कमलेश पांडेय
विभिन्न तरह के पारस्परिक विरोधाभासों से जूझ रहे भारतीय गणतंत्र के लिए ‘एक भारत, एक कानून’ की अवधारणा बदलते वक्त की मांग है। इसलिए इसको सरजमीं पर उतरना बेहद जरूरी है। सवाल है कि जब एक मतदाता, एक वोट का विधान सफल हो सकता है तो फिर एक भारत, एक कानून का विधान क्यों नहीं? इस बात में कोई दो राय नहीं कि ऐसी सकारात्मक कोशिशें अंततोगत्वा समतामूलक समाज की दिशा में निर्णायक साबित हो सकते हैं।
लिहाजा यदि भारतीय संविधान के संघीय ढांचे और अन्यान्य विविधताओं को बनाए रखने वाले नानाविध प्रावधानों से ‘एक देश, एक कानून’ की पावन और समदर्शी सोच टकराती है तो ऐसे किसी भी टकराव को नजरअंदाज कीजिए और एक समान नागरिक संहिता (UCC) या एकसमान कानूनी व्यवस्था की दिशा में एक यथार्थपरक व्यवहारिक कदम उठाइए। इससे दलित, आदिवासी, ओबीसी, अल्पसंख्यक, सवर्ण जैसे निरर्थक भेद भी मिटेंगे और राष्ट्र को अप्रत्याशित मजबूती मिलेगी।
यह ठीक है कि इस राह में कई संरचनात्मक बाधाएं हैं लेकिन राष्ट्र के दूरगामी भविष्य के लिए इन कपोलकल्पित बाधाओं, वैधानिक जटिलताओं से निबटना भी तो सकारात्मक और आशावादी नेतृत्व की पहचान होती है। खासकर मोदी हैं तो मुमकिन है, वाली सोच यहां भी चरितार्थ की जा सकती है। योगी हैं तो यकीन भी किया जा सकता है। शाह हैं तो चिल्लपों भी नहीं मचेगा, ऐसा जनविश्वास है।
जहां तक संघीय ढांचे की चुनौतियों की बात है तो भारतीय संविधान की सातवीं अनुसूची में विधायी शक्तियों का त्रिपक्षीय विभाजन (केंद्र, राज्य, समवर्ती) एक देश, एक कानून की राह का एक बड़ा रोड़ा समझा जाता है। उदाहरणतया पुलिस, सार्वजनिक व्यवस्था और भूमि जैसे विषय राज्य सूची में हैं, जिनमें केंद्र का सीधा हस्तक्षेप संभव नहीं होगा बिना संशोधन के क्योंकि संविधान का अनुच्छेद 246 इस विभाजन को मजबूत बनाता है जो एकसमान कानून लागू करने में राज्यों की सहमति या संविधान संशोधन की मांग करता है।
वहीं, मौलिक अधिकारों का टकराव भी संभाव्य है क्योंकि संविधान के अनुच्छेद 25-28 धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी देते हैं, जो व्यक्तिगत कानूनों (पर्सनल लॉ) को संरक्षण प्रदान करते हैं। वहीं, यूनिफॉर्म सिविल कोड को अनुच्छेद 44 के नीति-निर्देशक तत्व के रूप में रखा गया है लेकिन यह बाध्यकारी नहीं है और मौलिक अधिकारों से टकरा सकता है। यही वजह है कि सर्वोच्च न्यायालय ने इसे लागू करने पर जोर दिया है (जैसे शाह बानो मामले में) लेकिन संघीय विविधता और अल्पसंख्यक अधिकारों के नाम पर राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी इस राह की सबसे बड़ी बाधा बनी हुई है,
वहीं व्यावहारिक और न्यायिक अड़चनों की बात भी महत्वपूर्ण है क्योंकि एकीकृत न्यायपालिका (अनुच्छेद 214) होने के बावजूद, राज्यों में उच्च न्यायालयों की स्वायत्तता और लंबित मामलों (5 करोड़ से अधिक) की भारी संख्या एकसमान कानून के कार्यान्वयन को जटिल बनाती है। इसके अलावा, संविधान के अनुच्छेद 368 के तहत संशोधन की प्रक्रिया में राज्यों की सहमति जरूरी हो सकती है जो राजनीतिक मतभेदों से अवरुद्ध रहती है।
जहां तक संभावित प्रभाव की बात है तो ये अड़चनें वास्तव में संविधान की विविधता-समर्थक भावना को दर्शाती हैं जो एकता के साथ बहुलवाद को संतुलित रखती हैं। हालांकि, डिजिटल युग में एकसमान कानून आर्थिक एकीकरण को बढ़ावा दे सकता है, लेकिन बिना व्यापक सहमति के यह संघीय तनाव भी पैदा कर सकता है। इसलिए केंद्र सरकार और उसकी राज्य सरकारों को इस बाबत आम सहमति तैयार करने की कोशिश करनी चाहिए, क्योंकि एक भारत, एक कानून में ही न केवल देश बल्कि दुनिया का भी हित निहित, अंतर्निहित है।
देखा जाए तो समान नागरिक संहिता, भारतीय संविधान की मौलिक व्यवस्था पर ज्यादातर सकारात्मक प्रभाव डाल सकती है, खासकर समानता के अधिकार को मजबूत करके, लेकिन धार्मिक स्वतंत्रता जैसे क्षेत्रों में यह टकराव पैदा कर सकती है हालांकि, धर्म के आधार पर बंटवारे के बाद यह कोई बड़ा मुद्दा नहीं है बल्कि राजनीतिक कमजोरी का प्रतीक है। यह ठीक है कि संविधान के अनुच्छेद 44 के तहत यह नीति-निर्देशक सिद्धांत राज्य को एकसमान नागरिक कानून बनाने का प्रयास करने को कहता है जो मौलिक अधिकारों से जुड़ता है।
