राजेश कुमार पासी
ममता बनर्जी की एसआईआर रोकने की सारी कोशिशें खत्म होती दिखाई दे रही हैं। सवाल यह है कि 12 राज्यों में शांतिपूर्ण तरीके से एसआईआर होने के बावजूद बंगाल में इसे रोकने की कोशिश क्यों की गई है। विपक्षी दलों ने एसआईआर का विरोध किया है लेकिन ममता बनर्जी इस विरोध में सारी हदें पार कर गई हैं। सवाल यह है कि वो आखिर इस प्रक्रिया से इतनी डरी हुई क्यों है। वास्तव में उनका डर अपनी जगह सही है क्योंकि इस प्रक्रिया के पूर्ण होने के बाद ममता का सारा चुनावी गणित गड़बड़ा जाने वाला है। एसआईआर का विरोध उनकी रणनीति नहीं है बल्कि मजबूरी है।
बिहार में जब एसआईआर चल रहा था, तब भी ममता बनर्जी उग्रता के साथ उसका विरोध कर रही थी। जब उनके ही राज्य में एसआईआर चल रहा है तो उनका विरोध सारी हदें पार कर गया है। उन्होंने इस प्रक्रिया को रोकने के लिए अपने सारे घोड़े खोल दिये हैं लेकिन अब उनकी यह कोशिश उल्टा असर दिखा रही है। उन्होंने चुनाव आयोग के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है और उसे केंद्र सरकार की कठपुतली बता रही हैं। टीएमसी एसआईआर के खिलाफ कोलकाता हाई कोर्ट गयी थी लेकिन उसे वहां से निराशा हाथ लगी। इसके बाद ममता सरकार इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में पहुँच गयी । सुप्रीम कोर्ट पर दबाव डालने के लिए ममता बनर्जी खुद वकील के चोगे में वहां इस केस की पैरवी करने पहुँच गयी। उन्हें लगा कि इससे सुप्रीम कोर्ट प्रभावित हो जाएगा लेकिन अब लगता है कि माननीय न्यायाधीशो ने उनकी चाल को समझ लिया है। ममता लगातार मोदी सरकार पर बंगाल में राष्ट्रपति शासन लगाने की साजिश का आरोप लगाती रही हैं लेकिन अब इसका रास्ता माननीय अदालत ने खोल दिया है। प्रधानमंत्री मोदी ने यह तय किया हुआ है कि वो किसी भी राज्य में राष्ट्रपति शासन नहीं लगाएंगे, क्योंकि वो इसे संघीय व्यवस्था के खिलाफ मानते हैं। वो खुद मुख्यमंत्री रह चुके हैं, इसलिए वो किसी भी राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने के खिलाफ हैं। वैसे देखा जाए तो उनकी यह नीति सही नहीं है क्योंकि संविधान निर्माताओं ने इसकी व्यवस्था सोच समझ कर की है। जब किसी राज्य की संवैधानिक व्यवस्था बिगड़ जाए तो राष्ट्रपति शासन लगाया जाना चाहिए। बंगाल में बहुत पहले यह काम हो जाना चाहिए था लेकिन अब ये काम सुप्रीम कोर्ट करने जा रहा है। सवाल यह है कि हालात यहां तक कैसे आ गए हैं।
वास्तव में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से ममता बनर्जी की सरकार को कह दिया है कि अगर एसआईआर की प्रक्रिया पूरी नहीं हुई तो चुनाव नहीं होंगे। सुप्रीम कोर्ट के सामने चुनाव आयोग ने सारे वो तथ्य रख दिये हैं जिससे साबित होता है कि ममता बनर्जी नहीं चाहती हैं कि बंगाल में एसआईआर हो, इसलिए वो चुनाव आयोग का सहयोग नहीं कर रही हैं। इसके विपरीत वो चुनाव आयोग के काम में अड़ंगा डाल रही हैं। सुप्रीम कोर्ट चुनाव आयोग के तर्कों और तथ्यों से समझ गया है कि ममता बनर्जी एसआईआर होने नहीं देंगी। माननीय अदालत ने राज्य सरकार द्वारा चुनाव आयोग का सहयोग न करने पर कड़ी नाराजगी जाहिर की है। सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि निष्पक्ष चुनाव के लिए साफ-सुथरी मतदाता सूची जरूरी है और इसमें देरी बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
