धर्म-अध्यात्म शख्सियत

संत रविदास :  नैतिक चेतना और आज का भारतीय समाज

रविदास जयंती – 1 फरवरी

शम्भू शरण सत्यार्थी

जब भारतीय समाज अपने लोकतांत्रिक दावों और सामाजिक यथार्थ के बीच फँसा दिखाई देता है, तब संत रविदास का स्मरण केवल अतीत की ओर देखना नहीं बल्कि वर्तमान की कठोर समीक्षा करना भी है। संत रविदास उस परंपरा के संत नहीं हैं जिन्हें केवल भक्ति के दायरे में सीमित किया जा सके। वे दलित विमर्श की उस नैतिक चेतना के प्रतिनिधि हैं जिसने जाति-आधारित असमानता को ईश्वर, धर्म और समाज—तीनों के सामने चुनौती दी।

दलित विमर्श का केंद्रीय प्रश्न आत्मसम्मान का है। संत रविदास का जीवन और विचार इसी आत्मसम्मान का उद्घोष हैं। एक ऐसे समाज में, जहाँ जन्म के आधार पर मनुष्य की हैसियत तय होती थी, रविदास ने श्रम को गरिमा और भक्ति को प्रतिरोध में बदल दिया। यह कोई छोटी बात नहीं थी। यह ब्राह्मणवादी सामाजिक संरचना के मूल तर्क पर सीधा प्रहार था।

“मन चंगा तो कठौती में गंगा” जैसी पंक्ति केवल आध्यात्मिक कथन नहीं है; यह उस धार्मिक वर्चस्व के खिलाफ घोषणापत्र है, जो पवित्रता को जाति से जोड़ता रहा है।

आज जब हम दलित विमर्श की बात करते हैं, तो यह स्वीकार करना होगा कि संवैधानिक समानता और सामाजिक समानता के बीच की खाई अभी भी गहरी है। संत रविदास इस खाई को पाटने की चेतना देते हैं। वे कहते हैं—“सबै हरि के लोग समान।” यह कथन किसी अमूर्त ईश्वर-भक्ति का नहीं, बल्कि मनुष्य-मनुष्य की समानता का साहसिक ऐलान है। आज के समय में, जब जाति नए-नए रूपों में खुद को पुनर्स्थापित कर रही है, रविदास का यह कथन और अधिक राजनीतिक हो उठता है।

संत रविदास की ‘बेगमपुरा’ की कल्पना को यदि आज भी केवल आध्यात्मिक स्वप्न समझा जाए, तो यह एक ऐतिहासिक भूल होगी। बेगमपुरा दरअसल दलित विमर्श की पहली सामाजिक-राजनीतिक कल्पना है—एक ऐसा समाज जहाँ भय नहीं, कर नहीं, बेगार नहीं और अपमान नहीं है। यह उस भारत की कल्पना है, जो आज भी अधूरा है।

आज जब विकास की भाषा में भी असमानता छिपी हुई है, बेगमपुरा हमें यह प्रश्न पूछने को विवश करता है—क्या हमारा लोकतंत्र वास्तव में भयमुक्त और समतामूलक है?

धर्म के सवाल पर संत रविदास दलित विमर्श को निर्णायक दिशा देते हैं। वे धर्म को सत्ता और पाखंड से अलग करते हैं। आज का समय धार्मिक उन्माद, प्रतीकों की राजनीति और दिखावटी आस्था का है। ऐसे में रविदास का धर्म-दर्शन असहज करता है, क्योंकि वह पूछता है—यदि धर्म मनुष्य को मनुष्य से छोटा-बड़ा बनाता है, तो वह धर्म नहीं, सत्ता का औजार है। दलित विमर्श के लिए यह दृष्टि अत्यंत महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि इतिहास गवाह है कि धर्म का इस्तेमाल सबसे अधिक दलितों को नियंत्रित करने के लिए किया गया।

राजनीतिक स्तर पर संत रविदास की विरासत का सबसे बड़ा संकट यही है कि उन्हें प्रतीक में बदल दिया गया है। मूर्तियाँ, जयंती और भाषण—लेकिन विचार गायब। दलित विमर्श की जिम्मेदारी है कि वह संत रविदास को आस्था का विषय नहीं, वैचारिक हस्तक्षेप के रूप में स्थापित करे। जब तक रविदास केवल स्मरणीय रहेंगे, अनुकरणीय नहीं, तब तक उनका दर्शन निष्प्रभावी बना रहेगा।

आज की दलित युवा पीढ़ी पहचान और अवसर के दोहरे संकट से जूझ रही है। शिक्षा और रोजगार के क्षेत्र में भेदभाव नए, अधिक सूक्ष्म रूपों में मौजूद है। ऐसे समय में संत रविदास का संदेश आत्मसम्मान, श्रम की गरिमा और विचार की शक्ति का संदेश है। वे सिखाते हैं कि मुक्ति केवल सत्ता परिवर्तन से नहीं आती, चेतना परिवर्तन से आती है।

अंततः, संत रविदास दलित विमर्श में केवल ऐतिहासिक व्यक्तित्व नहीं हैं, बल्कि एक जीवित प्रश्न हैं—क्या हम समानता को केवल संवैधानिक शब्दों में स्वीकार करेंगे या सामाजिक व्यवहार में भी उतारेंगे? उनका ‘बेगमपुरा’ आज भी अधूरा है, और शायद इसी अधूरेपन में उसकी प्रासंगिकता निहित है। जब तक भारतीय समाज जाति से मुक्त नहीं होता, तब तक संत रविदास की वाणी हमें असहज करती रहेगी और यही किसी भी बड़े विचार की पहचान है।

शम्भू शरण सत्यार्थी