लेख

भारत रत्न के बनते ‘खुदरा बाजार’ से उठते सियासी सवाल?

कमलेश पांडेय

अपने चहेते नेताओं को देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ दिलवाने की जो होड़ नेताओं और समाजसेवियों में मची है, उससे इसकी प्रतिष्ठा पर आंच स्वाभाविक है। इसलिए सवाल उठता है कि आखिरकार देश के प्रधानमंत्री भारत रत्न जैसे प्रतिष्ठित पुरस्कार को ‘खुदरा बाजार’ क्यों बनने दे रहे हैं क्योंकि किसी को इसे देना या न देना उनका विवेकाधिकार/विशेषाधिकार समझा जाता है। इसलिए उनकी भूमिका पर सियासी सवाल उठना लाजिमी है और उनसे अपेक्षा की जाती है कि वो इसका राजनीतिक जवाब तो कतई नहीं दें!

कहना न होगा कि ‘भारत रत्न’ भारत वर्ष का सर्वोच्च नागरिक सम्मान है जिसे कला, साहित्य, विज्ञान, सार्वजनिक सेवा और अन्य क्षेत्रों में असाधारण योगदान के लिए दिया जाता है। इसकी स्थापना 2 जनवरी 1954 को राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद द्वारा की गई थी। इसलिए सियासी लाभ या तुष्टिकरण के लिए इसे प्रदान करने से इसकी राष्ट्रीय/अंतर्राष्ट्रीय गरिमा उसी प्रकार से घटेगी जैसे नोबल का शांति पुरस्कार पाने की सार्वजनिक ललक से अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंफ और इस पुरस्कार की घटी है क्योंकि इस हेतु चल रही लॉबिंग से पुरस्कारों की दुनिया उसी तरह से शर्मसार हुई है जैसे विश्वविद्यालय की प्रतिष्ठित पीएचडी की नियमित डिग्री के समानांतर मानद डिग्री देने के खुले कारोबार से ‘डॉ’ उपाधि की महत्ता शैक्षणिक व सामाजिक जगत में घटी है।

प्राप्त जानकारी के मुताबिक अब तक 53 व्यक्तियों को यह सम्मान मिल चुका है जिसमें अधिकांश राजनेता, वैज्ञानिक और समाजसेवी शामिल हैं। 1954 में प्रथम प्राप्तकर्ता सर्वपल्ली राधाकृष्णन और चक्रवर्ती राजगोपालाचारी जी रहे। शुरू में केवल जीवित व्यक्तियों को ही यह पुरस्कार मिलता था लेकिन 1955 से मरणोपरांत भी देने का प्रावधान जोड़ा गया। अन्य उल्लेखनीय प्राप्तकर्ताओं में  जवाहरलाल नेहरू (1955), पुरुषोत्तम दास टंडन (1961), इंदिरा गांधी (1971), वल्लभभाई पटेल (1991), गोविंद बल्लभ पंत (1957), मोरारजी देसाई (1991), जेआरडी टाटा (1992, एकमात्र व्यवसायी), गुलजारीलाल नंदा (1997),  अरुणा आसफ अली (1997), जयप्रकाश नारायण (1999), सचिन तेंदुलकर (2014, खेल क्षेत्र से पहला), अटल बिहारी बाजपेयी (2015), प्रणब मुखर्जी (2019 पूर्व राष्ट्रपति) 

लालकृष्ण आडवाणी (2024), पीवी नरसिम्हाराव (2024, मरणोपरांत), चौधरी चरण सिंह (2024, मरणोपरांत), कर्पूरी ठाकुर (2024, मरणोपरांत), एमएस स्वामीनाथन (2024) आदि शामिल हैं। 

इन 53 पुरस्कृत शख्सियत में से अधिकतर राजनीति और विज्ञान से जुड़े हैं जबकि एक खिलाड़ी और एक व्यवसायी को भी यह पुरस्कार दिया गया है। यह पुरस्‍कार 1954 से दिया जा रहा है। पहले यह अधिकतम तीन लोगों को दिया गया जबकि 1999 में अधिकतम चार लोगों और 2024 में अधिकतम पांच लोगों को दिया जा चुका है। इस प्रतिष्ठित पुरस्कार को लेकर वर्ष दर वर्ष उठती मांगें और उससे उतपन्न होने वाले सियासी, सामाजिक व सांप्रदायिक विवाद अब एक नया मोड़ ले चुके हैं और सवाल उठ रहा है कि आखिर इसे खुदरा बाजार क्यों बनने दिया जा रहा है?

