लेख विधि-कानून

न्याय का अर्थ-समानता और निष्पक्षता

लेखक-पवन शुक्ला अधिवक्ता

​न्याय कोई शब्द नहीं, बल्कि वह अदृश्य धागा है जिसने सभ्यता के बिखरे हुए मोतियों को एक माला में पिरो रखा है। जब हम न्याय की बात करते हैं, तो अक्सर हमारा ध्यान न्यायालयों, काली पोशाकों और भारी-भरकम संहिताओं की ओर जाता है। किंतु न्याय का वास्तविक स्वरूप इन भौतिक सीमाओं से परे है। न्याय का शुद्धतम अर्थ है—समानता की नींव पर खड़ी निष्पक्षता की भव्य इमारत

​न्याय एक आत्मिक चेतना

​न्याय केवल एक विधिक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह एक नैतिक स्पंदन है। समाज में जब तक ‘स्व’ और ‘पर’ (अपना और पराया) का भेद बना रहता है, तब तक न्याय की पुकार अधूरी रहती है। न्याय तब घटित होता है जब एक व्यक्ति दूसरे के अधिकारों को उतनी ही शिद्दत से महसूस करता है जितनी शिद्दत से वह अपनी भूख या प्यास को महसूस करता है। इसे हम ‘हृदय की समरसता’ कह सकते हैं।

​समानता न्याय का प्रथम स्तंभ

​समानता का अर्थ यह कतई नहीं है कि सबको एक ही तराजू में तौल दिया जाए। वास्तविक समानता वह है जहाँ अवसर की उपलब्धता में कोई अवरोध न हो।
​अवसर की शुचिता: जिस दिन एक महल में रहने वाले बालक और एक झोपड़ी में पलने वाले संघर्षी को अपनी प्रतिभा सिद्ध करने का धरातल एक समान मिलेगा, उस दिन समानता का बीज अंकुरित होगा।

​अधिकारों का लोकतंत्रीकरण

समानता का अर्थ है कि नियम किसी के प्रभाव को देखकर अपना रंग न बदलें। यदि प्रकाश सबके लिए एक समान है, तो न्याय का उजाला भी सबके लिए निर्बाध होना चाहिए।

​निष्पक्षता-न्याय की आत्मा

​यदि समानता शरीर है, तो निष्पक्षता उसकी आत्मा है। निष्पक्षता का अर्थ है—पूर्वाग्रहों का विसर्जन। एक न्यायपूर्ण मस्तिष्क वह है जो अपनी मान्यताओं, अपने धर्म, अपनी जाति और अपने स्वार्थ के चश्मे को उतारकर सत्य का नग्न स्वरूप देख सके।
​निष्पक्षता एक कठिन साधना है। मनुष्य स्वभाव से आसक्तियों से घिरा होता है। निष्पक्ष होने का अर्थ है अपने भीतर के उस न्यायाधीश को जगाना जो स्वयं के विरुद्ध भी निर्णय देने का साहस रखता हो। जब कोई व्यक्ति किसी विवाद में अपना पक्ष भूलकर केवल ‘तथ्य’ और ‘सत्य’ का पक्ष लेता है, तब वह निष्पक्षता के शिखर पर होता है।

​न्याय प्रकृति संतुलन का विज्ञान

​सृष्टि का संतुलन न्याय पर ही टिका है। जिस प्रकार गुरुत्वाकर्षण ग्रहों को अपनी कक्षा में रखता है, उसी प्रकार न्याय समाज के विभिन्न अंगों को अपनी मर्यादा में रखता है। यदि न्याय का संतुलन बिगड़ा, तो समाज में अराजकता का वह विस्फोट होगा जिसे संभालना किसी भी सत्ता के वश में नहीं होगा।

​”न्याय वह औषधि है जो समाज के घावों को भरती है, लेकिन यदि यह औषधि पक्षपात के जहर से मिल जाए, तो यह स्वयं ही एक महामारी बन जाती है।”

