प्रमोद दीक्षित मलय
मराठा साम्राज्य का संदर्भ आते ही आंखों के सम्मुख छत्रपति शिवाजी महाराज की छवि उभरती है, जिन्होंने मुगलों के काल में भारत में मराठा साम्राज्य को न केवल एक शक्ति के रूप में स्थापित किया बल्कि राजनीति, कूटनीति, प्रशासन एवं युद्धशैली को नवल अर्थ भी दिए। किंतु शिवाजी महाराज के अवसान के पश्चात् सुयोग्य एवं दूरदर्शी नेतृत्व के अभाव में मराठा शक्ति क्षीणतर होती गई और राज्य संचालन एवं प्रशासन के सूत्र पेशवा (प्रधानमंत्री) के हाथों में स्थानांतरित होते गये। छत्रपति शाहूजी महाराज ने बालाजी विश्वनाथ भट्ट को प्रथम पेशवा (प्रधानमंत्री) के रूप में नामित किया था। छत्रपति शाहूजी महाराज के द्वारा मनोनीत पेशवा पद वंशानुगत हो गया और कालांतर में पेशवा ही मराठा शासक के रूप में स्थापित हो गये। नाना फडनवीस पेशवा के अधीन एक राजनीतिज्ञ, कूटनीतिज्ञ के साथ ही कुशल युद्धनीतिज्ञ, दूरदर्शी, स्वामिभक्त, चतुर प्रशासक और मराठा साम्राज्य के हितैषी थे। उन्होंने पानीपत के तृतीय युद्ध की पराजय से बिखरी मराठा सैन्य शक्ति, कमजोर आर्थिक स्थिति और निरंकुश प्रशासन को अपनी कार्य कुशलता से पुनः स्थापित किया। इतिहासकारों ने नाना फड़नवीस को मराठा साम्राज्य का चाणक्य और मैकियावेली कहा। वह नि:स्वार्थ सेवा-साधना, समर्पण एवं कर्तव्यनिष्ठा के अनुपम उदाहरण बन गये।
नाना फड़नवीस का जन्म सह्याद्रि पर्वत श्रंखला क्षेत्र में प्रवाहित कृष्णा नदी के तट पर अवस्थित मराठा शक्ति केन्द्र सतारा में 13 फरवरी, 1742 को हुआ था। इनका मूल नाम बालाजी जनार्दन भानु था, किंतु नाना फड़नवीस के नाम से कीर्ति पताका अद्यावधि फहर रही है। छत्रपति शाहूजी महाराज ने 1713 में बालाजी विश्वनाथ भट्ट को पेशवा नियुक्त किया जो 1720 तक पदासीन रहे। नाना फड़नवीस के दादा बालाजी महादजी भानु पेशवा के मित्र और मराठा साम्राज्य सेवा में कार्यरत थे। मुगलों द्वारा पेशवा बालाजी विश्वनाथ की हत्या की रची गई साज़िश का पर्दाफाश कर पेशवा की प्राण रक्षा करने पर नाना फड़नवीस के दादा को फडनवीस की उपाधि प्रदान की गई थी, जो आगे चलकर उनके वंश की पहचान बन गई। 1720 से 1740 तक बाजीराव प्रथम पेशवा रहे, जो कभी कोई युद्ध नहीं हारे और मराठा साम्राज्य को शिखर पर पहुंचाया। 1740 से 1761 तक बालाजी बाजीराव पेशवा का कार्यकाल रहा, जिनके सेनापति थे सदाशिवराव भाऊ। नाना फड़नवीस इन्हीं सदाशिवराव भाऊ के सचिव थे। पेशवा बालाजी बाजीराव के तीन पुत्र थे विश्वासराव, माधवराव और नारायण राव। वर्ष 1761 में पानीपत का तृतीय युद्ध अहमदशाह अब्दाली और पेशवा के बीच हुआ। इस भयंकर युद्ध में मराठों की करारी हार हुई, शक्ति छिन्न-भिन्न हो गई और आर्थिक स्थिति बदतर हो गई। युद्ध में राजकुमार विश्वासराव, सेनापति सदाशिवराव भाऊ सहित हजारों मराठा वीर योद्धा वीरगति को प्राप्त हुए। नाना फड़नवीस सहित सीमित संख्या में मराठा नायक ही शेष बचे थे। आगे युद्ध की हार और पुत्र वियोग में पेशवा बालाजी बाजीराव ने एक मंदिर में शोकावस्था में प्राण त्याग दिए। तब 1761 में बालाजी के 17 वर्षीय द्वितीय पुत्र माधवराव पेशवा पद पर आरूढ़ हुए। नाना फड़नवीस के परामर्श से पेशवा माधवराव मराठा साम्राज्य की गिरती साख को न केवल संभाल पाये बल्कि राज-काज को सुव्यवस्थित कर राज्य की बदहाली को दूर कर राजकोष को समृद्ध किया। इसी दौरान नाना फड़नवीस के