपक्षी दल इससे कुछ सबक लेंगे ?
गौर करने की बात है कि एक तरफ कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे कहते हैं कि मुझे अध्यक्ष सोनिया जी एवं राहुल जी ने बनाया है। कर्नाटक में मुख्यमंत्री का फैसला हाई कमान करेगा। (यानी वह हाई कमान अध्यक्ष होते हुये भी नहीं है, उसके हिस्सा भी नहीं हैं।) तो दूसरी तरफ मोदी विश्व के सर्वाधिक लोकप्रिय राजनेता होकर भी अपने पार्टी अध्यक्ष को अपना सी.आर. लिखने का अधिकारी बता रहे हैं। इसीलिए कहा गया है- संगठन गढ़े चलो, सुपथ पर बढ़े चलो। यानी अच्छा रास्ता (अच्छे आदर्श) ही संगठन को मजबूत बना सकते हैं।
वीरेन्द्र सिंह परिहार