(मर्दानगी का दबाव और समाज की खामोशी)
— डॉ. सत्यवान सौरभ
भारत जैसे समाज में यौन स्वास्थ्य आज भी खुली बातचीत का विषय नहीं है। पुरुषों से अपेक्षा की जाती है कि वे हर हाल में “सक्षम” रहें—चाहे उम्र, तनाव या बीमारी कुछ भी हो। इसी दबाव में डॉक्टर से सलाह लेना कमजोरी मान लिया जाता है, जबकि बिना जांच दवा खाना “समाधान” समझ लिया जाता है। यही चुप्पी सबसे खतरनाक है। लोग अपने शरीर के संकेतों को अनदेखा करते हैं, मानसिक तनाव को दबाते हैं और सामाजिक छवि बचाने के लिए जोखिम उठाते हैं। नतीजा यह होता है कि एक अस्थायी समाधान स्थायी मौत में बदल जाता है। यह केवल व्यक्तिगत विफलता नहीं, बल्कि एक गहरी सामाजिक असफलता है।
भारत में समय-समय पर सामने आने वाली कुछ मौतें सुर्खियों में आ जाती हैं, लेकिन उनसे जुड़ी असहज सच्चाइयों पर समाज अक्सर चुप्पी साध लेता है। होटल के कमरों, निजी फ्लैटों और बंद दरवाजों के पीछे हुई मौतों को “संदिग्ध परिस्थितियों” कहकर दर्ज कर दिया जाता है और मामला यहीं खत्म मान लिया जाता है। लेकिन सच्चाई यह है कि ऐसी घटनाएं अपवाद नहीं हैं। ये उस समस्या का संकेत हैं, जो देशभर में फैल चुकी है और जिसकी कीमत हज़ारों लोग अपनी जान देकर चुका रहे हैं—बिना चिकित्सकीय सलाह के सेक्सवर्धक दवाओं के बेतहाशा और लापरवाह इस्तेमाल से।
देश में इन दवाओं की उपलब्धता किसी सामान्य टॉनिक की तरह है। मेडिकल स्टोर, ऑनलाइन प्लेटफॉर्म और अनधिकृत चैनलों से ये दवाएं बिना पर्ची, बिना चेतावनी और बिना किसी परामर्श के मिल जाती हैं। न उम्र पूछी जाती है, न पहले से मौजूद बीमारियों का जिक्र होता है, न ही संभावित दुष्प्रभावों की जानकारी दी जाती है। मानो यह दवा नहीं, बल्कि सामाजिक दबाव से निकलने का कोई आसान रास्ता हो। यही आसान रास्ता कई बार सीधे मौत की ओर ले जाता है।
इन दवाओं का असर केवल शारीरिक नहीं होता। हृदय गति, रक्तचाप और नर्वस सिस्टम पर पड़ने वाला प्रभाव किसी भी व्यक्ति के लिए घातक हो सकता है, खासकर तब जब पहले से हृदय रोग, मधुमेह, उच्च रक्तचाप या अत्यधिक तनाव मौजूद हो। इसके बावजूद इन दवाओं के विज्ञापन मर्दानगी को चुनौती की तरह पेश करते हैं—उम्र को मात देने, क्षमता साबित करने और कमजोरी छिपाने के संदेश खुलेआम परोसे जाते हैं। सवाल यह है कि जब नतीजे जानलेवा हो सकते हैं, तो इस प्रचार की जिम्मेदारी आखिर कौन लेगा?
