समाज

समाज : समानुभूति की संवेदना 

संध्‍या राजपुरोहित

समकालीन समाज तेज़ी से बदल रहा है। हर दिन अख़बारों और डिजिटल माध्यमों में पीड़ा, असमानता और संघर्ष की खबरें आम हो गई हैं। आदिवासी अंचलों में विस्थापन, शहरों की ओर बढ़ता पलायन, शिक्षा से बाहर होते बच्चे और महिलाओं के साथ होती हिंसा ये अब केवल घटनाएँ नहीं, बल्कि आँकड़ों में दर्ज सच्चाइयाँ हैं। इन पर हम दुःख व्यक्त करते हैं, सहानुभूति जताते हैं, लेकिन हमारा सामाजिक आचरण अक्सर वहीं ठहर जाता है। 

सहानुभूति मानवीय संवेदना का पहला चरण है। किसी के दुःख को देखकर करुणा का भाव जागना समाज को पूरी तरह असंवेदनशील होने से बचाता है, लेकिन समस्या तब उत्पन्न होती है जब यह भावना केवल शब्दों, बयानों और औपचारिक प्रतिक्रियाओं तक सीमित रह जाती है। राष्ट्रीय स्तर पर प्रकाशित सामाजिक और आर्थिक रिपोर्टें बताती हैं कि असमानता और वंचना आज भी व्यापक है, फिर भी अधिकांश मामलों में हमारी भूमिका केवल चिंता व्यक्त करने तक सिमट जाती है। असल में सहानुभूति हमें भावनात्मक संतोष देती है, पर व्यावहारिक जिम्मेदारी का बोध नहीं कराती।

आदिवासी समाज इसका सबसे बेहतर उदाहरण है। भारत की कुल जनसंख्या का लगभग 8.6 फीसदी हिस्सा अनुसूचित जनजातियों का है, लेकिन विकास परियोजनाओं के कारण विस्थापित होने वाले लोगों में उनकी हिस्सेदारी अनुपात से कहीं अधिक रही है। विभिन्न अध्ययनों और सरकारी समितियों की रिपोर्टों के अनुसार बड़े बांधों, खनन और औद्योगिक परियोजनाओं से प्रभावित लोगों में लगभग 40 फीसदी तक आदिवासी समुदायों से आते हैं। यह तथ्य केवल विस्थापन का नहीं, बल्कि संस्कृति, आजीविका और सामाजिक पहचान के टूटने का भी संकेत देता है। सहानुभूति के रूप में मुआवज़े और पुनर्वास की योजनाएँ बनाई जाती हैं, लेकिन समानुभूति तभी होगी, जब नीति निर्माण की प्रक्रिया में प्रभावित समुदायों की वास्तविक भागीदारी सुनिश्चित की जाए और विकास को उनके जीवन-संदर्भ से जोड़कर देखा जाए।

वहीं शिक्षा के क्षेत्र में भी यही अंतर स्पष्ट दिखाई देता है। यूनिसेफ और राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण जैसी संस्थाओं की रिपोर्टें बताती हैं कि आर्थिक और सामाजिक रूप से कमजोर वर्गों के बच्चों में स्कूल छोड़ने की दर अब भी चिंता का विषय है, विशेषकर आदिवासी और ग्रामीण क्षेत्रों में। सहानुभूति के तौर पर छात्रवृत्तियाँ, मध्यान्ह भोजन और योजनाएँ मौजूद हैं, पर समानुभूति तब सामने आती है जब शिक्षा व्यवस्था यह स्वीकार करती है कि भाषा, गरीबी और पारिवारिक जिम्मेदारियाँ सीखने की प्रक्रिया को प्रभावित करती हैं। जब शिक्षक और व्यवस्था बच्चे की पृष्ठभूमि को समझकर अपनी पद्धति में बदलाव करते हैं, तभी शिक्षा वास्तव में समावेशी बनती है।

