संध्या राजपुरोहित
21 वीं सदी केवल तकनीकी विकास की सदी नहीं है, बल्कि यह मनुष्यता के सबसे कठिन इम्तिहानों की भी सदी बन चुकी है। आज हमारे बच्चे मोबाइल, इंटरनेट और सूचना के जंजाल में जी रहे हैं, परंतु भीतर से वे अकेलेपन, असुरक्षा और भय से जूझ रहे हैं। शिक्षा के क्षेत्र में लगातार परिवर्तन हुए हैं, पर प्रश्न यह उठता है कि क्या यह शिक्षा बच्चों को जीवन जीने का साहस भी दे रही है? क्या वह उन्हें केवल नौकरी के लिए तैयार कर रही है या जीवन के लिए भी तैयार कर रही है?
आज शिक्षा का अर्थ केवल पाठ्यपुस्तकों तक सीमित नहीं रह सकता। बच्चे गणित, विज्ञान और भाषा तो सीख रहे हैं, लेकिन यदि वे अपने भीतर उठते भावनात्मक तूफ़ानों को समझ ही नहीं पा रहे, तो यह शिक्षा अधूरी है। शिक्षा के साथ जीवन कौशल का समावेश अब कोई वैकल्पिक प्रयोग नहीं, बल्कि एक अनिवार्य आवश्यकता बन चुका है।
भारत जैसे देश में, जहाँ आधी से अधिक आबादी 25 वर्ष से कम आयु की है, बच्चों और युवाओं का मानसिक स्वास्थ्य राष्ट्र के भविष्य से सीधे जुड़ा है। यदि आज की पीढ़ी भीतर से टूट रही है, तो कल का भारत कैसे खड़ा होगा?
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अपनी रिपोर्ट बताती है कि दुनिया में हर सात में से एक किशोर मानसिक स्वास्थ्य समस्या से ग्रस्त है। अवसाद किशोरों में मृत्यु के प्रमुख कारणों में शामिल हो चुका है। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा किए गए राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण 2015–16 के अनुसार, 13 से 17 वर्ष आयु वर्ग के लगभग 7.3 फीसद बच्चे किसी न किसी मानसिक विकार से पीड़ित हैं। इन बच्चों में अवसाद, चिंता, व्यवहार संबंधी समस्याएँ और आत्म-हीनता सामान्य होती जा रही हैं।
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की रिपोर्ट 2022 एक और भयावह तस्वीर सामने रखती है। इस रिपोर्ट के अनुसार भारत में प्रतिवर्ष 13,000 से अधिक छात्र आत्महत्या कर लेते हैं। यह आंकडा यह बताने के लिए पर्याप्त है कि हमारे बच्चों पर मानसिक बोझ कितना भारी हो चुका है। हर दिन औसतन 35 से अधिक परिवार अपने घर का उजाला खो देते हैं।
इन आँकड़ों के पीछे केवल पढ़ाई का दबाव नहीं, बल्कि एक पूरी व्यवस्था छिपी है जो बच्चों को दौड़ना तो सिखाती है, थमकर साँस लेना नहीं सिखाती। आज का बच्चा तुलना में जी रहा है। अंक, रैंक, सोशल मीडिया पर ‘परफेक्ट लाइफ’ की तस्वीरें— इन सबके बीच वह स्वयं को कमतर समझने लगता है। धीरे-धीरे यह भावना तनाव, अवसाद और कभी-कभी आत्मघात की ओर धकेल देती है।
ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में बच्चों की चुनौतियाँ अलग हैं, पर अधिक गहरी हैं। नीति आयोग की 2017 की रिपोर्ट बताती है कि अनुसूचित जनजाति समुदाय में विद्यालय छोड़ने की दर राष्ट्रीय औसत से अधिक है। इसका कारण केवल गरीबी या संसाधनों की कमी नहीं है, बल्कि वर्षों से जमी हुई यह सोच भी है कि “हम पीछे हैं” या “यह पढ़ाई हमारे लिए नहीं है।” यह आत्म-अस्वीकृति ही सबसे खतरनाक होती है, क्योंकि यह बच्चे की चेतना को भीतर से तोड़ देती है।
शिक्षा मंत्रालय की यूडाइस रिपोर्ट 2021–22 भी यही संकेत देती है कि ग्रामीण क्षेत्रों में ड्रॉपआउट दर शहरी क्षेत्रों की तुलना में अधिक है। जब बच्चा स्वयं को शिक्षा की मुख्यधारा से जुड़ा नहीं महसूस करता, तो वह शिक्षा को अपने जीवन का हिस्सा मानना भी छोड़ देता है।
ऐसे समय में जीवन कौशल शिक्षा एक प्रकाशस्तंभ की तरह सामने आती है। जीवन कौशल वे क्षमताएँ हैं, जो बच्चे को केवल पढ़ा-लिखा नहीं, बल्कि समझदार और संवेदनशील इंसान बनाती हैं। आत्म-जागरूकता, भावनात्मक संतुलन, संवाद की क्षमता, समस्या समाधान, निर्णय लेने की समझ, सहयोग और सहानुभूति—ये सभी जीवन कौशल बच्चों के भीतर वह ताकत पैदा करते हैं, जिससे वह जीवन की कठिन परिस्थितियों से टूटता नहीं, बल्कि लड़ता है।