ऐसा इसलिए कि विभिन्न राजनीतिक दलों और समर्थकों द्वारा पहले बाबा साहेब डॉ भीमराव अंबेडकर और फिर चौधरी चरण सिंह, लालकृष्ण आडवाणी, कर्पूरी ठाकुर और नरसिम्हा राव आदि के लिए जो मांगें उठाई गईं, वो धीरे धीरे पूरी हुई। यही वजह है कि हाल के वर्षों में नवीन पटनायक, नीतीश कुमार, लालू प्रसाद, मान्यवर कांशीराम, वीपी सिंह, श्रीकृष्ण सिंह समेत अन्य नेताओं व किसान नेताओं के लिए भी इसे प्रदान करने की व्यापक मांग उठ  रही है जिससे भारत रत्न जैसे भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान की गम्भीरता प्रभावित होती है क्योंकि यह पुरस्कार कला, साहित्य, विज्ञान, सार्वजनिक सेवा और अन्य क्षेत्रों में असाधारण योगदान वाले व्यक्तियों को दिया जाता है। यह अजीबोगरीब बात यह कि साल 1977 में समाजवादी-राष्ट्रवादी पृष्ठभूमि वाली जनता पार्टी सरकार ने जब इसे अस्थायी रूप से बंद कर दिया था तो अब इसी पृष्ठभूमि वाले राजनेताओं में इसे पाने को लेकर सर्वाधिक होड़ क्यों मची हुई है?

बता दें कि 1980 में कांग्रेस सरकार ने पुनः इस सर्वोच्च नागरिक सम्मान को प्रारम्भ किया। आमतौर पर इसे गणतंत्र दिवस (26 जनवरी) पर राष्ट्रपति द्वारा प्रदान किया जाता है जिसमें पदक और प्रमाण पत्र दिए जाते हैं। प्रति वर्ष अधिकतम तीन व्यक्तियों तक सीमित रहता है हालांकि कभी-कभी इससे अधिक घोषित होते हैं।

बता दें कि भारत रत्न के लिए चयन प्रक्रिया सरल लेकिन विशेष है जिसमें प्रधानमंत्री स्वयं नामों का चयन कर राष्ट्रपति को सिफारिश भेजते हैं। इसमें कोई औपचारिक नामांकन या समिति की आवश्यकता नहीं होती और जाति, लिंग या क्षेत्र के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जाता। जहां तक प्रमुख नियम की बात है तो प्रति वर्ष अधिकतम तीन व्यक्तियों को यह सम्मान दिया जा सकता है हालांकि कभी-कभी इससे अधिक घोषणा हो चुकी है। यह कला, विज्ञान, साहित्य, सार्वजनिक सेवा या किसी भी क्षेत्र में असाधारण योगदान के लिए प्रदान किया जाता है और मरणोपरांत भी दिया जा सकता है।

जहां तक इसके चयन प्रक्रिया की बात है तो प्रधानमंत्री खुद ही नाम तय करते हैं जो सीधे राष्ट्रपति को भेजा जाता है; हालांकि उनके मंत्रिमंडल सदस्य, मुख्यमंत्री या राज्यपाल भी उन्हें सुझाव दे सकते हैं जिसे मानना या न मानना उनके विवेक पर निर्भर करता है। मसलन, भारत रत्न के नाम प्रधानमंत्री द्वारा किसी औपचारिक समयबद्धता के बिना चुने जाते हैं, मुख्यतः उनके कार्यकाल के दौरान जब वे योग्य व्यक्ति के असाधारण योगदान पर विचार करते हैं। वे मंत्रिमंडल सदस्यों, राज्यपालों या मुख्यमंत्रियों से प्राप्त सिफारिशों पर प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) में विचार-विमर्श करते हैं। इसकी अधिसूचना राजपत्र में प्रकाशित होती है, और आमतौर पर गणतंत्र दिवस पर राष्ट्रपति द्वारा पदक व प्रमाण पत्र प्रदान किया जाता है। कोई नकद पुरस्कार नहीं दिया जाता।