जहां तक समानता अधिकारों पर प्रभाव की बात है तो यूसीसी संवैधानिक अनुच्छेद 14 (विधि के समक्ष समानता) और 15 (भेदभाव निषेध) को मजबूत बनाएगा क्योंकि यह धर्म-आधारित व्यक्तिगत कानूनों को हटाकर लैंगिक न्याय सुनिश्चित करेगा। इसी के द्वारा तीन तलाक, असमान उत्तराधिकार जैसे मुद्दों का सम्यक समाधान हो सकता है, जो महिलाओं के अनुच्छेद 21 (जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार) को प्रभावित करते हैं हालांकि, यदि गलत तरीके से लागू हुआ तो यह अल्पसंख्यकों के बीच भेदभाव का आरोप लगा सकता है।
जहां तक धार्मिक स्वतंत्रता पर प्रभाव की बात है तो अनुच्छेद 25-28 धार्मिक स्वतंत्रता और प्रबंधन का अधिकार देते हैं जो यूसीसी से टकरा सकता है क्योंकि व्यक्तिगत कानून सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा हैं। भले ही सर्वोच्च न्यायालय ने शाह बानो और सारला मुद्गल मामलों में यूसीसी की आवश्यकता बताई लेकिन इसे मौलिक अधिकारों का उल्लंघन न मानते हुए संतुलित किया। फिर भी जनजातीय रीति-रिवाजों वाली समुदायों पर भी इसका नकारात्मक असर पड़ सकता है।
जहां तक अन्य मौलिक प्रावधानों पर यूसीसी के प्रभाव की बात है तो यूसीसी संवैधानिक अनुच्छेद 21 को सशक्त बनाएगा क्योंकि यूसीसी पितृसत्तात्मक प्रथाओं को चुनौती देगा और न्याय प्रक्रिया को सरल करेगा लेकिन समवर्ती सूची के विषय होने से राज्य स्वायत्तता प्रभावित हो सकती है जो संघीय ढांचे से जुड़ी मौलिक भावना को कमजोर करेगी। कुल मिलाकर, यूसीसी मौलिक अधिकारों को आधुनिक संदर्भ दे सकता है यदि सहमति-आधारित हो तो।
यही वजह है कि भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने हाल के वर्षों में यूनिफॉर्म सिविल कोड पर स्पष्ट निर्देश देने से इनकार किया है बल्कि इसे संसद के क्षेत्राधिकार में माना है। भले ही कोर्ट ने कई ऐतिहासिक फैसलों में यूसीसी के सिद्धांत का समर्थन किया, लेकिन कार्यपालिका को ही इसकी जिम्मेदारी सौंपी। जहां तक कोर्ट के रुख की बात है तो सुप्रीम कोर्ट ने 2023 और 2024 में यूसीसी लागू करने की मांग वाली याचिकाओं को खारिज कर दिया, क्योंकि यह विधायी मामला है।
भारत के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश (CJI) डीवाई चंद्रचूड़ ने मार्च 2023 में छह याचिकाओं को निस्तारित करते हुए कहा कि यूसीसी संसद बनाएगी। इससे पहले आये निम्नलिखित प्रमुख फैसले में भी यूसीसी की चर्चा है। शाह बानो (1985), सरला मुदगल (1995), और जॉन वल्लामट्टम (1997) जैसे मामलों में कोर्ट ने यूसीसी की आवश्यकता पर बल दिया लेकिन निर्देश नहीं दिए। इसी प्रकार जनवरी 2023 में उत्तराखंड यूसीसी समिति को चुनौती देने वाली याचिकाएं भी खारिज हुईं।
जहां तक वर्तमान स्थिति की बात है तो जनवरी 2026 तक कोई नया निर्देश नहीं आया क्योंकि कोर्ट यूसीसी को अनुच्छेद 44 के नीति-निर्देशक सिद्धांत के रूप में देखता है, लेकिन धार्मिक स्वतंत्रता के साथ संतुलन पर जोर देता है। यही वजह है कि भाजपा शासित उत्तराखंड सरकार ने 2024 में राज्य-स्तरीय यूसीसी लागू किया। समझा जा रहा है कि धीरे धीरे मोदी-शाह इसे पूरे देश में लागू करेंगे।
हालांकि इससे भी एक कदम आगे बढ़कर सभी जनहितकारी मामलों में यदि एक देश, एक कानून जैसे अग्रगामी प्रावधानों को लागू कर दिया जाता है तो विगत 100 सालों से अनवरत रूप से जारी फूट डालो, शासन करो की नीति का जड़मूल से खात्मा हो जाएगा। यद्यपि मुट्ठी भर चतुर सुजान विदेशी टुकड़े पर विरोध अवश्य करेंगे लेकिन जब केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह जम्मू-कश्मीर में धारा 370 हटवाकर एक विधान, एक निशान की राष्ट्रीय नीति लागू करवा सकते हैं तो उनके लिए एक देश, एक कानून को मूर्त रूप देना-दिलवाना कोई बड़ी बात नहीं है बशर्ते कि इस मुद्दे पर भाजपा और आरएसएस की नीति साफ और नीयत स्पष्ट हो।
कमलेश पांडेय