ज्ञान चंद पाटनी
पेयजल पाइपलाइनों की उपेक्षा किस तरह जानलेवा साबित हो सकती है, यह मध्यप्रदेश के इंदौर शहर में दूषित जल से हुई मौतों से साफ हो जाता है। इंदौर में नलों से घरों तक पहुंचे दूषित जल के सेवन से अनेक लोगों में उल्टी‑दस्त, तेज बुखार, पेट दर्द और निर्जलीकरण जैसे लक्षण दिखाई देने लगे। स्थानीय अस्पतालों में डायरिया और गैस्ट्रोएंटेराइटिस के मरीजों की संख्या अचानक बढ़ गई। बच्चों और बुजुर्गों की हालत तेजी से बिगड़ी। मौतें भी हुईं, हालांकि ऐसे मामलों में जैसा अक्सर होता है मौतों के सरकारी आंकड़ों और मीडिया के आंकड़ों में काफी अंतर है। इस घटना ने यह मिथक तोड़ दिया कि “स्मार्ट सिटी” या बड़े महानगरों में पेयजल की सुरक्षा अपने‑आप सुनिश्चित हो जाती है।
देश के बड़े हिस्से में पेयजल वितरण नेटवर्क दशकों पुराना है। पाइपलाइनों में जंग लगा हुआ है और कई क्षतिग्रस्त हैं। जहां पेयजल पाइपलाइनें सीवर लाइन, नालियों या ड्रेनेज के समानांतर और काफी नजदीक बिछी हैं, वहां पाइप के क्षतिग्रस्त होते ही सीवर का गंदा पानी पेयजल लाइन में घुस जाता है। पेयजल पाइपलाइनें जीवनरेखा की तरह होती हैं लेकिन इनकी देखरेख की उपेक्षा के कारण लोग बीमार ही नहीं हो रहे, मौत के आगोश में भी समा रहे हैं।
कई शहरों में सड़कें खोदी जाती हैं। इस दौरान पेयजल पाइपलाइनें क्षतिग्रस्त हो जाती हैं। असली समस्या यह है कि इन क्षतिग्रस्त हिस्सों की समय पर पहचान नहीं की जाती। लीकेज का पता चल भी जाए तो उसे सही तरीके से ठीक नहीं किया जाता, बल्कि अक्सर ‘जुगाड़’ से काम चला लिया जाता है।
सामान्यतः यह माना जाता है कि सरकारी नल से आने वाला पानी किसी न किसी स्तर पर फिल्टर या ट्रीट किया गया होगा, इसलिए सुरक्षित है। असलियत यह है कि उपेक्षित पाइपलाइनें दूषित जल घरों तक पहुंचा देती हैं। बाहर की गंदगी, सीवर का पानी पाइपलाइनों में चला जाता है। बारिश के मौसम में पानी भरने, सीवर ओवरफ्लो और नालों के उफान के दौरान यह खतरा कई गुना बढ़ जाता है। नलों से आने वाला ऐसा दूषित पानी दिखने‑सूंघने में कभी‑कभी सामान्य लगता है लेकिन उसमें डायरिया, टाइफाइड, हैजा, हेपेटाइटिस जैसे रोगों के कीटाणु मौजूद हो सकते हैं। कई परिवार इसी पानी को पीते हैं और भोजन बनाते हैं, जिससे उनका जीवन खतरे में पड़ जाता है।
पेयजल लाइनों की देखरेख गवर्नेंस का मुद्दा है। ज्यादातर नगर निगमों और जल बोर्डों के पास न तो पाइपलाइन नेटवर्क का अद्यतन मानचित्र है और न ही नियमित सर्वे की व्यवस्था। लीकेज या दूषित पानी की शिकायतें अक्सर महीनों तक लंबित रहती हैं; फील्ड स्टाफ केवल सतही मरम्मत कर लौट जाता है। इंदौर में भी यही हुआ। मीडिया रिपोर्ट्स में कहा जा रहा है कि हेल्पलाइन पर 15 अक्टूबर को ही भागीरथपुरा में गंदे पानी की सप्लाई की पहली शिकायत दर्ज कराई गई थी। इसके बाद फिर किसी ने शिकायत की और कहा कि पानी में गंदगी के साथ तेजाब भी है। 18 दिसंबर को भी पानी से बदबू आने की शिकायत दर्ज कराई गई। इन शिकायतों पर समय रहते ध्यान ही नहीं दिया गया। दस दिन भागीरथपुरा क्षेत्र में बड़ी संख्या में लोग बीमार पड़ गए। 29 दिसंबर को जब मौतों की खबरें आने लगीं, तब प्रशासन की नींद खुली।
दिक्कत यह है कि कई शहरों में जल की गुणवत्ता की जांच के लिए लैब तो हैं, लेकिन नमूने नियमित अंतराल पर नहीं लिए जाते। परीक्षण रिपोर्टें सार्वजनिक नहीं होतीं जिससे नागरिकों को अपने क्षेत्र के पानी की गुणवत्ता की वास्तविक स्थिति के बारे में पता ही नहीं चलता। कई बार विकास कार्यों और ठेकेदारों के दबाव में बिना समन्वय के खुदाई होती है और पाइपलाइन टूटने से होने वाले रिसाव का खर्च और जोखिम अंततः जनता को भुगतना पड़ता है।
संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत ‘जीवन के अधिकार’ की न्यायिक व्याख्या में बार‑बार साफ पानी और स्वच्छ पर्यावरण को शामिल किया गया है। इसका मतलब है कि सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराना सरकार की संवैधानिक जिम्मेदारी है। इसके बावजूद पेयजल की गुणवत्ता के मानकों का उल्लंघन होने पर शायद ही कभी नगर निकायों या अफसरों पर व्यक्तिगत जवाबदेही तय होती है। नागरिकों की शिकायतों को अक्सर “तकनीकी दिक्कत” कहकर टाला जाता है। अदालतों ने अनेक मामलों में दूषित जल को मूल अधिकार के हनन के रूप में माना है लेकिन जमीनी स्तर पर इन निर्णयों को प्रशासनिक सुधारों में बदलने की रफ्तार बेहद धीमी है।
दूषित पेयजल का असर केवल कुछ दिनों के दस्त या बुखार तक सीमित नहीं रहता। बच्चों में लगातार संक्रमण से कुपोषण, बीमारी और लंबी उम्र तक कमजोर रोग प्रतिरोधक क्षमता जैसे प्रभाव पड़ते हैं। बुजुर्गों और गर्भवती महिलाओं में निर्जलीकरण, गुर्दे की समस्या और रक्तचाप में अस्थिरता जैसे खतरे बढ़ जाते हैं। जहां रसायन‑प्रदूषण (जैसे फ्लोराइड, आर्सेनिक, नाइट्रेट आदि) की भी समस्या है, वहां हड्डियों की बीमारी, दांतों की क्षति, त्वचा रोग, कैंसर और तंत्रिका तंत्र पर प्रभाव जैसे गंभीर दुष्परिणाम सामने आते हैं।
इस संकट से निपटने के लिए मौजूदा पाइपलाइन नेटवर्क की सुनियोजित निगरानी और मरम्मत जरूरी है। जहां जरूरत हो, वहां पाइपलाइनों को बदलना आवश्यक है। हर शहर और कस्बे में पेयजल पाइपलाइन का डिजिटल मानचित्र तैयार हो, जिसमें पाइपलाइन डालने का वर्ष, सामग्री, रिसाव के पुराने बिंदु और जोखिम क्षेत्रों की जानकारी दर्ज हो। जर्जर और सीवर के समानांतर चल रही लाइनों को प्राथमिकता से बदलने की योजना बनाई जाए।
हर वार्ड या मोहल्ले से निश्चित अंतराल पर जल नमूने लेकर बैक्टीरिया, रसायन और गंध—रंग आदि की जांच अनिवार्य की जाए। रिपोर्टें ऑनलाइन पोर्टल और नोटिस बोर्डों पर सार्वजनिक हों। लीकेज या दूषित पानी की शिकायतों के समाधान के लिए निश्चित समय सीमा तय हो। देरी पर जिम्मेदार अधिकारी और ठेकेदार पर दंड का प्रावधान हो। जहां‑जहां पाइपलाइन टूटने या दूषित जल से बीमारी या मौत होती है, वहां मुआवजे के साथ‑साथ दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए।
नई सड़क, मेट्रो, केबल या सीवर परियोजनाओं से पहले जल‑विभाग की पूर्वानुमति और तकनीकी निगरानी अनिवार्य हो ताकि खुदाई से पाइपलाइन क्षतिग्रस्त न हों। जल, सीवर, सॉलिड वेस्ट और सड़क‑विकास विभागों के बीच साझा प्लानिंग और डेटा‑शेयरिंग की व्यवस्था पर ध्यान देना आवश्यक है।
मोहल्ला स्तर पर “जल सुरक्षा समितियां” बनाई जा सकती हैं, जिनमें नागरिक प्रतिनिधि, स्थानीय पार्षद और तकनीकी कर्मचारी मिलकर नियमित निरीक्षण और शिकायतों की निगरानी करें। स्कूलों, कॉलेजों और सामाजिक संगठनों के माध्यम से लोगों को सिखाया जाए कि रंग, गंध, स्वाद में मामूली बदलाव भी चेतावनी हो सकता है और ऐसे समय तुरंत परीक्षण की व्यवस्था होनी चाहिए।
इंदौर की घटना पूरे जल आपूर्ति तंत्र की विफलता को उजागर करती हैं। कमोबेश ऐसे हालात समूचे देश में हैं। जब नागरिक नल खोलते हैं तो उनके मन में यह संदेह नहीं होना चाहिए कि पानी उन्हें बीमार कर देगा। सुरक्षित पेयजल वह न्यूनतम सुविधा है जिसके बिना स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार और सम्मानजनक जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती। यह शर्म की बात है कि स्वच्छ भारत मिशन और जल जीवन मिशन के तहत हुई प्रगति के बावजूद, पानी से जुड़ी समस्याएं बरकरार हैं। दूषित जल के सेवन से लोगों की मौत तक हो रही है। अब समय आ गया है कि पेयजल पाइपलाइनों की देखरेख के मामले में लापरवाही को अपराध माना जाए। इसकी जिम्मेदारी तय करते हुए कड़ी सजा भी दी जाए। स्वच्छ जल की आपूर्ति सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए।
ज्ञान चंद पाटनी