राष्ट्र के विकास में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की भूमिका

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-वी. के. सिंह

राष्ट्र समान्यत: राज्य या देश से समझा जाता है। राष्ट्र का एक शाश्वत अथवा जीवंत अर्थ है ‘एक राज्य में बसने वाले समस्त जनसमूह।’ सास्कृतिक राष्ट्रवाद इसी शाश्वत अर्थ को दर्शाता है। राष्ट्रवाद राष्ट्र हितों के प्रति समर्पित विचार है, जो एकता, महत्ता और कल्याण का समर्थक है, समस्त भारतीय समुदाय को समता एवं समानता के सिद्धान्तों पर एकीकरण करने का एक सतत् प्रयास है। राष्ट्रवाद समस्त नागरिकों के प्रति समर्पित विचार है जिसमें सवर्ण, दलित, पिछड़े, हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई सब सम्मिलित हैं। नागरिकों को एकता के सूत्र में बाँधने एवं एक दूसरे के प्रति सच्ची श्रद्धा समर्पण ही राष्ट्रवाद है।

राष्ट्रवाद का सीधा संबंध विकास से है जो किसी राष्ट्र के अंतिम व्यक्ति के विकास से परिलक्षित होता है। विश्‍व के आठ बड़े विकसित देशों के समूह जी-8 का विचार करे तो इनमें दो ऐसी आर्थिक शक्तियाँ हैं, जिनको भारतवर्ष के साथ ही लगभग स्वतंत्रता मिली (तानाशाहों से)। जापान और जर्मनी ये दोनों देश द्वितीय विश्वयुद्ध में बुरी तरह तबाह हो गये थे। काम करने वाले स्वस्थ लोग कम ही बचे थे, आर्थिक एवं राजनैतिक दबाव से ग्रसीत थे तथा कर्ज के बोझ से दबे हुए थे। इन राष्ट्रों में एक समानता थी, इन प्रदेशों की जनता में राष्ट्रवाद की भावना कूट- कूट कर भरी हुई थी। मैं जापान का उदाहरण आपके समक्ष रखना चाहूँगा। सांस्कृतिक दृष्टिकोण से जापान और भारतवर्ष में काफी समानताएँ हैं तथा जापान नें पौराणिक काल में हिन्दू जीवनदर्शन से बहुत सारी बातें ग्रहण की है। आजादी के वक्त, जापान कीं प्रति किलो मीटर जनसख्या भारतवर्ष से लगभग दूगनी थी। प्राकृतिक, आर्थिक एवं भौतिक संपदा औरं संसाधनों में वे भारतवर्ष की तुलना में काफी कम ताकतवर थे। दोनों ही देश आज विश्‍व के समक्ष आर्थिक शक्ति बन कर उभरें है। जापानी राष्ट्रवाद का सजग उदाहरण वहाँ के कार्मिकों एवं मजदूर वर्ग के असंतोश व्यक्त करने के तरीके से उजागर होता है। जापानी लोग कभी हड़ताल कर अपने कर्मस्थल में ताला नहीं लगवाते परन्तु वे काला फीता बांध कर विरोध प्रकट करते हैं।माँग पूरी न होने पर वे अपने उच्च अधिकारियों से बातचीत बंद कर देतें हैं, इससे भी बात न बने तो वे अपने कारखानों मे दुगुना तिगुना उत्पाद करने लगते हैं।यहाँ यह बताना आवष्यक है कि उत्पादन दुगनी प्रतिशत में बढ़ने से माल का उत्पादन निम्न स्तर का होता है, कारखानों की चलपूंजी एवं कलपूर्जों का तेजी से ह्रास होता है और बिकवाली पर प्रतिकुल असर पड़ता है और मिल मालिकों कि मुष्किलें कई गुना बढ़ जाती हैं। एक मजबूत एवं उन्नत राष्ट्र के निर्माण के लिए यह परम-आवश्‍यक है कि इसके नागरिकों में एकता और सद्भावना हो जिससे उन्हें अपनी मातृभूमि से आत्मिक प्रेम और लगाव की भावना उत्पन्ना हो, जो जापानियों के बीच मैजूद है।

राष्ट्रवाद का सिद्धान्त किसी भी वर्ग विशेष की तुष्टीकरण के विरूद्ध है, तथा पूरे राष्ट्र में एक कानून और सामान नागरिक संहिता की वकालत करती है।

