रामस्वरूप रावतसरे
मद्रास हाई कोर्ट की मदुरै बेंच ने जस्टिस जी.आर. स्वामीनाथन के उस आदेश को सही ठहराया जिसमें थिरुपरनकुंद्रम हिल पर दीपाथून पर कार्तिगई दीपम जलाने की इजाजत दी गई थी। कोर्ट ने स्टालिन के नेतृत्व वाली डीएमके सरकार की कड़ी आलोचना की। साथ ही सरकार के कानून व्यवस्था की समस्या के दावों को खारिज करते हुए इसे बेबुनियाद और राजनीति से प्रेरित बताया।
मद्रास हाई कोर्ट की मदुरै बेंच ने जस्टिस जी.आर. स्वामीनाथन के फैसले को बरकरार रखा जिसमें मशहूर थिरुपरनकुंद्रम पहाड़ी पर बने पुराने पत्थर के खंभे पर दीया जलाने का आदेश दिया गया था। यह भगवान मुरुगन के छह घरों में से एक माना जाता है। यह आदेश 6 जनवरी को जस्टिस जी. जयचंद्रन और जस्टिस के.के. रामकृष्णन की खंडपीठ ने दी थी।
कोर्ट ने द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) सरकार के रवैये को लेकर नाराजगी जताई क्योंकि उसने साल में एक दिन होने वाले रस्म को करने की इजाज़त नहीं दी। कोर्ट ने कहा कि इससे अशांति फैलेगी। बेंच ने कानून व्यवस्था के मुद्दे को ‘फिजुल और यकीन करने के लायक नहीं’ बताया। मद्रास हाईकोर्ट ने सख्ती के साथ कहा कि ऐसा तभी हो सकता है जब ऐसी गड़बड़ी खुद राज्य द्वारा स्पॉन्सर की गई हो। हम प्रार्थना करते हैं कि कोई भी राज्य अपना पॉलिटिकल एजेंडा पूरा करने के लिए उस लेवल तक न गिरे। इससे सरकार को बड़ी शर्मिंदगी उठानी पड़ेगी।
जजों ने कहा कि अपील करने वालों जैसे- हज़रत सुल्तान सिकंदर बादुशा अवुलिया दरगाह और राज्य के अधिकारियों के पास सबूत नहीं हैं। इन लोगों के पास ऐसे सबूत नहीं हैं कि शैवों के ‘आगम शास्त्र’ में उस जगह पर दीया जलाने पर रोक है, जो सीधे गर्भगृह में भगवान की मूर्ति के ऊपर नहीं है। कोर्ट ने जोर देकर कहा, “निर्देश का मकसद सुरक्षा पक्का करना है। इसलिए जज द्वारा सुझाई गई दूरी की पाबंदी दीपम जलाने की जगह तय करने के लिए ज़रूरी शर्त नहीं है। दीपम जलाने की जगह तय करते समय सिर्फ धार की प्रॉपर्टी की सुरक्षा ही अहम है।”
बेंच के अनुसार दीपम जलाने के लिए सबसे अच्छी जगह पत्थर का खंभा है, जो एक अलग चट्टान की चोटी पर है और उस चोटी के नीचे है जहाँ धार है। जजों ने धार्मिक कामों का मकसद भी बताया कि कार्तिकेयदीपम और दूसरे त्योहारों के दौरान अच्छी जगहों पर दीपम जलाने का रिवाज है, ताकि पहाड़ी और आस-पास के इलाकों में रहने वाले भक्त देख सकें और पूजा कर सकें। फिर उन्होंने संत थिरुमूलर का ज़िक्र किया, जिन्होंने कहा था कि ‘रोशनी भगवान शिव का रूप है।’ कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि देवस्थानम के पास अपने भक्तों की इच्छाओं को नज़रअंदाज़ करने का कोई कारण नहीं है। उसकी ज़मीन की सीमाओं के अंदर ऊँची जगहों पर दीये जलाने की परंपरा है।
अदालत ने डीएमके सरकार से कहा कि कानून-व्यवस्था की आशंका ‘एक काल्पनिक डर’ है, जिसे राजनीतिक एजेंडे के लिए बनाया गया है। पीठ ने कहा, “यह मानना हास्यास्पद और मुश्किल है कि शक्तिशाली राज्य इस डर से दीपम जलाने की अनुमति नहीं दे रहा है कि इससे सार्वजनिक शांति भंग होगी”। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि पहाड़ी पर स्थित दीपस्तंभ की जगह श्री सुब्रमण्यम स्वामी मंदिर की संपत्ति है। बेंच ने आरोप लगाया, “देवस्थानम से कुछ लोगों को दीया जलाने के लिए खंभे तक आने देना और भक्तों को पहाड़ी के नीचे ही रोककर पूजा करना कोई मुश्किल काम नहीं है। यह दिखाना कि इस तरह के जमावड़े से शांति भंग होगी, भगदड़ मचेगी, समुदाय के बीच वैमनस्य बढ़ेगा, वगैरह, या तो यह दिखाता है कि वे कानून-व्यवस्था बनाए रखने में नाकाम हैं या समुदायों के बीच सद्भाव लाने में हिचकिचा रहे हैं।” कोर्ट ने कहा कि राज्य को, जिला प्रशासन के जरिए इस मुद्दे पर हिन्दू मुस्लिम समुदायों के बीच भाईचारा और शांति लाने की कोशिश करनी चाहिए था। कोर्ट ने कहा कि इतने सालों में शांति वार्ता ने सिर्फ शक बढ़ाने का काम किया है, क्योंकि यकीन की कमी है।