​आधुनिक परिप्रेक्ष्य में न्याय की चुनौती

​आज के दौर में न्याय अक्सर शक्ति का अनुगामी बन जाता है। शक्तिशाली के लिए न्याय एक सुरक्षा कवच है, जबकि निर्बल के लिए यह एक दुर्गम पहाड़। यहाँ हमें ‘समानता’ और ‘निष्पक्षता’ के नए अर्थ तलाशने होंगे।

​सामाजिक न्याय

यह केवल रोटी का प्रश्न नहीं है, बल्कि सम्मान का प्रश्न है। जब तक समाज के अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति को यह महसूस नहीं होता कि उसकी आवाज सुनी जा रही है, तब तक समानता एक किताबी शब्द ही रहेगी।

​मानसिक न्याय

हम अक्सर दूसरों के प्रति बहुत जल्दी निर्णय सुना देते हैं। बिना किसी के संघर्ष को जाने, उसके चरित्र पर टिप्पणी करना भी एक प्रकार का अन्याय है। निष्पक्षता की शुरुआत हमारे विचारों से होनी चाहिए।

​एक नवीन दृष्टि: न्याय ‘संवेदना’

​अक्सर लोग न्याय को ‘दंड’ या ‘पुरस्कार’ के रूप में देखते हैं। लेकिन मेरा मानना है कि न्याय ‘संवेदना’ का उच्चतम रूप है। जब आप किसी के दुख को देखकर विचलित होते हैं और उस दुख के निवारण के लिए बिना किसी स्वार्थ के खड़े होते हैं, तो आप न्याय कर रहे होते हैं।

​न्याय का अर्थ केवल अपराधी को सजा देना नहीं, बल्कि पीड़ित को यह विश्वास दिलाना है कि वह अकेला नहीं है। समानता तब सार्थक होती है जब हम यह स्वीकार करते हैं कि हम सब अलग होते हुए भी एक ही चेतना के अंश हैं।

​न्याय का भविष्य निष्पक्ष समाज की रचना

​एक आदर्श समाज वह नहीं है जहाँ जेलें खाली हों, बल्कि वह है जहाँ जेलों की आवश्यकता ही न पड़े। यह तब संभव है जब समानता और निष्पक्षता हमारे संस्कारों का हिस्सा बन जाएं।

​शिक्षा में न्याय: बालकों को यह सिखाना कि श्रेष्ठता का आधार कर्म है, न कि जन्म।

​व्यवहार में निष्पक्षता: अपने छोटे-छोटे निर्णयों में यह देखना कि क्या हम किसी के साथ केवल इसलिए भेदभाव तो नहीं कर रहे क्योंकि वह हमसे भिन्न है

​न्याय की अमर ज्योति

​अंततः, न्याय कोई गंतव्य नहीं बल्कि एक निरंतर चलने वाली यात्रा है। यह वह ध्रुवतारा है जिसे देखकर भटकती हुई मानवता अपनी दिशा तय करती है। समानता वह भूमि है जहाँ न्याय का वृक्ष फलता-फूलता है और निष्पक्षता वह जल है जो इसे सींचता है।
​जिस दिन शब्द और अर्थ के बीच का भेद मिट जाएगा, जिस दिन एक व्यक्ति का अधिकार दूसरे का कर्तव्य बन जाएगा, और जिस दिन शक्ति का प्रयोग दमन के लिए नहीं बल्कि दुर्बल को सहारा देने के लिए होगा—उसी दिन हम कह पाएंगे कि हमने ‘न्याय’ के वास्तविक सौंदर्य को पा लिया है।
​न्याय किसी कागज की स्याही में नहीं, बल्कि मनुष्य के उस संकल्प में है जो कहता है—
“भले ही सारा संसार मेरे विरुद्ध खड़ा हो, मैं सत्य और निष्पक्षता का मार्ग नहीं छोड़ सकता”

लेखक पवन शुक्ला