संस्कृति से किसी व्यक्ति, जाति, राष्ट्र, आदि की वे बातें जो उनके मन, रुचि, आचार-विचार, कला-कौशल और सभ्यता का सूचक होती हैं पर विचार होता है। दो शब्दों में कहें तो यह जीवन जीने की शैली है। भारतीय सरकारी राजपत्र (गजट) इतिहास व संस्कृति संस्करण में यह स्पष्ट वर्णन है कि हिन्दुत्व या हिन्दुइज्म एक ही शब्द है, तथा यह भारतवर्ष के कला-कौशल, रुचि, आचार-विचार और सभ्यता का सूचक है।

किसी भी कौम की सस्कृति का विचार करें तो वह विशेष रुप से उस समुदाय के जन्म -मरन, शादी- विवाह और त्यौहारों के उत्सव एवं रीति रिवाज मे झलकता है। अगर हम भारतीय मूल के हिन्दु, मुसलमान और ईसाईयों की संस्कृति की बात करें तो धार्मिक रीति-रिवाजों को छोड़ इन सारे खुषी के मौकों पर साथ-साथ रहते-रहते प्राय: सबने एक-दूसरे के बहुत सारे रीति-रिवाजों, सभ्यता, कार्य-संस्कृति और तौर-तरीकों को ग्रहण किया है तथा उसे अपने व्यवहार और जीवनशैली में सम्मिलित किया। यह इन सारे धर्मो में समान है जो कि अन्य दूसरे देशों की संस्कृति से बिल्कूल भिन्न है। वास्तव में यही धर्मनिरपेक्षता एवं हिन्दु समाज की सभ्यता की तस्वीर है तथा इसे देश- विदेश में हिन्दूत्व या हिन्दुस्तानी सभ्यता या संस्कृति के नाम से जाना जाता है। यही कारण है कि भारतीय मूल के मुसलमान और इसाई सम्प्रदाय अपने को अन्य देशों के भाईयों से अलग पाते हैं तथा इस संस्कृति ने उनके हृदय में इस राष्ट्र एवं धरती माँ के प्रति एक असीम प्यार और श्रद्धा की भावना विकसित की है।

भारतीय सस्कृति ने सदियों से इस राष्ट्र को एकता के सूत्र में बांध कर रखा है। प्राचीन सभ्यताओं के उत्खनन एवं खोज के क्रम में एवं इतिहासकारों के मतानुसार, हिन्दू सभ्यता एवं संस्कृति विश्‍व में सबसे प्राचीनतम् हैं। भारतीय सभ्यता, संस्कृति, षिक्षा का विस्तार एवं प्रसार प्राचीन काल में एशिया महाद्वीप के हर कोने में अंकित है। इसमें प्रमुख रूप से चीन, थाइलैंड, मलाया, बर्मा, इन्डोनेशिया, जापान एवं जावा सुमित्रा द्वीप की सभ्यता विचारणीय है। खोतन में एक हिन्दू राष्ट्र पाया गया था। ऐसी मान्यता है कि उसे सम्राट अषोक के पुत्र ने स्थापित किया था। बौद्ध धर्म का प्रचार खोतन राज्य में उसके स्थापना के लगभग एक शताब्दी बाद हुआ। खोतन में संस्कृत एवं प्राकृत की षिक्षा दी जाती थी। मध्य एषिया सारी प्राचीन संस्कृतियों का मिलन स्थल बन गई थी तथा वह चीन तथा यूनान के बीच प्रमुख रेशमी व्यापारिक मार्ग के रूप में विकसित थी। इतिहास गवाह है कि भारतवासियों ने सत्ता का राजनैतिक प्रयास नहीं किया लेकिन भारतीय संस्कृति इतनी विकसित एवं उन्नत थी कि इसका स्वत: विस्तार एवं प्रसार दूर सुदूर पष्चिम देशों तक पाया गया था। इसका उजागर जावा निवासी मुसलमानों, के रामायण तथा महाभारत का विधिवत अध्ययन से होता हैं। वे रामायण और महाभारत हिन्दुओं की तरह सम्मानपूवर्क पढ़ते हैं तथा कुरान को अपना धर्म पुस्तक मानते हैं। हिन्दूओं की विचारों में सहनषीलता और आत्मविवेचन के विलक्षण गुण ने षान्तिपूर्वक जीने की पद्धति का ईजाद किया जो हिन्दूत्व के सारार्थ को प्रतिबिम्बित करता था। यह जाति, धर्म और वर्गों से उपर सभी वर्गों में ज्ञान और परलौकिक विचारों को प्रवाहित करने में विष्वास रखते थे। हमारे पूर्वजों ने शरतीय जनसंख्या को एकता के सूत्रों में पिरोकर एक सर्वधार्मिक, गतिषील, नैतिक एवं संयुक्त, अध्यात्मिक, प्रगतिशील समाज की संरचना की। जों एक राष्ट्रवादी विचारधारा के रूप में सामने आई जिसने लोगों के दिलों को जोड़कर उन्हें संगठित किया।

