प्रमोद दीक्षित मलय
प्राथमिक शिक्षा के दौरान एक कविता पढ़ने को मिली थी जिसका प्रेरक भाव मन-मस्तिष्क में आज भी अंकित है। न केवल वह कविता आज तक कंठस्थ है बल्कि वह महनीय रचनाकार का व्यक्तित्व और जीवन भी आंखों के सम्मुख चलचित्र की भांति वर्तमान है। वह कविता थी – ‘चाह नहीं मैं सुरबाला के गहनों में गूंथा जाऊं, चाह नहीं प्रेमी माला में बिंध प्यारी को ललचाऊं…. मुझे तोड़ लेना वनमाली, देना उस पथ पर तुम फेंक, मातृभूमि पर शीश चढ़ाने, जिस पर जावें वीर अनेक। और रचनाकार हैं राष्ट्रवादी पत्रकारिता के शिखर पुरुष ओजस्वी वक्ता स्वतंत्रता संग्राम सेनानी माखनलाल चतुर्वेदी। 30 जनवरी को देश पुण्यतिथि के अवसर पर उस महान संपादक और देश में पत्रकारिता के विद्यापीठ के स्वप्नकार के प्रति श्रद्धा सुमन समर्पित कर स्वयं गौरवांवित है।
माखनलाल चतुर्वेदी भारतीय पत्रकारिता आकाश के उज्ज्वल नक्षत्र हैं। उनका विराट व्यक्तित्व विभिन्न छवियों के साथ लोक सम्मुख प्रकट होता है। एक ओर वह शिक्षण परम्परा को गति देते दिखाई पड़ते हैं तो वहीं दूसरी ओर उनका साहित्यकार रूप हमें सम्मोहित करता है। वह जितनी भाव प्रवणता, करुणा, प्रेम एवं संवेदनशीलता के साथ काव्य कला के क्षेत्र में विचरण करते हैं, वहीं साहित्यिकता, संवेग, वैदुष्य, आंचलिकता, सरसता एवं आत्मीयता की भावना सहेजे गद्य के फलक पर भी ओज-तेज अग्नि धर्मा लेखन के साथ विद्यमान हैं। वह स्वतंत्रता सेनानी के रूप में ब्रिटिश सत्ता के अन्याय, अत्याचार एवं दमन नीति के विरुद्ध शंखनाद कर जूझते हैं, वहीं संपादक के रूप में आग उगलते संपादकीय एवं लेखों के माध्यम से सम्पूर्ण समाज के मानस को उद्वेलित, प्रेरित एवं जाग्रत करते हैं। एक ओर वह लाल, बाल, पाल नाम से विख्यात त्रिरत्न लाला लाजपत राय, बालगंगाधर तिलक एवं बिपिन चंद्र पाल की विचार सरिता में अवगाहन कर अंग्रेजों के विरुद्ध सतत संघर्ष की हुंकार भरते हैं तो वहीं वह स्वयं में गांधी के सत्य, प्रेम एवं अहिंसा की प्रवहमान धारा का अनुभव करते हैं। यही कारण है कि उनकी रचनाओं में एक ओर जहां ओज-तेज की प्रखरता है, शत्रु विनाश का लक्षित संधान है तो वहीं दूसरी ओर पृष्ठ-दर-पृष्ठ सत्य, शांति, सदाचार, करुणा एवं मानवता के रुचिर मार्मिक चित्र भी दृष्टव्य हैं।
समग्रता में देखें तो माखनलाल चतुर्वेदी का साहित्य प्रकृति के प्रति आत्मीयता एवं सम्पूर्ण मानव जाति के प्रति प्रेम का आख्यान है। वहां ब्रिटिश दासता से मुक्ति का आह्वान है तो सुप्त जन मानस के लिए प्रेरणा भरी ललकार भी। वह अपनी लेखनी से प्रभाती गाते हैं और उगते सूर्य की आराधना भी। वह ओजस्वी वक्ता के रूप में श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर देने की कला में पारंगत हैं तभी तो गांधी उनकी वक्तृत्व कला की सराहना करते हुए कहते हैं कि हम लोग तो केवल बातचीत करते हैं, भाषण तो माखनलाल चतुर्वेदी जी करते हैं। गांधी जी हृदय से उनको मानते थे तभी तो वे उनके जन्म स्थान बाबई, होशंगाबाद पधार कर उस माटी को प्रणाम किया था जिसने देश में राष्ट्रीयता की भावना का ज्वार उठाने वाला लाल उत्पन्न किया था।
