समाज

भगदड़ से मौतें :  भारी पड़ रही भीड़ प्रबंधन की अनदेखी


ज्ञान चंद पाटनी

   बिहार के नालंदा जिले के मघड़ा गांव स्थित शीतला माता मंदिर में हर वर्ष की भांति श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ी लेकिन यह उत्साह जल्द ही हादसे में बदल गया। ऐसे हादसे बार—बार चीख—चीख कर कहते हैं कि भीड़ प्रबंधन की अनदेखी जानलेवा साबित होती है। इसके बावजूद न सरकार और प्रशासन पर इसका असर होता है, न ही आयोजकों पर। इससे साफ है कि किसी को भी आम जनता की जान की परवाह नहीं है। इस बात की पुष्टि इस तथ्य से भी होती है कि राजगीर स्थित नालंदा विश्वविद्यालय में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु के कार्यक्रम के लिए 2500 सुरक्षाकर्मी तैनात किए गए थे, लेकिन शीतला माता मंदिर में 25 हजार भक्तों को भगवान के भरोसे छोड़ दिया गया। भारत में भगदड़ के कारण होने वाली मौतें कभी खत्म नहीं होने वाली त्रासदी बन चुकी हैं। शीतला माता मंदिर में भगदड़ से हुई मौतों ने इस सच्चाई को फिर उजागर कर दिया है।  


  भारत में धार्मिक कार्यक्रमों, त्योहारों और तीर्थ स्थलों पर खास अवसरों पर बड़ी संख्या में लोग जमा होते हैं। इस तरह के आयोजनों में सुरक्षा, प्रबंधन और प्रवेश-निकास व्यवस्था के मामले में अक्सर लापरवाही बरती जाती है। राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) की गाइडलाइन की तरफ तो ध्यान ही नहीं दिया जाता। ऐसा हादसा कहीं भी हो, आमतौर पर मुख्य कारण भीड़ प्रबंधन की अनदेखी ही होता है। लोगों की सुरक्षा सरकार और आयोजकों, दोनों की जिम्मेदारी होती है। भारत में धार्मिक आयोजनों की संस्कृति ऐसी है कि ज्यादातर मामलों में आयोजक या संस्था भीड़ को संभालने के लिए कोई खास योजना या निगरानी व्यवस्था पर ध्यान ही नहीं देते। शायद वे मानकर चलते हैं कि लोगों की सुरक्षा का काम भगवान का है। ऐसे मामलों में पुलिस और प्रशासन भी आंखें मूंदे रहता है। जब हालात बिगड़ते हैं, तब सब एक-दूसरे पर दोष मढ़ते नजर आते हैं।


  नालंदा जिले में हुए हादसे का विवरण जितना दर्दनाक है, उतना ही शर्मनाक भी है। आसपास से हजारों भक्त माता के दर्शन को उमड़े थे, लेकिन मंदिर प्रबंधन और प्रशासन ने कोई विशेष इंतजाम नहीं किए। छोटा गर्भगृह, फिसलन भरी सीढ़ियां, अव्यवस्थित रास्ते और सबसे ऊपर दर्शन की होड़। श्रद्धालु कतार तोड़कर आगे बढ़ने को आतुर थे। पुजारी जल्दबाजी में दर्शन करा रहे थे। चोर दरवाजे से पैसे लेकर विशेष प्रवेश के आरोप भी सामने आए हैं।

 
  देश में होने वाली करीब 80% भगदड़ के मामले धार्मिक कार्यक्रमों के दौरान सामने आते हैं। मंदिरों, दरगाहों और तीर्थ स्थलों पर भीड़ सुरक्षा योजना पर ध्यान नहीं दिया जाता। प्रवेश-निकास द्वारों और आपात निकासी मार्ग को लेकर गंभीरता नहीं बरती जाती। न ही ठीक तरह से बैरीकेड लगाने और प्रशिक्षित कर्मचारियों की नियुक्ति को लेकर किसी तरह की योजना बनाई जाती। स्थानीय प्रशासन और पुलिस आम तौर पर घटना के बाद  सक्रिय होते हैं। धार्मिक ही नहीं राजनीतिक रैलियों में भी ऐसे हादसे होते रहते हैं। पिछले साल सितंबर में तमिल अभिनेता से नेता बने विजय की रैली के दौरान भगदड़ से 39 लोगों की जान चली गई थी। नैशनल क्राइम रेकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार 2000 से 2022 के दौरान हुए ऐसे हादसों में 3074 लोगों की मौत हुई, जिससे समस्या की गंभीरता का पता चलता है।  