भारतीय संस्कृति के एकतारूपी मंत्र से प्रेरित होकर जापान ने राष्ट्रवाद के सिद्धान्त पर अमल करते हुए, मात्र बीस वर्षों में अपने को विकासषील से विकसित देश की श्रेणी मे दुनिया के सामने ला खड़ा किया है। अपने सभी नागरिकों को रोटी , कपड़ा और मकान के अलावा सम्पूर्ण सामाजिक संरक्षण प्रदान किया है जिसमें सामाजिक, आर्थिक एवं राजनैतिक न्याय तीनों का समावेश है, जबकि हम सामाजिक न्याय रूपी प्रलोभन देकर भी विगत 60 सालों में अपनी जनता को ऐसी एक भी सुविधा की अल्प पूर्ति तक नहीं कर पाए हैं।जबकि ,भारतीय संस्कृति को स्वार्थ परक नहीं वरन् परमार्थ के गुणों से पूर्ण माना जाता है।

आज, राष्ट्र एक मुश्किल मोड़ पर खड़ा है तथा विधटन की आग कोने-कोने में लगी है। जात-पात, क्षेत्रवाद तथा साम्प्रदाय के नाम पर चन्द मुठ्ठी भर तथाकथित राजनेताओं के द्वारा सद्भावना और सौहार्द भरे सम्पूर्ण भारतीय समाज को तोड़ने की साजिश यत्र-तत्र की जा रही है।

भारतीय संविधान के निर्माताओं ने गहन अध्ययन एवं मनन् के पष्चात् चार सिध्दांतों – न्याय, स्वतंत्रता, समता एवं बन्धुता – की संरचना की जो हमारे संविधान के आधारभूत स्तंभ हैं। आज ये स्तंभ ही हिलते दीख रहे हैं। बिहारियों का महाराष्ट्र एवं आसाम में दुर्दषा, तथा गुज्जर एवं मीणा जाति का वर्ग विरोध इसके ज्वंलत उदाहरण हैं।

आज गैर-भारतीयता को सेक्युलरवाद और राजनीतिक सफलता का पैमाना माना जाता है। यहाँ राष्ट्रीयता की विचारधारा को हलके ढ़ग से लेते हुए हिन्दुत्व मूलक समाजिक और सांस्कृतिक विचारधारा जो वास्तव में भारतीय सनातनी परिकल्पना का आधार है, को ही संदेह की दृष्टि से देखा जाता है। आज हम सभी नागरिकों एवं जनप्रतिनिधियों का यह नैतिक, समाजिक एवं मौलिक कर्तव्‍य है कि हम आपसी भेदभाव को भुलाकर भारतवर्ष में राष्ट्रप्रेम और राष्ट्रभक्ति जागृत करने का सामूहिक प्रयास करें। इस सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की जागृति से राष्ट्र में शांति एवं व्यवस्था कायम होगी, जिससे राष्ट्र को एक आर्थिक शक्ति के रूप में विकसित किया जा सकेगा।

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  1. ख़याल बुरा नहीं है .चूँकि आप उस वर्ग का प्रतिनिधित्व करतें है ;जो राशन की लाइन
    में नहीं लगता ;.आपका नाम उन अठहत्तर करोड़ लोगों में शामिल नहीं ;जो माननीय सुरेश तेंदुलकर समिति की मर्मान्तक भुखमरी रिपोर्ट में शामिल हैं ; -अर्थात आपको बेरोजगारी -.अशिक्षा -महंगाई अल्पतम क्रय क्षमता तथा भयानक कुपोषण की शिकार एक अरब जनता से उपर मान लेने पर ही -आपके विचारों का तहेदिल से समर्थन कर . सकता हूँ .आपकेअनुसार जापान ; इंडो नेसिया ;खोतान एवं तमाम दुनिया तो भारतीय सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का अनुशरण करके समृद्धि के शिखर पर पहुँच चुकी है .फिर भारत की उक्त महादशा और बीभत्स सूरत- ये -हाल क्यों है ?हमारा ही सांस्कृतिक राष्ट्रवाद हमारी तथाकथित महान सांस्कृतिक
    चेतना हमें इक्कीसवीं सदी के प्रथम दशमांश में भी इस लायक क्यों नहीं बना सकी की हम राष्ट्र हित में वैयक्तिक हित का संधान कर सकें ?

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