लेख

उठो राष्ट्र के नव-प्रहरी


पवन शुक्ला

उठो राष्ट्र के नव-प्रहरी,
अब रणभेरी ने पुकारा है,

सोया जो पुरुषार्थ तुम्हारा,
उसे फिर से ललकारा है।

नसों में बहता रक्त नहीं,
यह ज्वाला का सैलाब बने,

साधना की इस भट्टी में,
हर युवा अब फौलाद बने।

शिवा-प्रताप की तलवारें,
फिर से आज चमकनी हैं,

अंधकार के सीने में,
सूरज की किरणें लगनी हैं।

शाखा के उन संस्कारों को,
अब कर्मठता में ढालो तुम,

परम वैभव की राहों पर,
अपना सर्वस्व निकालो तुम।

नहीं रुकना है, नहीं थकना है,
लक्ष्य अभी तो दूर खड़ा,

मातृभूमि की सेवा से,
कोई धर्म नहीं है और बड़ा।

जाति-पाति के बंधनों को,
ठोकर मार के तोड़ दो,

राष्ट्र-भक्ति की अविरल गंगा,
हर बस्ती की ओर मोड़ दो।

केसरिया ध्वज साक्षी है,
हम झुकने वाले लोग नहीं,

कायरता और प्रमाद का,
पालेंगे हम रोग नहीं।

भुजाओं में बल सागर सा,
मस्तक पर चन्दन त्याग का,

विश्व गुरु फिर बने भारती,
संकल्प यही अनुराग का।

कण-कण में जो सोई ऊर्जा,
उसे जगाना काम तेरा,

भारत के स्वर्णिम कल पर,
होगा अंकित नाम तेरा।

संघ-शक्ति की गूँज उठे
अब, अम्बर और दिशाओं में,

देश-प्रेम का अमृत घोलें,
हम जग की हवाओं में।

चलो बढ़ें हम पथ पर ऐसे,
पर्वत भी झुक जाए रे,

विजय पताका फहरे अपनी,
काल भी थर्रा जाए रे!

लेखक पवन शुक्ला