कमलेश पांडेय
भारत की सियासत में भले ही हिन्दू-मुसलमान एक-दूसरे के विपरीत ध्रुव समझे जाते हों लेकिन वैश्विक दुनियादारी में वे परस्पर पूरक बनते जा रहे हैं। ऐसा इसलिए कि अरब जगत पर कसते अमेरिकी-चीनी शिकंजे के दृष्टिगत पश्चिम और मध्य एशियाई देशों की भलाई इसी में निहित है कि वे सभी 22 देश भारत-रूस और यूरोपीय देशों को साध कर चलें, ताकि कोई एक महाशक्ति या उनका दूसरा प्रतिद्वंद्वी देश मनमाफिक इनका दोहन-शोषण नहीं कर पाए। कूटनीतिक बिसात पर भारत का महत्व सभी देशों के लिए बढ़ता जा रहा है। अमेरिका, चीन, रूस के समानांतर भारत एक मजबूत और अविवादित कूटनीतिक हस्ती के रूप में उभरा है, जिसकी सोच में वैश्विक प्रेम और पारस्परिक सद्भाव की भावना अंतर्निहित है।
यही वजह है कि भारत की राजधानी नई दिल्ली में गत 31 जनवरी 2026 को लगभग एक दशक के अंतराल के बाद भारत-अरब लीग के विदेश मंत्रियों की दूसरी बैठक आयोजित हुई, जो भारत-अरब संबंधों को मजबूत करने का महत्वपूर्ण कदम साबित होगी। खासकर जब ईरान पर अमेरिकी आक्रामक दवाब बढ़ रहा हो और इजरायल व अरब देशों में कूटनीतिक अविश्वास बढ़ता जा रहा हो, ऐसे में भारत और 22 अरब देशों के विदेश मंत्रियों या उनके समकक्षों की मुलाकात खास महत्व रखती है। वो भी तब जब भारत विरोधी पाकिस्तान, इस्लामिक नाटो बनाने पर आमादा दिख रहा हो और अरब के रक्तचूषकों के हाथ की कठपुतली बनता प्रतीत हो रहा हो।
लिहाजा, लगभग एक दशक के अंतराल के बाद हुई इस दूसरी बैठक ने कूटनीतिक और राजनीतिक दोनों स्तरों पर गहरे निहितार्थ बताए जाते हैं। जहां तक कूटनीतिक महत्व की बात है तो यह बैठक भारत और 22 अरब लीग सदस्य देशों के बीच सह-अध्यक्षता में संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के साथ हुई, जिसमें अर्थव्यवस्था, ऊर्जा, शिक्षा, मीडिया और संस्कृति जैसे पांच प्रमुख क्षेत्रों पर सहयोग बढ़ाने का रोडमैप तैयार किया गया। साथ ही अमेरिकी-इजयरली वर्चस्व वाले गाजा पट्टी के पुनर्निर्माण, यमन-सूडान-लीबिया जैसे क्षेत्रीय संघर्षों और अमेरिका के ‘बोर्ड ऑफ पीस’ प्रस्ताव पर चर्चा से भारत ने मध्य-पूर्व में संतुलित मध्यस्थ की भूमिका निभाई। अरब लीग महासचिव अहमद अबुल घीत और पीएम मोदी की मुलाकातों ने इसे और मजबूत बनाया।
जहां तक इस बैठक के राजनीतिक निहितार्थ की बात है तो टैरिफ संकट और सऊदी-यूएई के यमन विवाद के बीच यह बैठक भारत को वैश्विक कूटनीतिक केंद्र के रूप में स्थापित करती है, और भारत के धुर विरोधी समझे जाने वाले पाकिस्तान की मुस्लिम देशों को एकजुट करने की कोशिशों का कड़ा मुकाबला करती हुई प्रतीत होती है। वहीं, सीरिया जैसे देशों के मंत्रियों की संभावित भागीदारी से भारत ने एचटीएस (HTS) सरकार के बाद पहली मंत्री-स्तरीय बातचीत का रास्ता खोला। कुल मिलाकर, यह भारत की ‘मल्टी-अलाइनमेंट’ नीति को मजबूत करती है, जहां ऊर्जा सुरक्षा और व्यापार के साथ शांति पहल पर जोर दिया गया।
उल्लेखनीय है कि भारत-अरब लीग के विदेश मंत्रियों की पहली बैठक 2016 में बहरीन में आयोजित हुई थी। तब यह बैठक भारत और अरब लीग के 22 सदस्य देशों के बीच सहयोग के पांच प्रमुख क्षेत्रों—अर्थव्यवस्था, ऊर्जा, शिक्षा, मीडिया और संस्कृति—पर केंद्रित थी, जहां साझा परियोजनाओं का रोडमैप तैयार किया गया था। जो लगभग 10 वर्ष बाद गत 31 जनवरी 2026 को नई दिल्ली में हुई दूसरी बैठक का आधार बनी।
जहां तक इन बैठकों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि की बात है तो भारत-अरब लीग संबंध मार्च 2002 में औपचारिक MoU से शुरू हुए, जिसे 2008 में सहयोग मंच के रूप में मजबूत किया गया और 2013 में संशोधित किया गया। वहीं बहरीन बैठक ने इन संबंधों को संस्थागत गहराई प्रदान की।
पहली भारत-अरब विदेश मंत्रियों की बैठक 2016 में बहरीन में हुई थी, जबकि दूसरी बैठक 31 जनवरी 2026 को नई दिल्ली में संपन्न हुई। इसमें 22 अरब लीग सदस्य देशों के विदेश मंत्री या वरिष्ठ प्रतिनिधि नई दिल्ली पहुंचे, जिनमें ओमान के विदेश मंत्री बदर अल-बुसैदी का नाम स्पष्ट रूप से उल्लेखित है। वहीं लीबिया, मिस्र, सूडान और सोमालिया जैसे देशों के विदेश मंत्री भी इस सम्मेलन में शामिल हुए। भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने कई अरब देशों के समकक्षों के साथ द्विपक्षीय बैठकें कीं, जबकि अरब लीग महासचिव अहमद अबुल भी उपस्थित रहे। सभी 22 देशों के प्रतिनिधियों ने पीएम मोदी से भी मुलाकात की।
समझा जाता है कि भारत-यूरोपीय संघ के बढ़ते कारोबारी सम्बन्धों, भारत-चीन की कारोबारी लुकाछिपी, भारत-अमेरिका के जटिल सम्बन्धों और भारत-रूस के भरोसेमंद सम्बन्धों का संतुलित फायदा उठाने के लिए अरब देशों को भारत का तहेदिल से साथ चाहिए, जो उन्हें मिलता आया है। वहीं, भारत-यूरोप के बीच बढ़ती कारोबारी भागीदारी के दृष्टिगत अरब लीग के सदस्य देशों का आर्थिक व सामरिक महत्व बढ़ा है। इसलिए दोनों ओर से पाकिस्तान और पाकिस्तानी पिट्ठुओं को दरकिनार करते हुए आगे बढ़ने का जो रणनीतिक फैसला हुआ बताया जाता है, उसी में सबका हित अंतर्निहित है।
कमलेश पांडेय