बिकती वफ़ादारी, लहूलुहान वतन

किसने बेची थी, ये हवाओं की खुशबू,
किसने कांपती जड़ों में, जहर घोला था,
किसने गिरवी रखी थी, मिट्टी की सुगंध,
किसने अपने ही आंगन को, लहूलुहान बोला था।

तब तलवारें चुप रहीं,
घोड़ों ने रासें छोड़ दीं,
दरवाजों ने रोशनी से
नज़रें मोड़ लीं।

जब जयचंदों ने रिश्तों की ज़मीन बेच दी,
मीर जाफरों ने गंगा की लहरें गिरवी रख दीं,
तब मुठ्ठी भर परिंदों ने,
आसमान से परचम नोच लिए।

आज भी,
कहीं संसद में, कहीं गलियों में,
गद्दारी के फूल खिलते हैं,
तिरंगे की आड़ में,
कुछ लोग सौदागर बन जाते हैं।

मगर याद रखना,
खून से सने हाथ,
कभी साफ नहीं होते,
और मिट्टी की चीखें,
कभी खामोश नहीं होतीं।

क्योंकि ज़ख्म पर जमीं धूल,
कभी पन्ना बनकर चुप नहीं रहती,
वो लिख देती है,
हर गद्दार का नाम,
इतिहास के पत्थरों पर।

-डॉ सत्यवान सौरभ

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