ग्रामीण क्षेत्रों से शहरों की ओर बढ़ता पलायन भी हमारे सामाजिक आचरण की परीक्षा लेता है। करोड़ों लोग रोज़गार की तलाश में अपने गाँव छोड़कर शहरों में अस्थायी या असुरक्षित परिस्थितियों में काम कर रहे हैं। शहरी अर्थव्यवस्था इन श्रमिकों पर निर्भर है, फिर भी सामाजिक व्यवहार में वे अक्सर अदृश्य रहते हैं। हम उनके श्रम का लाभ उठाते हैं, पर उनके आवास, स्वास्थ्य और बच्चों की शिक्षा को लेकर उदासीन बने रहते हैं। यह उदासीनता सहानुभूति की सीमा को दर्शाती है, जहाँ समस्या को देखा तो जाता है, पर उसे अपना नहीं माना जाता।

महिलाओं से जुड़े मुद्दों पर भी आँकड़े समाज के दावे और व्यवहार के बीच की खाई को उजागर करते हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की रिपोर्टें बताती हैं कि महिलाओं के खिलाफ दर्ज अपराध हर वर्ष एक गंभीर सामाजिक चुनौती बने हुए हैं। इसके बावजूद कार्यस्थलों, परिवारों और सार्वजनिक जीवन में लैंगिक असमानता बनी हुई है। सहानुभूति के रूप में हम घटनाओं पर आक्रोश व्यक्त करते हैं, लेकिन समानुभूति तब प्रकट होती है जब सामाजिक दृष्टिकोण बदलता है, जब महिला की बात को संदेह नहीं बल्कि विश्वास के साथ सुना जाता है और जब उसे संरक्षण की नहीं, बराबरी की आवश्यकता के रूप में देखा जाता है।

डिजिटल युग ने संवेदनाओं को भी एक नए रूप में ढाल दिया है। सोशल मीडिया पर किसी मुद्दे से जुड़े आँकड़े, तस्वीरें और वीडियो लाखों लोगों तक पहुँचते हैं, लेकिन वास्तविक जीवन में उनका प्रभाव सीमित रह जाता है। यह तथाकथित डिजिटल सहानुभूति हमें प्रतिक्रिया तो देती है, पर सहभागिता नहीं सिखाती। संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम जैसी संस्थाएँ भी अपने मानव विकास प्रतिवेदनों में यह संकेत देती रही हैं कि केवल आर्थिक या तकनीकी प्रगति पर्याप्त नहीं, जब तक सामाजिक और मानवीय दृष्टि उसके साथ न चले।

सामाजिक आचरण तब बदलता है जब संवेदना औपचारिकता से निकलकर व्यवहार में उतरती है। जब नीति निर्माण में आँकड़ों के साथ मानवीय अनुभवों को महत्व दिया जाता है, जब योजनाएँ बनाते समय ज़मीनी सच्चाइयों को समझा जाता है, तब सहानुभूति समानुभूति में बदलती है। 

आज की सबसे बड़ी चुनौती यही है कि हम सहानुभूति पर ठहर न जाएँ। आँकड़े हमें समस्या की गंभीरता बताते हैं, लेकिन समानुभूति हमें समाधान की दिशा में ले जाती है। सहानुभूति हमें अच्छा महसूस करा सकती है, जबकि समानुभूति हमें जिम्मेदार बनाती है। जब तक हम दर्शक बने रहेंगे, तब तक असमानताएँ केवल रिपोर्टों और सर्वेक्षणों में बढ़ती रहेंगी।

किसी भी समाज की परिपक्वता उसके सामाजिक आचरण से आँकी जाती है। यदि हमारा आचरण केवल संवेदनशील दिखाई देता है, पर व्यवहार में उदासीन रहता है, तो वह खोखला है। एक मानवीय समाज वही है जहाँ जनगणना, सर्वेक्षण और रिपोर्टें केवल दस्तावेज़ न हों, बल्कि सोच, नीति और व्यवहार को बदलने का माध्यम बनें। सहानुभूति से समानुभूति की यह यात्रा आज की सबसे बड़ी सामाजिक आवश्यकता है और यही एक न्यायपूर्ण तथा समावेशी भविष्य की सशक्त नींव भी है।

संध्‍या राजपुरोहित 20 वर्षो से शिक्षा एवं विकास के क्षेत्र में कार्यरत है। वर्तमान में आदिवासी अंचल में शिक्षकों व आदिवासी बच्‍चों के साथ जीवन कौशल शिक्षा कार्य से सम्‍बद्ध है।