राजेश जैन
उत्तर प्रदेश के बरेली में सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री का इस्तीफ़ा एक प्रशासनिक घटना भर नहीं है। यह उस गहरे असंतोष की सार्वजनिक अभिव्यक्ति है, जो विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के नए नियमों को लेकर देश के एक बड़े वर्ग में उभर रहा है। उन्होंने खुले तौर पर आरोप लगाया कि ये नियम सामान्य वर्ग विरोधी हैं और छात्रों को संभावित अपराधी बना देते हैं। इसके बाद सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आईं, करणी सेना जैसे संगठनों ने आंदोलन का ऐलान किया और बहस सीधे कैंपस से सड़कों तक पहुंच गई। ऐसे में सवाल उठता है-क्या यूजीसी सामाजिक न्याय की दिशा में ठोस कदम उठा रहा है या अनजाने में एक नया सामाजिक विभाजन खड़ा कर रहा है?
ये हैं यूजीसी के नए नियम
13 जनवरी 2026 को यूजीसी ने उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने संबंधी विनियम अधिसूचित किए। इसके तहत हर सरकारी और निजी विश्वविद्यालय या कॉलेज में ‘इक्विटी सेल’ और ‘इक्विटी कमेटी’ बनाना अनिवार्य कर दिया गया है। यह सेल भेदभाव से जुड़ी शिकायतों की सुनवाई करेगा और समिति की सिफारिश पर संस्थान को तुरंत कार्रवाई करनी होगी।
इन नियमों का घोषित उद्देश्य है-धर्म, जाति, लिंग, जन्म स्थान या विकलांगता के आधार पर किसी भी तरह का भेदभाव रोकना। खासतौर पर अनुसूचित जाति, जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग, आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग और दिव्यांग छात्रों को संरक्षण देना।
यहां तक सब ठीक लगता है। लेकिन विवाद तब शुरू हुआ, जब जाति आधारित भेदभाव की परिभाषा में ओबीसी वर्ग को भी जोड़ दिया गया। पहले ड्राफ्ट में यह सुरक्षा केवल एससी और एसटी तक सीमित थी। अब ओबीसी भी इसके दायरे में आ गए हैं। यानी शिकायत करने वालों की सूची बढ़ गई, लेकिन आरोप झेलने वालों की पहचान लगभग तय हो गई-सामान्य वर्ग।
इसलिए है विरोध
नए नियमों के खिलाफ उठ रही आवाज़ों की जड़ में तीन बड़े डर हैं। पहला-सामान्य वर्ग को ‘डिफॉल्ट आरोपी’ बना दिया गया है। अगर कोई एससी, एसटी या ओबीसी छात्र शिकायत करता है, तो व्यवहारिक रूप से सामने वाला अधिकतर जनरल कैटेगरी से ही होगा। विरोधियों का कहना है कि अस्पष्ट जांच प्रक्रिया के चलते झूठे आरोप भी करियर तबाह कर सकते हैं।
दूसरा-इक्विटी कमेटी में सामान्य वर्ग के प्रतिनिधित्व की कोई अनिवार्यता नहीं है। समिति में एससी, एसटी, ओबीसी, दिव्यांग और महिलाओं को शामिल करने की बात कही गई है, लेकिन जनरल कैटेगरी का कोई तय स्थान नहीं। इससे निष्पक्षता पर सवाल खड़े हो रहे हैं। आलोचकों का कहना है-जब फैसला सभी पर लागू होगा, तो प्रतिनिधित्व कुछ वर्गों तक सीमित क्यों?
तीसरा-भेदभाव की परिभाषा बेहद व्यापक रखी गई है। शब्द, व्यवहार और “अनुभूति” तक को शिकायत का आधार माना जा सकता है। ऐसे में झूठे मामलों का क्या होगा? दोष कैसे तय होगा? क्या सिर्फ महसूस करना भी अपराध की श्रेणी में आएगा? डर यह है कि इससे कैंपस में अविश्वास का माहौल बनेगा। छात्र खुलकर बात नहीं कर पाएंगे, शिक्षक संवाद से बचेंगे और शिक्षा का वातावरण डर-आधारित हो जाएगा।
सरकार का पक्ष: सुरक्षा जरूरी थी, राजनीति नहीं
सरकार और नियमों के समर्थक इस पूरी बहस को दूसरे नजरिए से देखते हैं। उनका कहना है कि यह फैसला शिक्षा संबंधी संसदीय समिति की सिफारिशों के बाद लिया गया, जिसमें बताया गया था कि ओबीसी छात्रों को भी कई संस्थानों में सामाजिक बहिष्कार, पक्षपात और मानसिक दबाव झेलना पड़ता है। इसलिए उन्हें भी संरक्षण देना जरूरी था। सरकार का दावा है कि यह नियम सिर्फ एससी, एसटी और ओबीसी के लिए नहीं, बल्कि सवर्णों पर भी समान रूप से लागू होगा। संविधान का अनुच्छेद 14 सभी को बराबरी का अधिकार देता है। साथ ही सामान्य वर्ग के गरीबों को 10 प्रतिशत ईडब्ल्यूएस आरक्षण पहले ही मिल चुका है। समर्थकों का तर्क है कि इसका मकसद किसी को फंसाना नहीं, बल्कि कमजोर छात्रों को आवाज देना है। पिछले वर्षों में कैंपस आत्महत्याओं ने सिस्टम की संवेदनहीनता उजागर की है। यह नियम दंडात्मक नहीं, बल्कि रोकथाम का ढांचा तैयार करता है।
असली सवाल: क्या समानता चयनात्मक हो सकती है?
यहीं यह बहस अपने मूल बिंदु पर आकर ठहरती है। अगर उद्देश्य समानता है, तो नियम सभी छात्रों के लिए समान क्यों नहीं? अगर भेदभाव गलत है, तो संरक्षण भी सार्वभौमिक क्यों नहीं? शिकायतकर्ता की पहचान तय क्यों, आरोपी की नहीं? प्रतिनिधित्व एकतरफा क्यों?
समस्या नीयत में नहीं, ढांचे में दिखती है। बेहतर होता कि यूजीसी- इक्विटी कमेटी में जनरल कैटेगरी का प्रतिनिधि भी अनिवार्य करता, झूठी शिकायतों पर स्पष्ट दंड तय करता, जांच प्रक्रिया को समयबद्ध और पारदर्शी बनाता, भेदभाव की परिभाषा को प्रमाण-आधारित करता, और सबसे अहम—हर छात्र को बराबर सुरक्षा देता।
जरूरी था कानून से पहले संवाद
यूजीसी की मंशा सराहनीय है-कैंपस को सुरक्षित और समावेशी बनाना। लेकिन जिस तरीके से यह अधिसूचना लाई गई, उसने समाज के एक हिस्से को यह महसूस करा दिया कि वह अब संदेह के घेरे में है। शिक्षा व्यवस्था का काम पुल बनाना होता है, दीवारें खड़ी करना नहीं। आज देश को वर्ग आधारित टकराव नहीं, संतुलित सुधार चाहिए। अगर यूजीसी सच में समानता चाहता है, तो उसे नियमों में भी वही समानता दिखानी होगी। वरना यह अधिसूचना सामाजिक न्याय का माध्यम बनने के बजाय शिक्षा व्यवस्था में एक नया सामाजिक तनाव पैदा कर सकती है।
राजेश जैन