लौटा दो विष्णु की जिंदगी के बीस साल…?

                  प्रभुनाथ शुक्ल

लोकतांत्रिक व्यवस्था में आम आदमी की न्याय की उम्मीद क्या खत्म होती दिखती है। व्यक्ति के संविधानिक और कानूनी अधिकार क्या संरक्षित नहीं रह गए हैं। कानून और संविधान की किताबें सिर्फ दिखावटी हैं। क्या कानून अपने दायित्वों और कर्तब्यों का निर्वहन पारदर्शिता से कर रहा है ? न्याय के अधिकार का क्या संरक्षण हो रहा है। सामाजिक समानता और कानूनी संरक्षण की आड़ में एक बेगुनाह आदमी के इंसाफ की चाहत क्यों टूट रहीं है। जाति के नाम पर सामाजिक खाईं को और गहरा किया जा रहा है। इंसान की इंसानियत और संवेदनशीलता खत्म हो रही है। समाज में आखिर इस तरह के सवाल क्यों उठ रहे हैं। क्योंकि अब यह आम बहस का मुद्दा है। कानून-व्यवस्था एंव इंसान से जुड़े एक मामले ने नयी बहस छेड़ दिया है।

उत्तर प्रदेश के ललितपुर जिले की एक घटना ने सोशलमीडिया पर आम आदमी के अधिकार को लेकर नयी बहस खड़ी की है। इस मसले पर सरकार भले आंख बंद कर ले लेकिन समाज कभी नहीं बंद कर सकता है। सवाल विष्णु तिवारी का नहीं है मरते हुए इंसाफ और न्याय के भरोसे कहा है। एक झूठे आरोप में जेल जाने वाले विष्णु तिवारी को खुद को सच साबित करने में 20 साल का वक्त लग गया। क्या यहीं हमारी न्याय व्यवस्था है। एक बेगुनाह आदमी की जिंदगी को खत्म कर क्या मिला। क्यों उस व्यक्ति पर दलित उत्पीड़न और फर्जी बलात्कार का आरोप मढ़ा गया। वह भी सिर्फ एक गाय को बांधने को लेकर। उस व्यक्ति के जीवन के अमूल्य वक्त निगल लिए गए। विष्णु तिवारी के जिंदगी का वह सुनहला वक्त फिर क्या कोई लौटा पाएगा।

इंसाफ की उम्मीद में विष्णु तिवारी का सबकुछ लुट गया। उसने इस दौरान अपने चार स्वजनों मां-बाप और दो सगे भाईयों को खो दिया। उनके अंतिम संस्कार में भी उसे आने की अनुमति नहीं मिली। दलित उत्पीड़ क्या हत्या और किसी की मौत से भी बड़ा अपराध था। क्या हत्या से जघन्य या दूसरे अपराध में लोग जमानत पर बाहर नहीं हैं। समाज में इस तरह का दोहरामापदंड क्यों अपनाया गया। खुद को बेगुनाह साबित करने में पांच एकड़ जमींन बिक गयी। अठ्ठारह साल की उम्र में उसे जेल जाना पड़ा। हाईकोर्ट से बेगुनाह साबित होने के बाद 38 साल पर उसकी रिहाई हुई। जेल से निकलते वक्त उसके पास सिर्फ छह सौ रुपये थे वह भी उसने जेल में कमाए थे। इस घटना ने एक नई बहस छेड़ दिया है कि विष्णु तिवारी तो जेल से छुट गया, लेकिन जाति की आड़ में उसका जीवन तबाह करने वाले लोगों को क्या कानून और सरकारें सजा दिला पाएंगी। हमारे कानून में क्या कोई ऐसी व्यवस्था है। जिन लोगों ने उसे फंसाने की साजिश रची उन्हें भी क्या जेल भेजा जाएगा। उन्हें भी क्या 20 साल जेल की सलाखों में गुजारने पड़ेंगे। दलित उत्पीड़न और बलात्कार की झूठी एफआईआर लिखाने वालों के खिलाफ कानून कोई कार्रवाई करेगा।

अहम सवाल उठता है कि अगर किसी ने विष्णु तिवारी के खिलाफ गलत प्राथिमिकी दर्ज करवाई थी तो पुलिस ने आंखें क्यों मूंद रखी थी। पुलिस ने बलात्कार और दलित उत्पीड़न का मुकदमा लिखने के पूर्व घटना की जांच पड़ताल तो जरुर की होगी। क्या पुलिस की प्राथमिक जांच में घटना से संबंधित कोई तथ्य नहीं पाए गए। मुकदमा लिखने के पूर्व क्या संबंधित पीड़िता की मेडिकल जांच नहीं हुई थी। अगर मेडिकल जांच हुई थी तो क्या उसमें बलात्कार साबित हुआ था। अगर नही ंतो मुकदमा क्यों दर्ज किया गया। क्या किसी राजनीतिक दबाब में मेडिकल कराया गया था। इस घटना में दूसरा सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इतने के बाद भी विवेचना अधिकारी ने अपने नैतिक दायित्व का निर्वहन क्यों नहीं किया। विवेचना के दौरान तथ्यात्मक जानकारी क्यों छुपायी गयी। एक निर्दोया व्यक्ति को गलत तरीके से फंसाया गया। नीचली अदालत ने उसी गलत विवेचना पर आजीवन कारावास की सजा भी सुना दिया। जिसकी वजह से उसे जिंदगी के खास वक्त जेल में काटना पड़ा। उसे सामाजिक हानि पहुंचायी गयी। हाईकोर्ट की वजह से एक व्यक्ति की बाकि जिंदगी भी जेल की सलाखों में काटने से बच गई। वहां से भी उम्मीद टूटती तो वह सुप्रीमकोर्ट तक न्याय की लड़ाई लड़ता या फिर जेल में अंतिम सांस लेता।