नेतृत्व में निजाम को पराजित कर एक बड़ा क्षेत्र मराठा राज्य में मिला लिया। फड़नवीस की राह फूलों भरी नहीं, बल्कि कंटकमय थी। पेशवा माधवराव का सगा चाचा रघुनाथ राव राघोबा स्वयं पेशवा बनने की इच्छा पाले हुए था, और कुचक्र रच रहा था। किंतु नाना फड़नवीस की बुद्धिमत्ता, राजनीतिक समझ और प्रशासन पर सख्त पकड़ के चलते विरोधी सफल नहीं हो पा रहे थे। नाना ने अपनी मेधा से एक बहुत चतुर गुप्तचर विभाग स्थापित किया था, जो राज्य के किसी भी कोने में पेशवा के विरुद्ध रची जा रही दुरभिसंधि की सूचना नाना फड़नवीस को यथाशीघ्र पहुंचा देता था। मराठा राज्य विकास के पथ पर बढ़ रहा था पर नियति ने खेल खेला, पेशवा माधवराव का 1772 में निधन हो गया। छोटे भाई नारायणराव अब पेशवा बने, किंतु इनमें न राजकाज की पर्याप्त समझ थी और न ही राजनीतिक परिपक्वता। रघुनाथराव की पेशवा बनने की स्वप्न-बेल अब पुष्पित हो फलित होने को थी। अगस्त 1773 में अंगरक्षकों ने ही महल के अंदर नारायणराव की हत्या कर दी, और अंततः महत्वाकांक्षी रघुनाथराव पेशवा की गद्दी पर बैठा गया। नाना फड़नवीस के लिए यह असहनीय था। उन्होंने सिंधिया, होल्कर, गायकवाड़, भोसले मराठा शक्ति का संघ बनाया और तुकोजीराव होल्कर, महादजी सिंधिया, हरिपंत फड़के, फलंटकर, भगवान राव प्रतिनिधि, सखारामबापू बोकिल, त्रिम्बकराम पेठे, सरदारजी रस्ते, बाबूजी नायक, मोलोजी घोरपड़े और मोरोबा फड़नीस आदि मंत्रियों की बाराभाई परिषद की रचना की। परिषद के साथ मिलकर रघुनाथराव को पदच्युत कर नारायणराव के 40 दिन के शिशु सवाई माधवराव को पेशवा पद पर आसीन करा स्वयं मुख्यमंत्री बन मराठा राज्य संभाल लिया। पर रघुनाथराव भाग कर ईस्ट इंडिया कंपनी से मदद मांगने चला गया और सूरत की संधि पर हस्ताक्षर कर कुछ महत्वपूर्ण मराठा क्षेत्र अंग्रजों को सौंप दिए, अंग्रेजों ने उसकी सैन्य मदद की। तभी इस संधि की काट के लिए कूटनीति से काम ले नाना फड़नवीस ने ईस्ट इंडिया कंपनी की कलकत्ता परिषद के साथ पुरंदर की संधि कर ली, कंपनी रघुनाथ राव को पेंशन देने पर सहमत हुई। आगे अंग्रेजों से खतरा भांपते हुए 1777 में फड़नवीस ने पश्चिमी तट पर फ्रांसीसी सेना को बंदरगाह प्रदान किया। फलत: अंग्रेजों से मराठाओं का युद्ध हुआ। मराठे जीते और कंपनी द्वारा 1773 से जीते गये सभी क्षेत्र वापस ले लिए। आगे 1783 में पुनः अंग्रेजों को पराजित कर ग्वालियर के निकट सालबाई स्थान पर संधिपत्र पर हस्ताक्षर हुए। कंपनी ने रघुनाथ राव का समर्थन छोड़ दिया और मराठों की प्रभुता स्वीकार कर ली।
नाना फड़नवीस राज-काज में सख्त नियंत्रण रखते थे और मराठा साम्राज्य के गौरव के लिए पल-पल समर्पित। उनकी सूझ-बूझ और नेतृत्व से मराठा साम्राज्य की सीमाएं कृष्ण पक्ष के चंद्र की भांति बढ़ रही थीं। मराठा शक्ति फल-फूल रही थी, लोकजीवन आनंदमय था। दुर्योग से, 1796 में पेशवा सवाई माधवराव ने आत्महत्या कर ली और रघुनाथ राव का पुत्र बाजीराव द्वितीय पेशवा बना, जो नाना फड़नवीस को पसंद नहीं करता था। उसमें प्रशासनिक क्षमता न थी, फलत: मराठा साम्राज्य पतन की राह पर चल पड़ा। मराठा साम्राज्य की दुर्दशा से दुखी नाना फड़नवीस 13 मार्च, 1800 को स्वर्ग सिधार गये। पर अपने पीछे छोड़ गये नि:स्वार्थ राजभक्ति, प्रजाहित, कूटनीतिक चातुर्य और बुद्धिमत्ता के वे चमकदार अध्याय, जिन्हें पढ़कर भावी पीढ़ी उन्हें नमन करती रहेगी।