माखनलाल चतुर्वेदी का जन्म 4 अप्रैल, 1889 को वर्तमान मध्यप्रदेश के होशंगाबाद जिले के बाबई ग्राम में शिक्षक पिता नंदलाल चतुर्वेदी के घर हुआ था। पिता के मार्गदर्शन में घर पर ही हिंदी, संस्कृत, बांग्ला, गुजराती और अंग्रेजी भाषा का अभ्यास कर समान अधिकार प्राप्त कर केवल 16 वर्ष की अवस्था में 8 रुपए मासिक वेतन पर शिक्षक के रूप में काम करना प्रारंभ किया था। उसके एक वर्ष पूर्व 1904 में आपका विवाह हो चुका था। शिक्षक के रूप में आप बच्चों के प्रिय शिक्षक रहे। शिक्षण के साथ लेखनी भी गतिशील रही। 1908 में ‘हिंद केसरी’ अखबार द्वारा ‘राष्ट्रीय आंदोलन एवं बहिष्कार’ विषय पर आयोजित निबंध प्रतियोगिता में प्रथम स्थान प्राप्त कर अपनी छाप छोड़ी। 1913 में खंडवा से ‘प्रभा’ मासिक पत्रिका का प्रकाशन आरंभ हुआ तो शिक्षक की नौकरी छोड़ संपादक के रूप में कार्य प्रारंभ किया। प्रभा पत्रिका गणेश शंकर विद्यार्थी के प्रताप प्रेस में छपने के कारण आपका परिचय विद्यार्थी जी से हुआ और जब 1916 में कांग्रेस का अधिवेशन लखनऊ में हुआ तो विद्यार्थी जी के साथ आपकी भेंट महात्मा गांधी और कवि मैथिलीशरण गुप्त से हुई। आप गांधी विचार से प्रभावित हो उनके आंदोलनों में सहभागिता करने लगे। असहयोग एवं सविनय अवज्ञा आंदोलन में आपको कारावास हुआ। इसी बीच ‘कर्मवीर’ समाचार पत्र का संपादन दायित्व भी संभाला। गणेश शंकर विद्यार्थी के प्रख्यात पत्र ‘प्रताप’ का संपादन दायित्व भी तब हाथ में लिया था, जब विद्यार्थी जी को जेल में बंद कर दिया गया था। अपने लेखों में अंग्रेजी नीति के विरोध एवं जनता को आंदोलन करने हेतु प्रेरित करने वाली सामग्री छापने के कारण आपके कार्यालय अर्थात् घर पर अर्धशताधिक बार छापा डाला गया। पर निर्भय स्वभाव वाले माखनलाल न डरे, न झुके बल्कि हर बार नयी ऊर्जा एवं ऊष्मा के साथ प्रकट हुए।
माखनलाल चतुर्वेदी के साहित्यिक अवदान के लिए 1943 में देव पुरस्कार, 1955 में साहित्य अकादमी पुरस्कार, 1959 में सागर विश्वविद्यालय द्वारा डी.लिट. की मानद उपाधि, 1963 में पद्मभूषण आदि सम्मान प्रदान किये गये। 1967 में संसद द्वारा राजभाषा हिंदी संशोधन बिल के विरोध में आपने पद्मभूषण अलंकरण राष्ट्रपति महोदय को वापस कर दिया था, जो आपकी हिंदी के प्रति अविचल निष्ठा एवं सेवा का जीवंत प्रमाण है। हिम किरीटिनी, हिम तरंगिणी, युग चारण, समर्पण, समय के पांव, साहित्य के देवता आदि प्रमुख कृतियां हैं। मां भारती का यह साहित्य साधक पुत्र 30 जनवरी, 1968 को भोपाल में इस माटी को अंतिम प्रणाम कर परलोक गमन कर गया। सरकार ने 1977 में उनकी स्मृति में 25 पैसे का एक डाक टिकट जारी कर श्रद्धांजलि अर्पित की। भोपाल में माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय की स्थापना कर उनका स्वप्न साकार किया। माखनलाल चतुर्वेदी हमारे मन-मस्तिष्क में सदैव बसे रहेंगे।
प्रमोद दीक्षित मलय