इस पूरे संकट की जड़ में समाज की वही पुरानी सोच है, जो यौन स्वास्थ्य को आज भी शर्म और चुप्पी के दायरे में रखती है। पुरुषों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे हर हाल में सक्षम रहें, चाहे शरीर साथ दे या नहीं। डॉक्टर से सलाह लेना कमजोरी समझा जाता है, जबकि बिना जांच दवा लेना बहादुरी या समझदारी मान लिया जाता है। यही मानसिक दबाव व्यक्ति को ऐसे फैसले लेने पर मजबूर करता है, जिनकी कीमत जान से चुकानी पड़ सकती है।
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि ऐसी मौतों के बाद भी सच्चाई अक्सर सामने नहीं आती। परिवार सामाजिक बदनामी के डर से चुप रहना बेहतर समझता है। मृत्यु प्रमाण-पत्र पर कारण कुछ और लिख दिया जाता है और मामला खत्म हो जाता है। पुलिस के लिए यह एक और “प्राकृतिक मौत” बन जाती है और सिस्टम आगे बढ़ जाता है। लेकिन हर बार जब सच्चाई दबा दी जाती है, तब अगली मौत की जमीन तैयार हो जाती है।
यह केवल व्यक्तिगत या पारिवारिक त्रासदी नहीं है। यह एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट है, जिसे स्वीकार करने से हम लगातार बचते रहे हैं। अगर सच सामने आए, अगर आंकड़े ईमानदारी से इकट्ठा किए जाएं, तो शायद यह साफ दिखे कि ऐसी मौतें सैकड़ों नहीं, बल्कि हज़ारों में हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि इनमें से अधिकांश कभी चर्चा का विषय नहीं बनतीं।
सरकार और स्वास्थ्य तंत्र की भूमिका पर भी गंभीर सवाल उठते हैं। आखिर इन दवाओं की बिक्री पर सख्त नियंत्रण क्यों नहीं है? पर्ची को अनिवार्य क्यों नहीं किया जाता? भ्रामक और आक्रामक विज्ञापनों पर कार्रवाई क्यों नहीं होती? जब किसी दवा के दुष्प्रभाव जानलेवा हो सकते हैं, तो उसके प्रचार और उपलब्धता पर वही सख्ती क्यों नहीं दिखाई जाती, जो अन्य खतरनाक पदार्थों पर होती है? हर घटना के बाद “जांच जारी है” कह देना अब पर्याप्त नहीं है। सवाल यह है कि जांच के नतीजों से नीति क्यों नहीं बनती।
मीडिया की भूमिका भी इस पूरे मामले में दोहरी रही है। एक ओर सनसनीखेज सुर्खियां बनती हैं, निजी जीवन को उछाला जाता है और कुछ दिनों बाद मामला भुला दिया जाता है। दूसरी ओर, कई बार इस विषय को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया जाता है, क्योंकि इसे “असहज” या “संवेदनशील” मान लिया जाता है। जबकि जिम्मेदार पत्रकारिता का अर्थ ही यही है कि वह असहज सवाल पूछे। यौन स्वास्थ्य पर बात करना न अश्लीलता है, न निजी दखल—यह सीधे तौर पर जीवन और मृत्यु से जुड़ा विषय है।
इस बहस में मानसिक स्वास्थ्य को भी अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। प्रदर्शन का दबाव, उम्र का डर, रिश्तों की चिंता और सामाजिक अपेक्षाएं—ये सभी व्यक्ति के मानसिक संतुलन पर असर डालती हैं। जब मानसिक स्वास्थ्य को महत्व नहीं दिया जाता, तो व्यक्ति त्वरित और खतरनाक समाधान की ओर झुकता है। अगर समय रहते सही काउंसलिंग, चिकित्सकीय सलाह और सामाजिक समर्थन मिले, तो कई जानें बचाई जा सकती हैं।
यह मान लेना एक बड़ी भूल होगी कि यह समस्या अपने आप खत्म हो जाएगी। जब तक इस पर खुलकर बात नहीं होगी, जब तक सख्त नियम नहीं बनेंगे और जब तक समाज अपनी सोच नहीं बदलेगा, तब तक ऐसी मौतें होती रहेंगी। यह एक खामोश संकट है, जो धीरे-धीरे महामारी का रूप ले सकता है—ऐसी महामारी, जो आंकड़ों में नहीं दिखेगी, लेकिन परिवारों को अंदर से तोड़ देगी।
अब वक्त आ गया है कि इस चुप्पी को तोड़ा जाए। यौन स्वास्थ्य को सामान्य स्वास्थ्य की तरह देखा जाए। डॉक्टर से सलाह लेना कमजोरी नहीं, बल्कि जिम्मेदारी माना जाए। सरकार को सख्त रेगुलेशन लागू करने होंगे, मीडिया को अपने सवाल तेज करने होंगे और समाज को शर्म छोड़नी होगी। हर ऐसी मौत एक चेतावनी है। सवाल सिर्फ यह नहीं है कि मौत कैसे हुई, बल्कि यह है कि अगली मौत रोकने के लिए हमने क्या किया।
अगर अब भी आंखें मूंद ली गईं, तो आने वाले समय में ऐसी मौतें खबर नहीं बनेंगी। वे बस एक और आंकड़ा बन जाएंगी—और उस चुप्पी की जिम्मेदारी हम सभी पर होगी।
— डॉ. सत्यवान सौरभ