  एनडीएमए के दिशा-निर्देशों, भीड़ निगरानी और रियल टाइम कम्युनिकेशन की व्यवस्था पर ध्यान दिया जाए तो हालात सुधर सकते हैं। मुश्किल यह है कि अधिकतर संगठन और आयोजक इन बातों को नजरअंदाज करते हैं। परिणामस्वरूप बार-बार जानलेवा भगदड़ के मामले सामने आते हैं। भारत को भीड़ प्रबंधन के लिए एक ठोस नीति अपनाने की आवश्यकता है। इसमें  राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) संहिता की पालना के साथ स्थानीय प्रशासन से समन्वय पर खास ध्यान रहे।

 
  आयोजन की पूर्व सूचना, सुरक्षित संरचना, व्यवस्थित बैरीकेड और पुलिस—प्रशासन से समन्वय स्थापित करने के मामले में आयोजकों को खुद पहल करनी चाहिए। धर्म स्थलों के पदाधिकारी और धार्मिक संस्थाएं भीड़ नियंत्रण के लिए डिजिटल समाधान—सीसीटीवी, घनत्व सेंसर, डिजिटली सूचना प्रणाली को अपनाएं तो हादसे रोकने में कामयाबी मिल सकती है। कुछ उदाहरण भी सामने हैं। आंध्रप्रदेश के तिरुपति मंदिर में भीड़ प्रबंधन को लेकर बदलाव किया गया है। भीड़ को संभालने के लिए अब मंदिर प्रशासन एआई की मदद ले रहा है। मंदिर में  अत्याधुनिक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस-इंटीग्रेटेड कमांड कंट्रोल सेंटर (आईसीसी) बनाया गया है। चेहरे की पहचान करने की क्षमता वाले एआई संचालित कैमरे अब श्रद्धालुओं की संख्या पर नजर रख सकते हैं।


   भीड़ प्रबंधन के मामले में दूसरे देशों से भी सीखा जा सकता है। अमेरिका और चीन जैसे देशों ने गंभीर हादसों के बाद अपनी नीतियों में बदलाव किया। चीन में 2014 तक भगदड़ के बड़े मामले सामने आए थे। चीन ने ऐसे मामलों को रोकने का संकल्प किया। प्रशासन ने भीड़ प्रबंधन, लाइसेंसिंग, मार्गदर्शन एवं नागरिक सुरक्षा पर खास ध्यान दिया और नए तकनीकी समाधान अपनाए। इसके कारण वहां ऐसी घटनाएं बहुत कम हो गईं। इसी तरह अमेरिका में 2023 के बाद भीड़ में भगदड़ से कोई बड़ी घटना नहीं हुई। पुलिस और आयोजकों के बीच बेहतर समन्वय के कारण ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने में कामयाबी मिली। साफ है कि सुरक्षा व्यवस्था और भीड़ प्रबंधन पर ध्यान दिया जाए तो भगदड़ को रोका जा सकता है।


  निस्संदेह भगदड़ से होने वाली मौतों को रोकने के लिए सतत जागरूकता, नीतिगत सख्ती और प्रशासनिक सक्रियता की जरूरत है। विभिन्न तरह के आयोजनों में जुटने वाली भीड़ की सुरक्षा की जिम्मेदारी आयोजकों और सरकार की है। याद रखने योग्य तथ्य यह है कि अगर योजना, प्रबंधन और निगरानी सही हो तो इस तरह के आयोजनों में होने वाली हर मौत रोकी जा सकती है। भारत को विदेशी मॉडलों, अपने नियम—कानूनों और आधुनिक टेक्नोलॉजी पर ध्यान देकर भीड़ नियंत्रण को प्राथमिकता देनी चाहिए। नालंदा हादसा भविष्य के आयोजनों के लिए सबक माना जाना चाहिए। लोगों की सुरक्षा हर हाल में सर्वोपरि है। आस्था और उत्साह अपनी जगह है, लेकिन जीवन अनमोल है। ऐसे हादसों को रोकने के लिए प्रशासन जागे, आयोजक अपनी जिम्मेदारी समझें और सरकार नीति बनाए।