रहस्य और तिलिस्म के बीच छुपे धरोहर

  • buddhशुंग और गुप्त वंश की गुफाओं में है भगवान बुद्ध से जुड़ अनेकों भित्ती चित्रचकिया से नौ किलोमीटर दूर बिहार की सीमा पर घुरहूपुर गाँव के पास स्थित पीठिया पहड़ी पर मानव निर्मित शुंग और गुप्त वंश की गुफाओं में बौद्ध धर्म की महायान शाखा सेे जुड़े भगवान बुद्ध की भित्ती चित्र मिले हैं। जमीन से 150 फीट उंची पहाड़ी पर अत्यंत दुर्गम स्थान पर निर्मित इन गुफाओं पर कई खतरनाक मोड़ों से होकर गुजरना पड़ता है। थोड़ी सी भी चूक जान लेने के लिए काफी है। 150 फीट उंची छोटी-छोटी इन चार-पांच पहाडि़यों में कुछ गुफाओं की तरह संरचना हंै। इन गुफाओं को आपस में जोड़ने के लिए सुरंग निर्मित है साथ ही गुफाओं में जाने के लिए सीढ़ीयां बनी हैं। घुरहूपुर के सामने की तीसरी पहाड़ी में एक गुफा में प्रवेष करने पर हाल की तरह की एक संरचना है, जिसमें दो-तीन दर्जन लोग आराम से बैठ कर विचार-विमर्ष कर सकते हैं। इस हाल से जुड़े नौ खोह हैं। इनमें हर खोह में इतनी जगह है कि एक व्यक्ति पालथी मार कर साधना कर सकता है। इस गुफा से नीचे उतरने के लिए सीढ़ी नुमा संरचना बना है जो फिलवक्त जीर्ण अवस्था में है। गुफा के मुख्य द्वार पर आठ-दस पद चिन्ह भी हैं।गुफा में पत्थरों से टेक लगाकर एक पालिश की गयी तख्तनुमा संरचना है। जिसके एक सिरहाने पर सिर के आकार का चिन्ह बना हुआ है। ऐसा मालूम होता है कि कोई इस तख्त का प्रयोग सोने के लिए करता रहा होगा। इन गुफाओं की संरचना को देख कर ऐसा प्रतीत होता है कि यह कभी बौद्ध मठ के रूप में विकसित रहा होगा। गुफा में बुद्ध के भित्ती चित्र के ठीक नीचे खोदे गये स्थान से जल का सोता फूट पड़ा है जिसको कि लोग भगवान बुद्ध का चमत्कार मान रहे हैं। लोग जल को प्रसाद स्वरूप ग्रहण कर रहे हैं।गुफा के दीवार पर हिरन, उल्लू, मानव, घोड़ा तथा कुछ समूह चित्र भी बने हैं। ऐसा लगता है कि इन चित्रों के माध्यम से कोई किस्सा कहने की कोशिश की गयी है। गुफा के दीवारों पर बने ये राक पेंटिंग इसे किसी के निवास के रूप में दर्शाते हैं। बी.एच.यू. के पुरातत्वविद् डा0 प्रभाकर उपाध्याय कहते हैं कि ‘भित्ती चित्र गुप्त काल के हैं। भरहुत और सांची के स्पूत और गया की गुफाओं का निर्माण इसी काल में हुआ था।’ गुफा के मुख्य द्वार पर आठ-दस पद चिन्ह बने हैं जिनके बारे में स्थानीय लोगों का कयास था कि शायद यह भगवान बुद्ध के पद चिन्ह हैं। मगर पुरातत्वविद् डा0 प्रभाकर उपाध्याय कहते हैं कि ‘गुफा पर मिले साक्ष्यों के आधार पर वहां बुद्ध के होने का सवाल ही नहीं है। हाँ, उनके अनुयायीओं के पद चिन्ह हो सकते हैं।’ सारनाथ (वाराणसी) से आये बौद्ध भिक्षुओं ने इन चित्रों का अवलोकन किया था। अवलोकन के बाद सम्राट अशोक बौद्ध महासंघ के सदस्य चित्रप्रभा त्रिसरण ने बताया था कि ‘सम्राट अशोक ने 84 हजार स्पूतों, शिलालेखों व भित्ती चित्रों के माध्यम से भगवान बुद्ध की जीवन दर्शन का प्रचार किया था। उन्होने कहा कि भगवान बुद्ध के प्रज्ञा, करूणा, मैत्री के संदेश को जन-जन तक पहुँचाने के लिए ऐसे भित्ती चित्रों का प्रयोग किया गया था।’ 