मद्रास हाई कोर्ट ने फैसला किया कि थिरुपरनकुंद्रम पहाड़ी पर पुराना पत्थर का खंभा कार्तिगई दीपम का दीया जलाने के लिए सही है। हालांकि, खंभे के सिकंदर बादुशा दरगाह के पास होने की वजह से इसका विरोध हुआ और दीया आमतौर पर उचिपिलैयार मंदिर के पास एक अलग जगह पर जलाया जाता था ।
डीएमके ने कानून व्यवस्था को मुद्दा बनाते हुए कोर्ट के आदेश के खिलाफ मद्रास हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। वहीं याचिकाकर्ता रामा रविकुमार ने ब्प्ैथ् की मदद से पहाड़ी पर चढ़ने की कोशिश की थी। लेकिन मदुरै डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर ने लोगों की सुरक्षा का हवाला देते हुए रोक लगा दी। इस स्थिति में मदुरै कमिश्नर जे लोगनाथन की अगुवाई में राज्य पुलिस ने श्रद्धालुओं को रोक दिया। हिंदू मुन्नानी के सदस्य समेत तमाम श्रद्धालुओं ने मंदिर के सामने जमा होकर कोर्ट द्वारा तय जगह पर दीया जलाने की इजाज़त देने की माँग की।
मंदिर के मैनेजमेंट ने पिछले फैसले को यह कहते हुए चुनौती भी दी थी कि इस कार्रवाई से सांप्रदायिक सद्भाव को खतरा हो सकता है। लेकिन, कोर्ट ने सख्त निर्देश दिया कि शाम 6 बजे तक दीया जलाना होगा, नहीं तो शाम 6.05 बजे कंटेम्प्ट की कार्रवाई शुरू होगी।
जस्टिस स्वामीनाथन ने कहा, “मैंने खास तौर पर पुलिस को यह पक्का करने का आदेश दिया था कि भक्तों का पिटीशन में बताई गई जगह पर कार्यक्रम मनाने और पूजा करने का अधिकार बना रहे, लेकिन इसका पालन नहीं किया गया।”
फिर भी, तमिलनाडु सरकार और मदुरै के अधिकारियों ने बाद में फैसले को चुनौती देने के लिए कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, जहां भक्तों ने जस्टिस जी जयचंद्रन और केके रामकृष्णन की डिवीजन बेंच को बताया कि तमिलनाडु के हिंदू रिलीजियस एंड चौरिटेबल एंडोमेंट्स डिपार्टमेंट कमिश्नर ने 17 दिसंबर को सनातन धर्म का ‘खुलेआम अपमान और बेइज्जती’ की है।
हिंदुओं का पक्ष रख रहे सीनियर एडवोकेट एस श्रीराम ने कहा कि हर बार जब शांति बैठक में हिन्दुओं को अपने अधिकार छोड़ने के लिए मजबूर किया गया है। उन्होंने थिरुपरनकुंद्रम पहाड़ी पर गैर-कानूनी कब्जे के साथ-साथ वहां जानवरों की बलि देने, उसका नाम बदलकर सिकंदर हिल करने और एक इस्लामी त्यौहार पर उसे हरे रंग से रंगने की कोशिश की भी चर्चा की। यह भी बताया गया कि राज्य कोई ऐसा डॉक्यूमेंट नहीं दे पाया, जिससे पता चले कि वह खंभा दीपाथॉन नहीं है।
जानकारी के अनुसार इस मामले को लेकर विपक्षी नेताओं ने पार्लियामेंट से वॉकआउट भी किया था। विदुथलाई चिरुथैगल काची के फाउंडर-प्रेसिडेंट थोल. थिरुमावलवन ने तो थिरुपरनकुंद्रम पहाड़ी पर दीया जलाने की कोशिश कर रहे हिंदू भक्तों को ‘आतंकवादी’ तक कह डाला। यहाँ तक कि जस्टिस स्वामीनाथन को पद से हटाने की माँग की थी।
मद्रास हाईकोर्ट ने हिंदू अधिकारों को दबाने की राज्य सरकार की कोशिश को एक बड़ा झटका दिया है और एक मिसाल कायम की है। भले ही राज्य की मशीनरी बेशर्मी से हिंदू अधिकारों को दबाने और उनके धार्मिक अधिकारों का उल्लंघन करने की कोशिश कर रही हो। फैसले में कहा गया कि कानून और व्यवस्था बनाए रखना राज्य की जिम्मेदारी है, न कि सांप्रदायिक सद्भाव के बहाने हिंदू भक्तों को उनके विश्वासों और प्रथाओं को मानने से रोकना। इसमें सांप्रदायिक सद्भाव की गलत व्याख्या की भी निंदा की गई है, जो सिर्फ हिंदुओं की धार्मिक आजादी पर हमला करके हासिल की जाती है। सबसे महत्वपूर्ण बात, कोर्ट ने राज्य सरकार के गलत इरादों को सामने लाया है, जिसका मकसद मुसलमानों को खुश करने के लिए हिंदू समुदाय के अधिकारों को रोकना था। जबकि राज्य सरकार को चाहिए कि दोनों समुदायो में सकारात्मक सोच को बढावा देकर आपसी सामजस्य से धार्मिक भावनाओं का पालन कराये।
रामस्वरूप रावतसरे