हम यह बिल्कुल नहीं कहते हैं कि दलित उत्पीड़न को खत्म कर दिया जाए। लेकिन यह बिल्कुल कहते हैं कि न्याय की उम्मींद को मत खत्म करो। आम आदमी के लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा होनी चाहिए। विष्णु तिवारी अगर गुनाहगार होता तो कोई आवाज नहीं उठती। लेकिन बेगुनाह होते हुए भी उसकी जिंदगी के बीस साल खत्म हो गए फिर इसकी सजा किसे मिलनी चाहिए। जिन लोगों ने यह साजिश रची उनके खिलाफ भी कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए। विष्णु ने जो चोट खायी है उसका उसे हिसाब मिलना चाहिए। उसके हिस्से का बाकि न्याय कैसे मिलेगा यह सोचना सरकार का काम है। अगर कानून में इस तरह के प्राविधान हैं तो झूठे आरोप लगा कर किसी की जिंदगी बर्बाद करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए।

विष्णु के खिलाफ गलत मुकदमा लिखाने वालों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए। इसके बाद पोस्टमार्टम या विवेचना पैसे और पहुंच के बल पर की गयी है तो संबंधित लोगों के खिलाफ भी कड़ी से कड़ी कानूनी कर्रवाई होनी चाहिए। इस मामले में विवेचना अधिकारी के भूमिका भी जांच होनी चाहिए। क्योंकि उन्हीं की गलत विवेचना पर उसे आजीवन कारवास की सजा मिली। क्या इस तरह के मुकदमों में कोई निश्चित वक्त मुकर्रर नहीं किए जाने चाहिए। हमने आखिर इस तरह की न्याय व्यवस्था क्यों विकसित की है कि बेगुनाह व्यक्ति को भी गुनाहगार बना दिया जाय। अगर हमने ऐसी न्याय व्यवस्था कायम किया है तो हमें शर्म आनी चाहिए। इस घटना से यह साबित होता है कि न जाने कितने विष्णु अपनी बेगुनाही साबित करने के लिए अपनी जिंदगी जेल की सलाखों में खत्म कर देते हैं।

उत्तर प्रदेश या दूसरे राज्यों में निश्चित रुप से दलित उत्पीड़न का बेजा इस्तेमाल किया जा रहा है। हम कानूनी संरक्षण की आड़ में सामाजिक समरसता नहीं कायम कर सकते हैं। हमारा संविधान सभी के लोकतांत्रिक मूल्यों और अधिकारोें के संरक्षण की वकालत करता है, लेकिन जरा सोचिए क्या इसी तरह ? दलित उत्पीड़न की घटनाएं चिंतनीय हैं लेकिन फर्जी मुकदमें समाज में खांई बढ़ा रहे हैं। जबकि राजनीति इसे वोट बैंक का माध्यम बना लिया है। यह वक्त की मांग है कि इस पर केंद्र और राज्य सरकारें गंभीरता से विचार करें। केंद्र सरकार अगर 2018 दलित उत्पीड़न पर सुप्रीमकोर्ट के निर्देेशों का अनुपाल करती तो भविष्य में इस तरह की घटनाओं पर विराम लग सकता था। लेकिन अदालत के हस्तक्षेप के बाद सरकार ने जिस तरह से संविधान संशोंधान कर बिल लाने का काम किया। वह जग जाहिर है। हम भी चाहते हैं कि देश में दलित उत्पीड़न की घटनाएं बहुतायत हैं, लेकिन उसके कारणों और निवावरणों पर भी विचार करना चाहिए था। फिलहाल विष्णु तिवारी ने जो सामाजिक तिरस्कार झेला है अब उसे कोई वापस नहीं कर सकता है। लेकिन जिन्होंने यह साजिश रची उन्हें तो हरहाल में सजा मिलनी चाहिए। अगर ऐसा नहीं हुआ तो फिर दलित उत्पीड़न कानून जाति विशेष के खिलाफ उत्पीड़न का अस्त्र बन कर रह जाएगा और सामाजिक विषमताएं कम होने के बाद बढ़ सकती हैं। सरकार और उससे जुड़ी संस्थाओं को इस पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।

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