जहां तक इसके चयन का तरीका की बात है तो प्रधानमंत्री स्वयं अंतिम नाम चुनते हैं और सीधे राष्ट्रपति को सिफारिश भेजते हैं, बिना किसी समिति या नामांकन प्रक्रिया के। राष्ट्रपति की स्वीकृति के बाद राजपत्र में अधिसूचना जारी होती है, और पुरस्कार गणतंत्र दिवस या स्वतंत्रता दिवस के आसपास प्रदान किया जाता है। जहां तक समय और उदाहरण की बात है कि चयन कब होता है, तो जान लीजिए कि इसका कोई निश्चित कैलेंडर नहीं होता और यह प्रधानमंत्री के विवेक पर निर्भर करता है जैसे 2024 में नरेंद्र मोदी सरकार ने जनवरी-फरवरी में ही पांच नाम घोषित किए थे। ऐतिहासिक रूप से, नेहरू को 1955 में स्वतंत्रता के बाद जल्दी चुना गया। इसी प्रकार की हड़बड़ाहट 1971 में इंदिरा गांधी ने भी दिखाई जबकि प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री, मोरारजी देसाई, चौधरी चरण सिंह, राजीव गांधी, वीपी सिंह, चंद्रशेखर, पीवी नरसिम्हा राव, एच डी देवगौड़ा, इंद्रकुमार गुजराल, अटलबिहारी बाजपेयी, डॉ मनमोहन सिंह, और नरेंद्र मोदी ऐसे प्रधानमंत्री बने जिन्होंने खुद ही अपने लिए भारत रत्न पुरस्कार की घोषणा नहीं की।

भारत रत्न की मांगें अक्सर राजनीतिक दलों द्वारा अपने नेताओं के लिए की जाती हैं, जो इसे सामान्य खुदरा बाजार की तरह प्रचारित लगने का कारण बनती हैं। यह सम्मान अब वोट बैंक साधने या सियासी प्रतिद्वंद्वियों को संन्यास की ओर धकेलने का हथियार बन गया है। लिहाजा राजनीतिक विश्लेषण में इसे ‘खुदरा बाजार’ की उपमा दी जाती है क्योंकि मांगें बार-बार और रणनीतिक रूप से उठाई जाती हैं, जैसे बाजार में सामान की लगातार प्रचार। जिस तरह से भारत रत्न को राजनीतिक उपकरण बनाने का चलन हाल के वर्षों में बढ़ा है, जहां सत्ता पक्ष पुरस्कार देकर वोटर आधार मजबूत करता है और विपक्ष मांग कर दबाव बनाता है। उदाहरणस्वरूप, कर्पूरी ठाकुर और चौधरी चरण सिंह को 2024 चुनाव से पहले पुरस्कार देकर भाजपा ने बिहार में सामाजिक न्याय की छवि बनाई। इसके चलते इसका राजनीतिकरण बढ़ा है और अब नवीन पटनायक,

नीतीश कुमार, लालू यादव जैसे नेताओं के लिए उठती मांगें भी इसी रणनीति का हिस्सा हैं जो पार्टी के भीतर विवाद पैदा करती हैं।

बिहार में हालिया उदाहरण यह सामने आया कि जनवरी 2026 में जदयू नेता केसी त्यागी ने नीतीश कुमार को भारत रत्न देने के लिए पीएम मोदी को पत्र लिखा, और उन्हें ‘समाजवादी आंदोलन का अनमोल रत्न’ बताया। हद तो यह कि जहां उनकी सहयोगी भाजपा ने समर्थन किया लेकिन जदयू और आरजेडी ने आलोचना की, इसे राजनीतिक संन्यास की चाल बताया। इससे पहले भी गिरिराज सिंह जैसे नेताओं ने ऐसी मांगें उठाईं ताकि नीतीश का राजनीतिक करियर समाप्त हो। इसलिए यहां पर 

भारत रत्न का ‘खुदरा बाजार’ की उपमा देने का स्पष्ट अर्थ है कि यह प्रासंगिक है क्योंकि मांगें सस्ती और बार-बार होती हैं जैसे खुदरा व्यापार में ग्राहक आकर्षित करने के लिए छूट। ऐसे में पुरस्कार अब असाधारण सेवा के बजाय सियासी लाभ का साधन लगता है, जो इसके मूल उद्देश्य को कमजोर करता है। विपक्ष इसे ‘चमकदार राजनीति का हथियार’ कहता है।

जानकर बताते हैं कि भारत रत्न पुरस्कार राजनीति के क्षेत्र में 1999 में सबसे अधिक दिए गए थे। उसी वर्ष अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने चार व्यक्तियों को यह सम्मान प्रदान किया जिसमें जयप्रकाश नारायण, अमर्त्य सेन, गोपीनाथ बोरदोलोई और रविशंकर महाराज। यह पुरस्कारों की सीमा (अधिकतम तीन) को तोड़ने वाला पहला वर्ष था

जबकि हालिया तुलना के मुताबिक 2024 में मोदी सरकार ने पांच भारत रत्न घोषित किए जिनमें अधिकांश राजनीतिज्ञ जैसे पीवी नरसिम्हा राव, चौधरी चरण सिंह, कर्पूरी ठाकुर और लालकृष्ण आडवाणी शामिल थे जो कुल संख्या में सर्वाधिक रहा हालांकि राजनीति-केंद्रित संख्या के संदर्भ में 1999 प्रमुख है।

कमलेश पांडेय