राजेश कुमार पासी
शराब घोटाले में ट्रायल कोर्ट ने केजरीवाल को बरी कर दिया है। इसके बाद केजरीवाल घूम-घूम कर सारे देश को बता रहे हैं कि वो कट्टर ईमानदार हैं. भाजपा ने उन्हें फंसाया था। वैसे देखा जाए तो अदालत ने उन्हें बरी इसलिए किया है, क्योंकि जांच एजेंसी सीबीआई उनके खिलाफ लगे आरोप सिद्ध नहीं कर पाई। अदालत ने कहीं नहीं कहा है कि केजरीवाल ईमानदार हैं और उन्हें फंसाया गया है। एक तरह से अदालत ने उनके खिलाफ पूरे सबूत न पेश कर पाने के कारण उन्हें बरी किया है। अदालत ने यह भी नहीं कहा है कि घोटाला नहीं हुआ है, इसलिए सवाल यही है कि घोटाला किसने किया है। सीबीआई का मुख्य आरोप ये था कि शराब व्यापारियों को फायदा पहुंचाने के लिए उनके पक्ष में नीतियां बनाई गई थी और इससे राजस्व की हानि हुई। ये आरोप भी भाजपा या कांग्रेस ने नहीं लगाया था, बल्कि कैग द्वारा लगाया गया था। कैग की रिपोर्ट आने के बाद जब विपक्षी दलों ने शोर मचाया तो केजरीवाल सरकार ने शराब नीति वापिस ले ली ।
सवाल यह है कि अगर केजरीवाल सरकार को अपनी नीतियों पर भरोसा था तो उसने इन नीतियों को वापस क्यों लिया। अदालत में अपराध साबित न हो पाना जांच एजेंसी की नाकामी होती है, इसलिए इस मामले ने सीबीआई की साख पर सवाल खड़े कर दिए हैं। सीबीआई की नाकामी ने विपक्षी दलों को मोदी सरकार के खिलाफ राजनीतिक हथियार दे दिया है कि वो ईडी और सीबीआई का दुरुपयोग कर रही है। अगर केजरीवाल बिल्कुल निर्दोष थे तो उन्हें हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट जमानत क्यों नहीं दे रहे थे। अगर केजरीवाल के खिलाफ कोई सबूत नहीं था तो अदालतों द्वारा उन्हें जेल क्यों भेजा गया। अब केजरीवाल मोदी सरकार पर आरोप लगा रहे हैं कि उसने उन्हें जेल भेजा था। भारतीय व्यवस्था का सच यह है कि सरकार किसी के खिलाफ मुकदमा कर सकती है लेकिन उसे जेल नहीं भेज सकती। किसी भी व्यक्ति को जेल भेजने या जमानत देने का अधिकार सिर्फ इस देश की अदालतों के पास ही है। अदालत ने चार्जशीट तैयार करने वाले जांच अधिकारी के खिलाफ विभागीय कार्यवाही की सिफारिश की है। इसका मतलब है कि अदालत मानती है कि जांच अधिकारी की लापरवाही के कारण किसी निर्दोष को परेशान किया गया है या दोषी के खिलाफ मामला साबित नहीं हो पाया है।
वैसे देखा जाए तो अगर केजरीवाल निर्दोष हैं तो उनके साथ बहुत बड़ा अन्याय हुआ है, क्योंकि उन्हें इस मामले में 150 दिन और उनके सहयोगी सिसोदिया को 500 दिन जेल में रहना पड़ा है। इतने बड़े नेताओं का जेल में रहना उनके राजनीतिक जीवन के लिए अच्छा नहीं होता है। बरी होने के बाद केजरीवाल अपने आपको पीड़ित की तरह पेश कर रहे हैं जिसमें कुछ भी गलत नहीं है। जहां तक केजरीवाल के खिलाफ राजनीति करने की बात है तो भाजपा और कांग्रेस ने उन्हें इस मामले में कठघरे में खड़ा करने की कोशिश की है। कांग्रेस कई बार अपनी राजनीति के कारण उनके साथ खड़ी हुई है