लेख

राष्ट्रीय युवा दिवस और पंच प्रण

डॉ शिवानी कटारा

भारत आज इतिहास के उस निर्णायक मोड़ पर खड़ा है, जहाँ आने वाले पच्चीस वर्ष राष्ट्र की दिशा और दशा निर्धारित करेंगे। यह केवल समय की गणना नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय संकल्प है—जिसे अमृत काल कहा गया है। इस कालखंड में भारत का लक्ष्य स्पष्ट है—विकसित भारत, सशक्त भारत। इस लक्ष्य की वैचारिक आत्मा हैं ‘पंच प्रण’, और इसकी सबसे बड़ी कार्यकारी शक्ति है युवा भारत।
राष्ट्रीय युवा दिवस, स्वामी विवेकानंद की जयंती के रूप में, हमें यह स्मरण कराता है कि राष्ट्र का निर्माण केवल नीतियों और योजनाओं से नहीं, बल्कि युवा चेतना, चरित्र और संकल्प से होता है। विवेकानंद का युवा—निर्भीक, आत्मविश्वासी, शारीरिक–मानसिक रूप से सशक्त और राष्ट्र–समर्पित—आज 21वीं सदी के संदर्भों में फिर से आकार ले रहा है।

पंच प्रण—विकसित भारत का संकल्प, गौरवशाली विरासत पर गर्व, दासता की मानसिकता से मुक्ति, एकता और नागरिक कर्तव्यों के प्रति प्रतिबद्धता तथा अधिकारों से आगे बढ़कर कर्तव्यों का बोध—आज के युवाओं के विचार और व्यवहार में सहज रूप से दिखाई देते हैं। यही वह नैतिक आधार है, जहाँ व्यक्तिगत उपलब्धियाँ केवल निजी सफलता न रहकर ‘टीम इंडिया’ की सामूहिक शक्ति और राष्ट्र–निर्माण की साझा उपलब्धि में रूपांतरित हो जाती हैं।

आज का भारत दुनिया के सबसे युवा देशों में शामिल है। Gen Z—अर्थात 1997 से 2012 के बीच जन्मी पीढ़ी—भारत की जनसांख्यिकीय शक्ति का केंद्र है। यह पीढ़ी यह भली–भाँति समझती है कि तेज़ी से बदलती अर्थव्यवस्था में अनुकूलनशीलता (adaptability) और बहु–कौशल (versatility) ही सबसे बड़ी पूँजी हैं। वे केवल एक डिग्री को सफलता की गारंटी नहीं मानते, बल्कि कौशल–समूह (skill-stack)—यानी कई पूरक कौशलों के संयोजन—को महत्व देते हैं। इसी सोच के कारण भारत का रोज़गार परिदृश्य नए रूपों में विस्तृत हो रहा है—स्थानीय स्तर की नौकरियाँ (hyperlocal jobs), सूक्ष्म उद्यमिता (micro-entrepreneurship), सृजनात्मक भूमिकाएँ (creator roles) और डिजिटल–प्रथम करियर (digital-first careers) तेज़ी से उभर रहे हैं। यह प्रवृत्ति पंच प्रण के ‘विकसित भारत’ के संकल्प को व्यवहारिक आधार प्रदान करती है।

युवा शक्ति आज केवल तकनीक या स्टार्टअप तक सीमित नहीं है। कृषि और खेल जैसे क्षेत्रों में भी नए अवसर रचे जा रहे हैं—कृषि–स्टार्टअप्स (agri-startups), खेल–प्रौद्योगिकी (sports-tech) और आँकड़ा–आधारित प्रशिक्षण (data-driven training) इसके उदाहरण हैं। आज भारत युवाओं को वैश्विक मंचों पर देश की नीतियों पर बोलने और सोचने का अवसर दे रहा है। G20 से जुड़े Y20 मंच पर युवा Y Talks के माध्यम से रोजगार, शिक्षा और जलवायु जैसे विषयों पर अपने विचार रखते हैं, जबकि Y Walks के ज़रिये ज़मीनी समस्याओं पर संवाद करते हैं। इससे युवा केवल दर्शक नहीं रह जाते, बल्कि नीति–निर्माण की प्रक्रिया के सक्रिय सहभागी बनते हैं। वैश्विक संकट के समय भी भारत ने युवाओं के साथ मिलकर संवेदनशील और साहसी नेतृत्व का परिचय दिया। यूक्रेन युद्ध के दौरान ऑपरेशन गंगा में हजारों भारतीय छात्रों की सुरक्षित स्वदेश वापसी में युवाओं के समन्वय, धैर्य और सहयोग ने सिद्ध किया कि युवा भारत केवल तकनीक और नवाचार में ही नहीं, बल्कि करुणा और साहस में भी अग्रणी है।

बाज़ार के साथ-साथ यह पीढ़ी राजनीति, संस्कृति, समाज और स्वास्थ्य—हर दिशा में प्रभाव डाल रही है। चुनावी अभियानों से लेकर नीतिगत संवाद तक युवाओं की भाषा, मुद्दे और मंच बदल चुके हैं। हालिया आँकड़ों के अनुसार भारत में 18–29 आयु वर्ग के लगभग 21.7 करोड़ युवा मतदाता हैं—जो कुल मतदाता सूची का एक बड़ा हिस्सा हैं। इसी कारण राजनीतिक दल अब चुनावी रणनीतियाँ और नीतिगत प्राथमिकताएँ तय करते समय युवाओं को केंद्र में रखते हैं। इस बदलते परिदृश्य का प्रतीक है प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी द्वारा युवा डिजिटल क्रिएटर्स को दिए गए इन्फ्लुएंसर अवॉर्ड्स—जो यह दर्शाते हैं कि युवा आवाज़ें अब राष्ट्रीय विमर्श और नीति–निर्माण का अहम हिस्सा बन चुकी हैं।