ममता बनर्जी की सारी कोशिशें यही थीं कि चुनाव आयोग अपना काम समय पर न कर पाए और चुनाव पुरानी मतदाता सूची के अनुसार ही हो जाये। उन्होंने यही बात सुप्रीम कोर्ट के सामने भी जाकर कही थी कि चुनाव आयोग समय पर एसआईआर की प्रक्रिया पूरी नहीं कर पाएगा, इसलिए उसे पुरानी मतदाता सूची पर चुनाव करवाने का आदेश दिया जाए। देखा जाए तो ममता बनर्जी ने ऐसे हालात पैदा किये जिससे चुनाव आयोग अपना काम न कर पाये और उसके बाद उसे पुरानी मतदाता सूची पर चुनाव करवाने के लिए मजबूर होना पड़े। चुनाव आयोग पहले ही 58 लाख मृतक, अनुपस्थित और स्थांतरित मतदाताओं का नाम मतदाता सूची से हटा चुका है। बंगाल की समस्या यह है कि वहां डेढ़ करोड़ मतदाता संदिग्ध पाए गए हैं। चुनाव आयोग द्वारा तार्किक विसंगतियों की एक सूची बनाई गई है जिसमें से अभी भी 45 लाख से ज्यादा मतदाताओं के मामलों का निपटारा किया जाना है। इस काम के लिए चुनाव आयोग ने ममता सरकार से ग्रुप ए अधिकारियों की सूची मांगी थी, जिन्हें इन मामलों के निपटारे का काम सौंपा जा सके, लेकिन ममता सरकार ने आयोग को इंतजार करने के लिए कह दिया था। इसके बाद इस मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई में चुनाव आयोग ने राज्य सरकार द्वारा ग्रुप ए अधिकारी उपलब्ध न करवाने की बात कही। माननीय अदालत ने बंगाल सरकार को आदेश दिया था कि वो आयोग को एसआईआर में मदद के लिए पर्याप्त संख्या में वांछित अधिकारी उपलब्ध करवाए। अदालत के आदेश के बावजूद ममता सरकार ने आयोग को ये अधिकारी नहीं दिये और बाद में ग्रुप बी अधिकारियों की एक सूची भेज दी। आयोग का कहना है कि तार्किक विसंगतियों का मामला जटिल है, इसके लिए ग्रुप ए अधिकारी ही सही हैं, ग्रुप बी अधिकारियों से ये काम नहीं करवाया जा सकता।
शुक्रवार को हुई सुनवाई में राज्य सरकार के रवैये और चुनाव आयोग से सहयोग न करने पर माननीय अदालत ने निराशा जाहिर की। सुप्रीम कोर्ट ने दोनों पक्षों को मामले की संवेदनशीलता को समझने की सलाह दी। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने ऐसा फैसला सुनाया जो आज से पहले कभी नहीं सुनाया था। इस फैसले से साबित हो गया है कि माननीय अदालत को सिर्फ राज्य सरकार पर भरोसा नहीं है बल्कि राज्य की व्यवस्था से भी विश्वास खत्म हो गया है। माननीय अदालत को राज्य के अधिकारियों पर राज्य सरकार का दबाव नजर आ गया है और उसे लगता है कि ये लोग सही तरीके से काम नहीं कर सकते। माननीय अदालत ने चुनाव आयोग का काम करवाने के लिए न्यायिक अधिकारियों की नियुक्ति करने का आदेश जारी कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने कलकत्ता हाईकोर्ट के मुख्यन्यायधीश को निर्देश दिया है कि चुनाव आयोग की तार्किक विसंगतियों के मामले का निपटारा करने के लिए वो जिला न्यायाधीश, अतिरिक्त जिला न्यायाधीश और सेवानिवृत्त न्यायाधीश उपलब्ध करवाएं। ये न्यायिक अधिकारी सभी जिलों के तार्किक विसंगतियों के मामलों का निपटारा करेंगे। सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि राज्य सरकार और चुनाव आयोग के बीच विश्वास की कमी है, ऐसे में न्यायिक अधिकारियों और न्यायालय को शामिल करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है।
