गाँव की फिक्र किसी को नहीं

डॉ0 आशीष वशिष्ठ

देश की लगभग 65 फीसदी आबादी गांवों में निवास करती है। गांधी जी भी कहा करते थे कि भारत की आत्मा गांवों में निवास करती है। दुर्भाग्य से आजादी के 64 सालों बाद भी गांवों की स्थिति दयनीय बनी हुई है। सरकार और सरकारी मशीनरी शहरों को चमकाने और आधुनिक बनाने में मगन है। गांव और ग्रामीण विकास सरकारी एजेंडे और बजट में शामिल तो है लेकिन केवल लूटपाट और विदेशों से चंदा बटोरने के लिए। इस सच्चाई से इंकार नहीं किया जा सकता है कि करोड़ों-अरबों खर्च करने के बाद भी हमारे गांव आज भी सड़क, नाली, खडंजे, शौचालयों, स्ट्रीट लाइट, स्कूल और चिकित्सा सुविधाओं के अभाव में जीवन बसर करने का मजबूर हैं। गांवों के विकास के नाम पर जो सरकारी नौटंकी और स्वांग रचाया जा रहा है उसने गांवों की दशा और दिशा को बिगाड़ दिया है। हमारे महानगर जितने चकाचैंधमय हैं, गांव उतने ही पिछड़े हुए हैं। आज विश्व अन्तरिक्ष युग में विचरण कर रहा है और हमारे गांव उसी छकड़ा-युग में जीने को विवश हैं। कारण यह है कि हमारे राजनेताओं ने आज तक गावों के विकास के लिए गम्भीर प्रयास नहीं किए हैं।

 

गांवों में अभाव-ही-अभाव है। गांवो मे तो पक्के मार्ग हैं, न पीने का जल है और न ही आधुनिक सुविधाएं। शिक्षा, चिकित्सा, बाजार जैसी मूलभूत सुविधाएं भी गांवों से कोसों दूर हैं। परिणामस्वरूप गांवों में रहना आनन्द का विषय नहीं, बल्कि एक विवशता हो गई है। वर्षा के दिनों में पूरे-के-पूरे गावं कई बार दूसरे नगरों से कट जाते हैं। रास्ते कीचड़ ओर गारे से भर जाते हैं। कुटीर उद्योग-धंधे, कारीगरी और परंपरागत रोजगार दिनों-दिन खत्म होने की कगार पर पहुंच चुके हैं। वहीं कृषि और उससे जुड़े तमाम दूसरे काम-धंधों की बढ़ती लागत और कम मुनाफे के कारण धीरे-धीरे खेती-किसानी से लोगों का मोह भंग हो रहा है। परिणामस्वरूप बेरोजगारी का आंकड़ा सुरसा के मुंह की तरह फैलता जा रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार उपलब्ध कराने के लिए चल रही सरकारी योजनाओं में खुली लूट और धांधली से जरूरतमंदों का उनके हक का पैसा नहीं मिल पा रहा है। रोजगार और बेहतर नागरिक सुवधिाओं की चाहत में गांवों की आबादी का शहरों की ओर पलायन हो रहा है। सरकारी कागजों में तो गांवों के विकास, कल्याण और उत्थान के लिए लंबी-चैड़ी योजनाएं बन और लागू हो रही हैं, लेकिन जमीनी हकीकत काफी जुदा और भयावह तस्वीर पेश करती है।

 

असलियत यह है कि आजादी के बाद से गांवों के विकास के लिए कभी भी गंभीर प्रयास नहीं किये गये हैं। गांवों की तबाही की कीमत पर बड़े शहरों और मेट्रो सिटिज की नींव रखी जा रही है। तेजी से फैलते शहरों और बढ़ती आबादी की आवास, मनोरंजन, स्वास्थ्य, बिजली, पानी और तमाम दूसरी सुविधाएं मुहैया कराने की खातिर खेती योग्य भूमि और प्राकृतिक संसाधनों को जमकर शोषण किया जा रहा है। गांवों और ग्रामवासियों के लिए सोचा और बोला तो बहुत कुछ जाता है लेकिन आजादी के छह दशकों में गांवों के समग्र विकास की दशा में गंभीर प्रयास नहीं हुए हैं। महानगरों, बड़े शहरों के किनारे या आस-पास बसे गांवों की बात अगर छोड़ दी जाए तो देश के हजारों गांवों में बिजली, पानी और शौचालय जैसी बुनियादी सुविधाएं पहुंच नहीं पाई हैं। स्कूल, चिकित्सालय, पशु अस्पताल, मनोरंजन के साधन आदि के बारे में सोचना भी बेमानी है। हकीकत यह है कि आज भी गांवों को छोटी-छोटी सुविधाओं और जरूरतों के लिए शहरों का मुंह देखना पड़ता है। आंकड़ें गवाह हैं कि गांवों में निरक्षरता, बेरोजगारी, चिकित्सा सुविधा के अभाव में मौत, जज्चा-बच्चा का गिरती सेहत और मृत्यु का ग्राफ, कर्ज का बढ़ता बोझ, गरीबी का दुष्चक्र और निर्धनता का आंकड़ा बड़ी तेजी से बढ़ रहा है। और विडंबना यह है कि सब कुछ जानते बूझते हुए भी सरकारी अमला गांवों का रूख करने को तैयार नहीं है। सरकारी मशीनरी का पूरा जोर फर्जी आंकड़ेबाजी और फाइलों का पेट भरने तक ही सीमित दिखाई देता है।