लेकिन विरोध भी करती रही है। यही कारण है कि केजरीवाल बरी होने के बाद भाजपा के साथ-साथ कांग्रेस के खिलाफ भी बयान दे रहे हैं। कांग्रेस भी केजरीवाल के बरी होने के बाद भाजपा पर हमलावर है कि वो विपक्षी दलों के खिलाफ ईडी और सीबीआई का दुरुपयोग कर रही है। कांग्रेस का भाजपा पर हमलावर होना समझ आता है लेकिन कांग्रेस केजरीवाल के खिलाफ भी हमलावर है। कांग्रेस आरोप लगा रही है कि केजरीवाल और भाजपा मिलकर उसके खिलाफ साजिश कर रहे हैं। कांग्रेस का कहना है कि ऐन चुनाव के वक्त केजरीवाल का बरी होना महज संयोग नहीं हो सकता. कहीं न कहीं दोनों दलों की इसमें मिलीभगत है। कांग्रेस का कहना है कि भाजपा उसके खिलाफ आम आदमी पार्टी को खड़ा कर रही है, ताकि आने वाले विधानसभा चुनावों में उसे नुकसान पहुंचाया जा सके।
अगले साल पंजाब, गोआ और गुजरात में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं, जहां आम आदमी पार्टी गंभीरता से चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है। केजरीवाल और सिसोदिया के बरी होने के बाद पार्टी में नई जान आ गई है। आप के कार्यकर्ताओं में नया जोश आ गया है। देखा जाए तो अब पार्टी कार्यकर्ता और नेता नए जोश के साथ काम शुरू कर सकते हैं। केजरीवाल बोल रहे हैं कि भाजपा में हिम्मत है तो वो दिल्ली में चुनाव करवा ले. उसे दस सीटें भी नहीं मिलेंगी। वो ये जानते हैं कि दिल्ली में सरकार बने हुए एक साल हुआ है, ऐसा कुछ होने वाला नहीं है। वास्तव में वो कांग्रेस को इशारा कर रहे हैं। 2027 में जिन तीन राज्यों में चुनाव होने वाले हैं, वहां आप भाजपा के लिए नहीं बल्कि कांग्रेस के लिए घातक साबित हो सकती है। आम आदमी पार्टी के मजबूत होने से भाजपा को नुकसान की अपेक्षा फायदा होने की उम्मीद ज्यादा है।
पंजाब में आम आदमी पार्टी अपनी सत्ता बचाने की लड़ाई लड़ रही है। इस समय पंजाब में सत्ताविरोधी लहर चल रही है जिससे निपटना पार्टी के लिए आसान होने वाला नहीं है। केजरीवाल के आरोपमुक्त होने के बाद आम आदमी पार्टी को सत्ता में वापिसी का रास्ता आसान लग रहा है। जहां तक भाजपा की बात है तो वो अभी सत्ता की लड़ाई में शामिल नहीं है। शिरोमणि अकाली दल भी इतना कमजोर हो चुका है कि वो सत्ता की लड़ाई से बाहर नजर आ रहा है। अगर भाजपा और अकाली दल गठबंधन कर लेते हैं, तो वो मुकाबले में आ सकते हैं लेकिन इसकी संभावना बहुत कम है। देखा जाए तो पंजाब में आम आदमी पार्टी और कांग्रेस ही मुख्य मुकाबले में हैं। भाजपा सिर्फ अपना जनाधार बढ़ा रही है। भाजपा को पता है कि अगर आम आदमी पार्टी दोबारा सत्ता में आ जाती है तो कांग्रेस पंजाब में कमजोर हो जाएगी और इसके बाद भाजपा को पांव जमाने का मौका मिल जाएगा। कांग्रेस इसलिए दोनों दलों पर मिलीभगत का आरोप लगा रही है। वैसे देखा जाए तो पंजाब की हालत देखते हुए आम आदमी पार्टी की सत्ता में वापसी आसान नहीं है। पार्टी के खिलाफ सत्ताविरोधी लहर इतनी मजबूत है कि केजरीवाल के बरी होने से ज्यादा फर्क पड़ने वाला नहीं है।
