धर्म-अध्यात्म

मकर संक्रांति : भारतीय संस्कृति का शाश्वत महापर्व

भारतीय संस्कृति पर्वों और उत्सवों की संस्कृति है। यहां प्रत्येक पर्व केवल उत्सव नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन, प्रकृति से संवाद और आत्मचिंतन का माध्यम है। इन्हीं पर्वों में मकर संक्रांति का विशेष स्थान है। यह पर्व सूर्य, प्रकृति और मानव जीवन के गहरे संबंधों को दर्शाता है। मकर संक्रांति केवल एक तिथि या धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि ऋतु परिवर्तन, सकारात्मक ऊर्जा और नवजीवन का संदेश है।
मकर संक्रांति का खगोलीय महत्व अत्यंत विशिष्ट है। इस दिन सूर्य देव धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करते हैं, जिसे ‘उत्तरायण’ कहा जाता है। उत्तरायण का अर्थ है – प्रकाश की ओर बढ़ना, अंधकार से बाहर आना। शास्त्रों में उत्तरायण को देवताओं का दिन माना गया है। महाभारत में भीष्म पितामह द्वारा उत्तरायण की प्रतीक्षा इसी पर्व के आध्यात्मिक महत्व को दर्शाती है।
यह पर्व हमें यह सिखाता है कि जीवन में चाहे कितनी ही कठिनाइयाँ क्यों न हों, अंधकार के बाद प्रकाश अवश्य आता है। सूर्य का उत्तर की ओर बढ़ना प्रतीक है कि मानव जीवन भी नकारात्मकता, आलस्य और निराशा से निकलकर कर्म, तप और सकारात्मक सोच की ओर अग्रसर हो।
मकर संक्रांति का सामाजिक और सांस्कृतिक स्वरूप भी अत्यंत व्यापक है। भारत के विभिन्न प्रांतों में यह पर्व अलग-अलग नामों और परंपराओं से मनाया जाता है। उत्तर भारत में इसे मकर संक्रांति, पंजाब में लोहड़ी, तमिलनाडु में पोंगल, असम में भोगाली बिहू, महाराष्ट्र में तिलगुल, कर्नाटक में संक्रांति और गुजरात में उत्तरायण के रूप में मनाया जाता है। नाम भले ही अलग हों, पर भावना एक ही है – प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और जीवन के प्रति उत्साह।
इस दिन तिल और गुड़ का विशेष महत्व है। तिल शारीरिक बल और गुड़ मधुरता का प्रतीक है। “तिलगुल घ्या, गोड गोड बोला” केवल एक कहावत नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता का संदेश है। यह पर्व हमें कटुता छोड़कर मधुर संबंध अपनाने की प्रेरणा देता है। दान-पुण्य, स्नान, जप-तप और सूर्योपासना भारतीय संस्कृति के मूल तत्व हैं, जो मकर संक्रांति पर विशेष रूप से दिखाई देते हैं।
कृषि प्रधान भारत में मकर संक्रांति किसानों के लिए आशा और सम्मान का पर्व है। नई फसल के आगमन पर किसान प्रकृति और सूर्य का आभार व्यक्त करते हैं। यह पर्व श्रम की गरिमा और अन्नदाता के महत्व को रेखांकित करता है। पतंग उड़ाने की परंपरा भी इसी उल्लास और स्वतंत्रता का प्रतीक है, जो आकाश में ऊँचाइयों को छूने की आकांक्षा को दर्शाती है।
आज के भौतिकवादी युग में मकर संक्रांति का संदेश और भी प्रासंगिक हो जाता है। यह पर्व हमें प्रकृति से जुड़ने, संतुलित जीवन अपनाने और आध्यात्मिक चेतना को जागृत करने का अवसर देता है। यह केवल परंपरा नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला है।
अतः मकर संक्रांति भारतीय संस्कृति का वह महापर्व है, जो धर्म, विज्ञान, समाज और प्रकृति—चारों को एक सूत्र में बाँधता है। यह पर्व हमें सिखाता है कि जब सूर्य दिशा बदल सकता है, तो मानव जीवन भी नई दिशा ले सकता है। यही मकर संक्रांति की सबसे बड़ी सीख और सबसे बड़ा उत्सव है।

  • सुरेश गोयल धूप वाला