एक संत थे सिद्ध बड़े ही,
रहते निर्जन वन में |
सबके कष्ट मिटा देने की,
रही कामना मन में |
थे ध्यानस्थ कुटी में, चूहा,
एक दौड़कर आया |
बिल्ला एक बड़ा मोटा सा,
पीछे था पछियाया |
बाबा मुझे बचा लो,चूहा,
चिल्ला कर यह बोला |
मुझे मार डालेगा बिल्ला,
यह तो गोल मटोला |
बाबा ने तब उस चूहे को,
बना दिया झट बिल्ला |
दोनों बिल्ले लडे देर तक,
कसकर चिल्ला चिल्ला |
तभी अचानक उस बिल्ले पर,
झपट पड़ा एक कुत्ता |
बिल्ला तो बिल्ला ही ठहरा,
कुत्ता हट्टा कट्टा |
अब तो बिल्ला बोला बाबा,
कुत्ता मुझे बना दो |
इस बाजारू कुत्ते से तो,
मेरी जान बचा लो |
बाबा ने झट से बिल्ले को,
कुत्ता बड़ा बनाया |
मुश्किल से असली कुत्ते से,
जान बचा वह पाया |
लेकिन अब नकली कुत्ते पर,
असली शेर दहाड़ा |
कुत्ता समझ गया अब सच में,
”जाऊँगा मैं मारा |
पर बाबा ने दया दिखाकर,
उसे बनाया शेर |
लेकिन वह उन पर ही झपटा,
बिना किये ही देर |
बाबा ने गुस्से में वापस,
चूहा उसे बनाया |
उसे पकड़ असली बिल्ले ने,
चबा-चबा कर खाया |
दुष्टों पर तो दया दिखाना,
किसी काम न आता |
उन पर दया दिखने वाला,
पछताता रह जाता |