दूसरी बात यह है कि केजरीवाल भाजपा के कट्टर विरोधी हैं, इसलिए उनका भाजपा के साथ मिलीभगत करना मुश्किल लगता है। परिस्थितियों को देखते हुए आरोप सही लगें लेकिन जरूरी नहीं है कि वो सच हों। अभी चुनावों में एक साल बाकी है. तब तक राजनीति कभी भी करवट ले सकती है। पंजाब में बेशक सत्ताविरोधी लहर चल रही हो लेकिन कांग्रेस के पक्ष में कोई हवा नहीं चल रही है। जहां पंजाब की जनता आम आदमी पार्टी की सरकार से नाराज है तो दूसरी तरफ वो कांग्रेस से भी खुश नहीं है। पंजाब की जनता क्या फैसला देगी, इस बारे में अभी कुछ कहना आसान नहीं है। केजरीवाल और उनके कुछ नेताओं का पंजाब सरकार में बहुत ज्यादा दखल है जो कि पंजाब की जनता को पसंद नहीं आ रहा है । केजरीवाल के बरी होने के बाद इसमें बदलाव आने की उम्मीद नहीं है।
गोआ और गुजरात में भी आम आदमी पार्टी कांग्रेस के लिए समस्या खड़ी कर सकती है। गुजरात में दशकों से कांग्रेस सत्ता में वापसी की राह देख रही है जिसमें आम आदमी पार्टी नई बाधा बन कर खड़ी हो गई है। आम आदमी पार्टी के कारण ही पिछले चुनाव में कांग्रेस को बड़ी हार का सामना करना पड़ा था । यही हालत गोआ में भी है, जहां कांग्रेस को इस बार सत्ता में आने की उम्मीद है। गुजरात से कहीं ज्यादा उम्मीद कांग्रेस को गोआ से है, लेकिन यहां भी आप उसकी उम्मीदों पर पानी फेर सकती है। भाजपा चाहती है कि चुनाव त्रिकोणीय बन जाएं क्योंकि इससे उसे ही लाभ होता है। अगर आप गोआ में गंभीरता से चुनाव लड़ती है तो वो कांग्रेस के ही वोट लेगी. इससे भाजपा को बड़ा फायदा हो सकता है। सवाल यह है कि अगर आम आदमी पार्टी की ताकत बढ़ने से कांग्रेस को नुकसान होता है तो क्या आम आदमी पार्टी चुनाव लड़ना बंद कर दे। केजरीवाल की पार्टी पूरे देश में चुनाव लड़ती है, तो क्या वो कांग्रेस को नुकसान पहुंचाने के लिए ऐसा करती है। देखा जाए तो एक राजनीतिक दल होने के नाते देश में कहीं भी जाकर चुनाव लड़ना उसका लोकतांत्रिक अधिकार है, इसमें कुछ भी गलत नहीं है।
आम आदमी पार्टी की राजनीति के लिए भाजपा को कसूरवार नहीं ठहराया जा सकता। केजरीवाल भाजपा के कट्टर विरोधी हैं. उससे मिलीभगत का आरोप उनकी विश्वसनीयता खत्म करने की कोशिश है। शराब घोटाले के आरोप से मुक्त होने पर उनकी विश्वसनीयता बढ़ी जरूर है लेकिन संदेह अभी भी बना हुआ है। उन पर केवल शराब घोटाले का आरोप नहीं है बल्कि कई आरोप लगे हुए हैं। अभी उन्हें कई मामलों में अदालतों का सामना करना है। इसके अलावा शराब घोटाले में सीबीआई उनके खिलाफ हाईकोर्ट के दरवाजे पर पहुंच गई है। कांग्रेस के आरोप राजनीति के लिए ठीक हो सकते हैं लेकिन इनका कोई ठोस आधार नहीं है। केजरीवाल के फायदे से आज कांग्रेस को नुकसान हो सकता है तो कल भाजपा के साथ भी ऐसा हो सकता है। कांग्रेस की आफत, कल भाजपा के लिए आफत बन सकती है।