नहीं बूंद भर पानी

दादा कहते हाती डुब्बन, जल होता था नदियों में|

कहीं कहीं तो मगरमच्छ का ,डर होता था नदियों में|

डुबकी जब गहरे में लेते ,थाह नहीं मिल पाती थी|

बड़े बड़े मेंढक कछुओं का, डर होता था नदियों में|

बीच में गहरी चट्टानों के, फँस जाने का डर होता|

खून से लथपथ तैराकों का, डर होता था नदियों में|

गरमी में भी मटका लेकर, दादी जल भर लाती थी|

बारहों महिने जब पानी, झर झर होता था नदियों में|

सुबह सुबह ही रोज नहाकर, सूरज को अरगा देते|

वैदिक मंत्रों से स्वागत, जी भर होता था नदियों में|

भले नारियां तीरों पर, पानी में छप छप करतीं हों|

नदी पार कर जाने वाला, नर होता था नदियों में|

अब तो नदी घाट सब सूने, नहीं बूँद भर पानी है|

पहले जी भर के पानी, क्योंकर होता था नदियों में?

पर्यावरण प्रदूषण क्या है, नही‍ म् जानता था कोई|

इस कारण ही हर हर का, स्वर होता था नदियों में|

 

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प्रभुदयाल श्रीवास्तव
लेखन विगत दो दशकों से अधिक समय से कहानी,कवितायें व्यंग्य ,लघु कथाएं लेख, बुंदेली लोकगीत,बुंदेली लघु कथाए,बुंदेली गज़लों का लेखन प्रकाशन लोकमत समाचार नागपुर में तीन वर्षों तक व्यंग्य स्तंभ तीर तुक्का, रंग बेरंग में प्रकाशन,दैनिक भास्कर ,नवभारत,अमृत संदेश, जबलपुर एक्सप्रेस,पंजाब केसरी,एवं देश के लगभग सभी हिंदी समाचार पत्रों में व्यंग्योँ का प्रकाशन, कविताएं बालगीतों क्षणिकांओं का भी प्रकाशन हुआ|पत्रिकाओं हम सब साथ साथ दिल्ली,शुभ तारिका अंबाला,न्यामती फरीदाबाद ,कादंबिनी दिल्ली बाईसा उज्जैन मसी कागद इत्यादि में कई रचनाएं प्रकाशित|

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