यूनिसेफ और यूनेस्को की संयुक्त रिपोर्ट लाइफ स्कील एजुकेशन फार यूथ (2019) इस बात की पुष्टि करती है कि जिन विद्यालयों में जीवन कौशल आधारित शिक्षा दी जाती है, वहाँ बच्चों में तनाव, हिंसा और आत्मघाती प्रवृत्तियाँ कम होती हैं तथा आत्मविश्वास, संबंधों की गुणवत्ता और निर्णय क्षमता में सुधार होता है।
जीवन कौशल कोई अतिरिक्त विषय नहीं है। यह हर विषय की आत्मा है। गणित सोचने की स्पष्टता देता है, भाषा अभिव्यक्ति की शक्ति देती है, विज्ञान जिज्ञासा का द्वार खोलता है, और सामाजिक विज्ञान विवेक का विकास करता है। जब इन सभी विषयों में जीवन कौशल की चेतना जुड़ जाती है, तब शिक्षा केवल जानकारी नहीं देती, बल्कि चेतना जगाती है।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 इसी दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है। यह नीति पहली बार शिक्षा को केवल परीक्षा प्रणाली नहीं, बल्कि मानव निर्माण की प्रक्रिया के रूप में देखती है। इसमें कहा गया है कि शिक्षा का उद्देश्य केवल अकादमिक दक्षता नहीं, बल्कि नैतिकता, संवेदनशीलता और सामाजिक उत्तरदायित्व विकसित करना भी है। नीति में स्पष्ट प्रावधान है कि विद्यालयों में सामाजिक-भावनात्मक शिक्षा, समालोचनात्मक सोच, संवाद कौशल, कला, खेल और समुदाय आधारित शिक्षण को पाठ्यक्रम का अभिन्न अंग बनाया जाएगा। इसका उद्देश्य यह है कि बच्चा केवल उत्तर याद न करे, बल्कि जीवन को समझे।
शिक्षा मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार, 2023 तक देश के 28 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में जीवन कौशल आधारित कार्यक्रमों को लागू करने की प्रक्रिया प्रारंभ हो चुकी है। कई राज्यों में विद्यालयों में मानसिक स्वास्थ्य सत्र, परामर्श व्यवस्था और जीवन कौशल प्रशिक्षण शुरू किए गए हैं।
नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरो-साइंसेज की रिपोर्ट बताती है कि जिन बच्चों को भावनात्मक शिक्षा और जीवन कौशल प्रशिक्षण मिलता है, वे तनाव और अवसाद से जल्दी उबरते हैं। उनके भीतर आत्म-नियंत्रण और आत्म-सम्मान की भावना मजबूत होती है। अध्ययन बताते हैं कि जीवन कौशल आधारित कार्यक्रमों से बच्चों के तनाव स्तर में औसतन बीस प्रतिशत तक की कमी आई है।
जब किसी बच्चे को यह सिखाया जाता है कि वह जैसा है, वैसा ही मूल्यवान है, असफलता जीवन की विराम रेखा नहीं बल्कि सीख की भूमिका है, और तुलना करने के बजाय स्वयं से आगे बढ़ना ही वास्तविक सफलता है, तब उसके भीतर एक नई ऊर्जा का संचार होता है। शिक्षा मंत्रालय की 2023 की समीक्षा रिपोर्ट बताती है कि देश के 65 फीसद सरकारी विद्यालयों में अब मानसिक स्वास्थ्य और जीवन कौशल से जुड़े कार्यक्रम प्रारंभ हो चुके हैं।
जीवन कौशल बच्चों को सिखाते हैं कि असहमति भी संवाद से सुलझाई जा सकती है कि जीवन समस्याओं से भागने का नाम नहीं, उनका समाधान खोजने की यात्रा है। यही शिक्षा बच्चों को गलत कदम उठाने से रोकती है, क्योंकि उन्हें जीवन में आशा दिखाई देने लगती है। माता-पिता अंक नहीं, आत्मबल को प्राथमिकता देंगे। शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार नहीं, बल्कि जीवन देना है और जीवन कौशल उस जीवन की साँस हैं।
संध्या राजपुरोहित पिछले दो दशक से शिक्षा एवं विकास के क्षेत्र में कार्यरत है। वर्तमान में आदिवासी अंचल में शिक्षकों व आदिवासी बच्चों के साथ जीवन कौशल शिक्षा के कार्य से सम्बद्ध है।