 

  • विन्ध्यपर्वत श्रृंखलाओं से जुड़े दर्जन भर से ज्यादा पहाडि़यों पर स्थित पाषाण प्रतिमा व भित्तचित्र नजर आते हैं। यहां प्राचीन स्थापत्य शैली से जुड़ी नक्काशीदार मुर्तियां, शिलाएं आदि दृष्टिगोचर होते रहें हैं। ऐतिहासिक धरोहर के साक्ष्य के क्रम में खण्डित बुद्ध प्रतिमाओं की दर्जनों मुर्तियां देखी जा सकती हैं। इन धरोहरों का प्रमाणित अध्ययन ही इनकी हकीकत को उजागर कर सकता है। मगर एक बात तय है कि विन्ध्यपर्वत श्रृंखला अपने गोद में एक मुकम्मल सभ्यता का इतिहास छुपाये हुए है।
  • इतने गहन निर्जन और दुःसाध्य पर्वत पर उत्पत्यकाओं में गुफाओं को लेकर उनके काल का निर्धारण करना काफी कठिन है फिर भी इतिहासकार डा0 जयराम सिंह का मानना है कि ‘ईसा पूर्व 185 में ब्राह्मण राजा पुष्यमित्र शुंग ने जब बौद्ध धर्मावलंबी शासक वृहद्रय की हत्या कर उसे सिंहासन से अपदस्थ किया और बौद्ध धर्म के अनुयायीयों का संहार आरम्भ किया तब बौद्ध धर्म से जुड़े भिक्षुओं ने ऐसे ही निर्जन स्थानों का चयन किया था।’ सारनाथ: पास्ट एण्ड प्रजेंट लिख चुके डा0 जयराम सिंह बताते हैं कि ‘भित्ती चित्र गुप्तकालीन हैं तथा सारनाथ में प्रयोग किये गये रंगों से इनका मेल खाता है। इन चित्रों में प्रयुक्त चटख रंगों को अनेक वनस्पतियों के संयोजन से तैयार किया गया है।’
  • गुफा की दीवारों पर भगवान बुद्ध की समाधि मुद्रा और उनके अगल-बगल में कलश की आकृति चित्रित है। दीवार पर भगवान बुद्ध के चित्र के उपर पाली भाषा में शिलालेख भी पेंट किया गया है। जिनमें वनस्पतियों के मिश्रण से तैयार रंगों का प्रयोग किया गया है। पाली भाषा में चित्रित अंको के बारे में प्रियदर्शी अशोक मिशन (पाम) बिहार के सदस्य डा0 विजय बहादुर मौर्य ने बताया कि ‘सम्भवतः पाली भाषा में उत्कीर्ण शिलालेख में भगवान बुद्ध का जन्म काल ईसा पूर्व 563 और बुद्धम् शरणम् गच्छामि, संघम् शरणम् गच्छामि और धम्मम् शरणम् गच्छामि का सूत्र वाक्य अंकित है।’
  • इतिहास और कुछ नहीं समाजों व सभ्यताओं की स्मृति है। हम सभ्यताओं के बीते हुए समय को साक्षात देख सकते हैं, छू सकते हैं, उसमें सशरीर प्रवेश कर सकते हैं। सभ्यताओं की ये स्मृतियां सुरक्षित और प्रत्यक्ष रूप से उसके भग्नावशेषों में रहती हैं। खण्डहर, किले, पुराने नगर, आभूषण, बर्तन और कलाकृतियां सब एक बीत चुके समय में होते हैं। इतिहास को जानने व समझने के लिए इनको सुरक्षित रखना बेहद जरूरी है। विंध्यपर्वत श्रृंखला की गोद में बसा है उत्तर प्रदेश के नक्सल प्रभावित जनपद चन्दौली का चकिया तहसील। इसकी घाटियों में न जाने कितने रहस्य और तिलिस्म आज भी दफन हैं। इन्ही घाटियों में आज भी जिन्दा हैं चन्द्रकान्ता की अमर प्रेम कहानी की निशानियां। राजदरी, देवदरी और विंडमफाल जैसे मनमोहक जल प्रपात इसी घाटी की सुन्दरता बढ़ा रहे हैं। गहडवाल राजपूत राजवंश का स्वर्णिम इतिहास भी विंध्यपर्वत श्रृंखला की इन्ही पहाडि़यों में ध्वंसावशेष के रूप में बिखरे पड़े हैं।

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