 

गांवों में शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार का स्तर काफी निचले पायदान पर है। ग्रामीण क्षेत्रों में तैनात सरकारी अधिकारी और कर्मचारी गांवों का रूख ही नहीं करते हैं। तमाम बार आला अधिकारियों के औचक निरीक्षण के दौरान सरकारी डाक्टर, टीचर और दूसरे कर्मचारी अनुपस्थित पाये जाने के बावजूद गांवों में जाने को कोई तैयार नहीं होता है। सरकारी अधिकारी और कर्मचारी आज भी गांव की पोस्टिंग को सजा की तरह ही काटते हैं। सरकारी अमले की बेरूखी के कारण लाखों-करोरों खर्च करने के बावजूद भी गांवों का समुचित विकास और कल्याण नहीं हो पाता है। भ्रष्ट और चालाक सरकारी मशीनरी गांवों के लिए आवंटित धन की बंदरबांट और कमीषनखोरी में ही व्यस्त रहती है। मनरेगा और ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन में जो खुली लूट देश में जारी है उसकी हकीकत किसी से छिपी नहीं है। सरकारी अमला ग्रामीणों की अनपढ़ता, भोलेपन का जमकर दुरूपयोग करता है। वहीं पंचायत सदस्यों का कम पढ़ा लिखा होना और सरकारी भ्रष्टाचार में लिप्त होना भी समस्या को बढ़ाता है।

 

गौरतलब है कि गांवों में प्रतिभा, साधन और संसाधन प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं, बावजूद इसके हमारे गांव और ग्रामवासी बदहाली की जिंदगी जीने को मजबूर हैं। असल में हमारे तथाकथित नेताओं और प्रतिनिधियों ने ग्रामीणों को बहला-फुसला कर, जात-पात के झगड़े-टंटे में फंसाकर और क्षेत्रवाद की दुहाई देकर उनका वोट तो हासिल किया लेकिन विकास और कल्याण के नाम पर हर बार आश्वासनों का लोलिपोप ही थमाया। देश का बड़े से बड़ा नेता गांव के दम पर ही दिल्ली में फाइव स्टार मजे लूटता है। बावूजद इसके वही नेता एक बार चुनाव जीतने के बाद अगले पांच साल तक वहीं गांव का रूख नहीं करता है। नेता नगरी के कारनामों और साजिशो के कारण गांव में तनाव, वैमनस्य और प्रतिस्पर्धा का बोलबाला है। छोटी-छोटी बातों और झगड़ों पर बात पुलिस, कोर्ट-कचहरी तक पहुंचना आम बात हो चली है। गांवों में शराब और नशे के तमाम दूसरे साधनों की सुगम उपलब्धता ने खासकर युवा पीढ़ी को बर्बादी के रास्ते पर ला दिया है। ग्रामीण युवक खेती की बजाए जमीन बेचकर ऐशो-आराम की जिंदगी बसर करने की बीमारी का शिकार हो रहे हैं। वहीं जमीन अधिग्रहण की सरकारी कुनीति ने भी किसानों को बर्बादी के रास्ते पर ढकेला है।

 

तमाम तकनीकी विकास और आर्थिक उन्नति के बाद भी गांव शहरों पर आश्रित है। शहरों में बड़े-बड़े कार्यालय, उद्योग और धन्धे केन्द्रित हैं। यहां तक कि कृषि उपयोगी बीज, यन्त्र, खाद, दवाई आदि के लिए भी शहरों पर निर्भर रहना पड़ता है। लघु एवं कुटीर उद्योग भी साधनों के द्वारा शहरों का मुंह जोहते हैं। यहां तक कि झगड़ों को निपटाने के लिए कचहरियां भी गांवों में नहीं हैं। इन सब अभावों ने गांवों की दशा को दयनीय बना दिया है। प्रष्न यह है कि इन समस्याओं का समाधान कैसे हो? गांव सचमुच में स्वर्ग कैसे बनें? इसका एक ही उत्तर है-विकास की धुरी गांवों को बनाना? ग्रामीण क्षेत्रों में बड़े-बड़े चिकित्सालय, मनोरंजन-स्थल, श्रेष्ठ विद्यालय, समृद्व बाजार और उद्योग खोले जाएं ग्रामीण लोगों को जन्म, शिक्षा, चिकित्सा तथा आजीविका की सुविधाएं गांवों में ही उपलब्ध कराई जाएं। समूचे देश की विकास राषि का एक बड़ा भाग गांवों के विकास पर खर्च किया जाए। सड़कें, टेलीफोन, रेलगाड़ी आदि का सम्पर्क-सूत्र बढ़ाया जाए। बड़े-बड़े उद्योग पिछड़े ग्रामीण क्षेत्रों में खोले जाएं। असल में शहरों की सूंदरता, प्रगति और विकास और खुशहाली में बदहाल, बदबूदार गांवा बड़ी भूमिका निभाते हैं, वही देश के सामाजिक ढांचे, अर्थव्यवस्था और राजनीति को भी गाँव स्थायित्व प्रदान करते हैं। जैसे एक लड़की को शिक्षित करने का अर्थ कई लोगों को शिक्षित होना माना जाता है उसी तरह एक गांव का विकास देश के समुचित और समग्र विकास की संकल्पना को साकार करता है।

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