देखा जाए तो जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस बागची और जस्टिस पंचोली की पीठ ने ऐतिहासिक निर्णय सुनाया है जो भविष्य में अन्य सरकारों को एक चेतावनी के रूप में उपस्थित रहेगा। चुनाव आयोग के पास अपना स्टाफ नहीं होता . वो अपने सभी कामों के लिए संबंधित सरकारों से ही स्टाफ लेता है। इससे राज्य सरकारों को लगता है कि चुनाव आयोग पूरी तरह से उन पर निर्भर है। देखा जाए तो राज्य सरकारें चुनाव आयोग का सहयोग करने के लिए संवैधानिक रूप से बाध्य होती हैं लेकिन कई बार वो चुनाव आयोग के काम में बाधा उत्पन्न करती हैं। इस आदेश ने साबित कर दिया है कि अगर कोई सरकार संवैधानिक कार्यो में बाधा उत्पन्न करती है तो अदालत ऐसा आदेश भी दे सकती है। न्यायिक अधिकारी किसी भी सरकार के प्रति जवाबदेह नहीं होते । राज्य सरकार न तो उनके खिलाफ कोई कार्यवाही कर सकती है और न ही उनका स्थानांतरण कर सकती है। जो अधिकारी राज्य सरकार द्वारा उपलब्ध करवाए जाते हैं, उन पर दबाव बनाया जा सकता है लेकिन न्यायिक अधिकारी राज्य सरकार के हर दबाव से मुक्त हैं।
ममता बनर्जी की सारी चालें उल्टी पड़ गई हैं। सुप्रीम कोर्ट ने ममता बनर्जी के हाथ से सारी ताकत छीन ली है और बता दिया है कि वो राज्य की मालिक नहीं हैं। संविधान ने सुप्रीम कोर्ट को ऐसी ताकत दी हुई है जिससे वो उनकी मनमानी पर कभी भी लगाम लगा सकता है। अब ममता बनर्जी के हाथ से सारे पत्ते निकल चुके हैं। वो अब न तो चुनाव आयोग पर निशाना लगा सकती हैं और न ही मोदी सरकार पर चुनाव आयोग से मिलीभगत का शोर मचा सकती हैं। ममता बनर्जी को लगता था कि कोई उनके रास्ते में रोड़ा नहीं अटका सकता, बंगाल में उनकी मनमर्जी ही चलेगी। अब सारा मामला कलकत्ता हाईकोर्ट के हाथ में चला गया है। हाईकोर्ट ने 400 अधिकारियों की नियुक्ति एसआईआर का काम निपटाने के लिए कर दी है। सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार राज्य के डीजीपी और मुख्य सचिव को उनके काम में सहयोग देना पड़ेगा। अगर कहीं कानून व्यवस्था की दिक्कत आयी तो दोनों अधिकारियों के लिए मुश्किल खड़ी हो जाएगी। चुनाव आयोग की मांग पर गृह मंत्रालय बंगाल में अर्ध-सैनिक बलों की 500 कंपनियों की तैनाती करने जा रहा है, इसका मतलब है कि केंद्रीय सुरक्षा बलों के 60000 जवान बंगाल में चुनाव तक रहने वाले हैं। ये ममता बनर्जी की नई समस्या है, जो उन्हें परेशान करने वाली है।
ममता बनर्जी की सबसे बड़ी समस्या अभी आगे आने वाली है। 45 लाख लोगों के तार्किक विसंगतियों के मामले का निपटारा समय पर होना मुश्किल है, इसलिए चुनाव टल सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट पहले ही कह चुका है कि एसआईआर होने के बाद ही चुनाव होंगे। इसका मतलब है कि बंगाल में समय पर चुनाव नहीं होने वाले हैं। अब बड़ी संभावना यही है कि बंगाल में राष्ट्रपति शासन में ही चुनाव का आयोजन होगा। अगर ऐसा हुआ तो ममता बनर्जी के लिए बड़ी मुश्किल खड़ी होने वाली है क्योंकि अब वो विक्टिम कार्ड भी नहीं खेल पाएंगी। देखा जाए तो बंगाल के हालात ममता बनर्जी ने ही पैदा किये हैं और अब उन्हें ही इसका सामना करना पड़ेगा।
राजेश कुमार पासी