बाज़ार की भाषा भी बदली है। आज ब्रांड केवल उत्पाद नहीं, बल्कि मूल्य–कथाएँ प्रस्तुत कर रहे हैं, क्योंकि Gen Z प्रामाणिकता (authenticity), समावेशन (inclusion) और सामाजिक–पर्यावरणीय जिम्मेदारी (social–environmental responsibility) को महत्व देती है। उदाहरणस्वरूप, कपड़ों के ब्रांड फैशन के साथ-साथ पर्यावरण–अनुकूल सामग्री (eco-friendly) , लैंगिक समावेशन (gender inclusive) और स्थानीय कारीगरों के समर्थन (vocal for local) को अपनी पहचान बना रहे हैं—ताकि युवा उनसे भावनात्मक रूप से जुड़ सकें।

संस्कृति के स्तर पर यह पीढ़ी परंपराओं को व्यक्तिगत अर्थों के साथ अपनाती है। भारत में 92% लोग इंस्टाग्राम रील्स का नियमित उपयोग करते हैं; इसलिए युवा अपनी परंपराओं को ज्यों-का-त्यों नहीं दोहराते, बल्कि अपने समय, सोच और रचनात्मकता के अनुरूप उन्हें नया अर्थ देते हैं—रील्स, शॉर्ट्स और मीम्स के माध्यम से त्योहार, लोककला और परंपराएँ जीवंत संवाद में बदल जाती हैं।

आलोचनाएँ भी हैं—डिजिटल निर्भरता (digital dependency), कम ध्यान–काल (short attention span) और अत्यधिक संवेदनशीलता । पर महामारी–काल ने इस पीढ़ी की लचीलापन (resilience) और सहानुभूति (empathy) को उजागर किया। महामारी के बाद युवाओं ने डिजिटल विराम (digital break) लेना और स्क्रीन–समय की सीमाएँ (screen-time limits) अपनाना सीखा, जिससे मानसिक थकान (mental fatigue) में कमी आई। 2025 के Youth Wellness Survey के अनुसार लगभग 64% Gen Z नियमित रूप से सचेतन अभ्यास (mindfulness) और meditation ऐप्स के माध्यम से डिजिटल थकावट (burnout) को प्रबंधित कर रही है। इसलिए, जहाँ कुछ आलोचक चिंतित हैं, वहीं युवा स्वयं डिजिटल संतुलन (digital wellness), डिजिटल सीमाएँ (digital boundaries) और सहयोग (collaboration) को प्राथमिकता देकर technology का संतुलित और सकारात्मक उपयोग सुनिश्चित कर रहे हैं।

आज के युवा–केन्द्रित भारत में नई शिक्षा नीति, स्टार्टअप–इकोसिस्टम और खेल–संस्कृति मिलकर युवाओं के सपनों को उड़ान देने वाला एक सशक्त रनवे तैयार कर रहे हैं। शिक्षा में बढ़ता लचीलापन, नवाचार को प्रोत्साहन और खेलों में विस्तृत अवसरों ने युवाओं के आत्मविश्वास को नई ऊँचाई दी है। फिट इंडिया और खेलो इंडिया जैसे कार्यक्रम स्वामी विवेकानंद की उस दृष्टि को साकार करते हैं, जिसके अनुसार स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन का वास होता है। साथ ही, सशस्त्र बलों, अंतरिक्ष, खेल और विज्ञान में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी युवा भारत की सामूहिक शक्ति को और अधिक व्यापक व संतुलित आयाम प्रदान कर रही है।

इसी क्रम में Gen Z ने डिजिटल इंडिया के स्वप्न को साकार करने में निर्णायक भूमिका निभाई है। UPI जैसी डिजिटल पहल को तेज़ी से अपनाकर युवाओं ने उसे दैनिक जीवन का हिस्सा बना दिया, जिससे यह वैश्विक स्तर पर सफल हुई। यह स्वामी विवेकानंद के उस प्रेरक आह्वान—“उठो, जागो और लक्ष्य की प्राप्ति तक रुको मत”—का सशक्त उदाहरण है, जहाँ युवाओं की जागरूकता, निरंतर प्रयोग और आत्मविश्वास ने एक तकनीकी नवाचार को जन–आंदोलन में बदल दिया और भारत को डिजिटल भुगतान में विश्व–नेतृत्व दिलाया।

दुनिया आज भारत के युवाओं को आशा की उजली दृष्टि से देख रही है—क्योंकि विकसित भारत कोई दूर क्षितिज पर टंगा स्वप्न नहीं, बल्कि अमृत काल में युवा पीढ़ी द्वारा प्रतिदिन लिए जा रहे वे सजग संकल्प हैं, जो उनके विवेकपूर्ण चुनावों, निरंतर कौशल–साधना, सामाजिक उत्तरदायित्व और राष्ट्र–एकता के प्रति प्रतिबद्धता से आकार ले रहे हैं। अतः राष्ट्रीय युवा दिवस वह प्रेरक क्षण है, जहाँ पंच प्रण का संकल्प अमृत काल की चेतना से जुड़ता है—और स्वामी विवेकानंद की विचार–ज्योति तथा Gen Z की ऊर्जा के संगम से भविष्य का पथ आलोकित होता है।